धान के पौधे छोटे कीटों के हमले पर एमईएसए रसायन छोड़कर कीटों को भगाते और परजीवी ततैयों को आकर्षित करते हैं। फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स, अमर्त्य बग
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वैज्ञानिक खोज: धान के खेतों में वायरस व कीटों पर लगाम लगा सकता है प्राकृतिक रक्षा तंत्र

धान के वायरस और कीट पारिस्थितिकी संतुलन को प्रभावित करते हैं, एमईएसए से प्राकृतिक रक्षा फिर से सक्रिय होती है

Dayanidhi

  • धान के पौधे छोटे कीटों के हमले पर एमईएसए रसायन छोड़कर कीटों को भगाते और परजीवी ततैयों को आकर्षित करते हैं।

  • राइस स्ट्राइप वायरस अपने एनएस2 प्रोटीन के माध्यम से पौधों में एमईएसए उत्पादन को दबाकर प्राकृतिक रक्षा तंत्र को बाधित करता है।

  • वायरस ले जाने वाले कीट एमईएसए के अभाव में प्राकृतिक दुश्मनों से सुरक्षित रहते हैं और तेजी से फैलते हैं।

  • खेतों में धीमे-धीमे एमईएसए छोड़ने वाले डिस्पेंसर लगाने से परजीवी ततैयों की संख्या और अंडों में परजीवीकरण की दर बढ़ती है।

  • एमईएसए रणनीति से कीटों की आबादी कम होती है, वायरल संक्रमण नियंत्रित होता है और पारिस्थितिक संतुलन बहाल होता है।

चावल दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। एशिया सहित कई देशों में करोड़ों लोग चावल पर निर्भर हैं। लेकिन धान की खेती को कई कीटों और रोगों से भारी नुकसान होता है। इनमें खास तौर पर प्लांटहॉपर और लीफहॉपर जैसे कीट शामिल हैं, जो न केवल धान के पौधों का रस चूसते हैं, बल्कि खतरनाक पौधों के वायरस भी फैलाते हैं। इन कीटों के कारण हर साल बड़े पैमाने पर फसल का नुकसान होता है।

अब तक वैज्ञानिक यह मानते थे कि वायरस केवल कीटों के शरीर में “सवार” होकर एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचते हैं। लेकिन हाल ही में चीन की एक वैज्ञानिक टीम के अध्ययन ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। यह शोध साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है

धान के पौधे खुद की रक्षा कैसे करते हैं

सामान्य परिस्थितियों में धान के पौधे कीटों के हमले के खिलाफ एक स्मार्ट रक्षा प्रणाली अपनाते हैं। जब स्मॉल ब्राउन प्लांटहॉपर जैसे कीट पौधे पर हमला करते हैं, तो धान का पौधा मेथाइल सैलिसिलेट (एमईएसए) नामक एक विशेष गंध वाला रसायन छोड़ता है। यह रसायन दो काम करता है। पहला, यह कीटों को हतोत्साहित करता है। दूसरा, यह परजीवी ततैयों को आकर्षित करता है।

ये परजीवी ततैया कीटों के अंडों में अपने अंडे देती हैं। इससे कीटों की अगली पीढ़ी नष्ट हो जाती है और खेत में कीटों की संख्या अपने आप कम हो जाती है। इस तरह एमईएसए धान के पौधे की एक महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष रक्षा प्रणाली है, जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखती है।

मॉडल जो यह बताता है कि चावल को संक्रमित करने वाले वायरस कीट वैक्टर के खिलाफ अप्रत्यक्ष सुरक्षा को कैसे कमजोर करते हैं।

वायरस कैसे इस रक्षा तंत्र को कमजोर करते हैं

समस्या तब शुरू होती है जब धान का पौधा राइस स्ट्राइप वायरस जैसे वायरस से संक्रमित हो जाता है। यह वायरस स्मॉल ब्राउन प्लांटहॉपर द्वारा फैलता है। शोध में पाया गया कि यह वायरस केवल पौधे को बीमार नहीं करता, बल्कि पौधे की रक्षा प्रणाली में भी हस्तक्षेप करता है।

वायरस का एनएस2 प्रोटीन चावल के पौधे में एमईएसए के उत्पादन को दबा देता है। जब एमईएसए नहीं बनता, तो पौधा “खतरे का संकेत” नहीं भेज पाता। नतीजा यह होता है कि परजीवी ततैया खेत में नहीं आतीं। इससे वायरस ले जाने वाले कीटों को प्राकृतिक दुश्मनों से सुरक्षा मिल जाती है।

इस तरह एक खतरनाक चक्र बन जाता है -

  • वायरस पौधे की रक्षा प्रणाली को बंद करता है

  • कीट सुरक्षित रहते हैं और तेजी से बढ़ते हैं

  • वही कीट वायरस को और अधिक पौधों तक फैलाते हैं

यह दिखाता है कि वायरस और कीटों के बीच एक तरह का “आपसी फायदा” वाला रिश्ता बन जाता है।

खेतों में संतुलन कैसे बहाल किया गया

वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान खोजने के लिए चीन के जियांगसू प्रांत में दो साल तक बड़े पैमाने पर खेतों में प्रयोग किए। उन्होंने धान के खेतों में धीरे-धीरे एमईएसए छोड़ने वाले डिस्पेंसर लगाए। इसका उद्देश्य पौधों द्वारा दबाए गए संकेत को बाहर से फिर से उपलब्ध कराना था।

परिणाम बहुत उत्साहजनक रहे। एमईएसए के इस्तेमाल से -

  • परजीवी ततैयों की संख्या में स्पष्ट वृद्धि हुई

  • कीटों की आबादी में कमी आई

  • कीट अंडों में परजीवीकरण की दर लगभग 40 फीसदी से बढ़कर 60 फीसदी से अधिक हो गई

  • यह स्तर उन खेतों के बराबर था, जहां वायरस मौजूद नहीं था

  • साथ ही, वायरस का फैलाव भी काफी हद तक रुक गया

यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है

यह रणनीति कई कारणों से खास है। एमईएसए खुद धान के पौधों द्वारा बनाया जाने वाला प्राकृतिक पदार्थ है। इसलिए यह -

  • पर्यावरण के लिए सुरक्षित है

  • रासायनिक कीटनाशकों की तरह प्रदूषण नहीं फैलाता

  • कीटों में प्रतिरोध पैदा होने की संभावना बहुत कम है

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह तरीका कीटों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करता है। यह शोध हमें सिखाता है कि टिकाऊ कृषि के लिए हमें प्रकृति की अपनी रक्षा प्रणालियों को समझकर उन्हें मजबूत करना चाहिए, न कि केवल रसायनों पर निर्भर रहना चाहिए।

यह अध्ययन धान की खेती के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य की पर्यावरण-अनुकूल कृषि रणनीतियों के लिए भी एक नई दिशा दिखाता है।