खेतों में बढ़ता प्लास्टिक का उपयोग; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
कृषि

प्लास्टिक का हमला: गेहूं-टमाटर के पौधे के भीतर तक पहुंचा माइक्रोप्लास्टिक, बढ़त पर दिखा असर

स्टडी में सामने आया है कि प्लास्टिक के बढ़ते संपर्क से टमाटर के पौधे की बढ़त 67 फीसदी तक घट गई, जबकि जड़ों की लम्बाई में 47 फीसदी और वजन में 82 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई

Lalit Maurya

  • खेती की मिट्टी में बढ़ता प्लास्टिक अब सिर्फ पर्यावरण नहीं, हमारी थाली के लिए भी खतरे की घंटी बनता दिख रहा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि माइक्रो और नैनोप्लास्टिक गेहूं और टमाटर जैसे खाद्य पौधों के भीतर तक पहुंच सकते हैं और उनकी बढ़त व सेहत को प्रभावित कर सकते हैं।

  • अध्ययन में पाया गया कि टमाटर पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ा, प्लास्टिक के बढ़ते संपर्क में पौधे की बढ़त 67 फीसदी तक घट गई। इसी तरह जड़ों की लंबाई में 47 फीसदी और वजन में 82 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि गेहूं अपेक्षाकृत कम प्रभावित रहा, लेकिन उसकी जड़ों की लंबाई और बायोमास में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।

  • अध्ययन बताता है कि बड़े माइक्रोप्लास्टिक कण जड़ों में फंस जाते हैं, जबकि बेहद सूक्ष्म नैनोप्लास्टिक पौधों के भीतर घुसकर जड़ से पत्तियों तक पहुंच सकते हैं। खास तौर पर कपड़ों से निकलने वाले रेशेदार प्लास्टिक जड़ों को “जाम” कर पोषक तत्वों के प्रवाह को बाधित करते हैं।

  • एक अन्य अध्ययन में भी सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक वैश्विक स्तर पर पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्षमता को 12 फीसदी तक कम कर सकता है।

  • वैज्ञानिकों ने चेताया है कि प्लास्टिक अब मिट्टी से खाद्य श्रृंखला में प्रवेश का रास्ता बना रहा है। हालांकि फसलों में इसकी सटीक मात्रा अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन संकेत गंभीर हैं, यदि प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका असर खाद्य सुरक्षा, पैदावार और मानव स्वास्थ्य पर गहराता जाएगा।

खेतों से थाली तक पहुंचने वाला खाना अब एक नए, अदृश्य खतरे से घिर चुका है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक न सिर्फ फसलों की बढ़त को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि गेहूं-टमाटर जैसे पौधों के भीतर घुसकर जड़ों से पत्तियों तक पहुंच सकते हैं।

ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों ने खेत जैसी असल परिस्थितियों में गेहूं और टमाटर के पौधों पर यह अध्ययन किया।

जड़ों में फंसा प्लास्टिक, अंदर तक पहुंचे कण

अध्ययन में पाया गया कि प्लास्टिक के बेहद महीन कण पौधों की वृद्धि और क्लोरोफिल को कम कर सकते हैं। खास तौर पर कपड़ों से निकलने वाले प्लास्टिक के रेशेदार कण टमाटर के पौधों के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह साबित हुए।

सबसे चिंताजनक बात यह रही कि जहां माइक्रोप्लास्टिक के बड़े कण पौधों की जड़ों में फंसकर मिट्टी में ही रुक जाते हैं, वहीं नैनोप्लास्टिक इससे कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि पौधे इन्हें सोख लेते हैं और ये जड़, तने को पार करते हुए पत्तियों तक पहुंच जाते हैं। यानी जो प्लास्टिक मिट्टी में है, वह सीधे हमारे भोजन का हिस्सा बन सकता है।

अध्ययन में गेहूं की तुलना में टमाटर की फसल पर इसका असर कहीं ज्यादा देखा गया। टमाटर के बहुत ज्यादा प्लास्टिक के संपर्क में आने से पौधे की बढ़त 67 फीसदी तक घट गई। इसी तरह जड़ों की लम्बाई में 47 फीसदी और वजन में 82 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

टमाटर पर बड़ा हमला, गेहूं भी अछूता नहीं

वहीं, गेहूं के पौधे अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुए, लेकिन प्लास्टिक के बढ़ते संपर्क में आने से उनकी जड़ों की कुल लंबाई 39 फीसदी तक घट गई। इसी तरह जड़ों के बायोमास में 31 फीसदी की कमी दर्ज की गई। विशेषज्ञों के मुताबिक, जड़ों के छोटे होने का सीधा असर पौधों की सेहत पर पड़ता है। इसकी वजह से वे कम पानी और पोषक तत्व ग्रहण कर पाते हैं, जिससे उनकी वृद्धि और उत्पादन क्षमता दोनों प्रभावित होती हैं।

यह भी सामने आया कि कपड़ों से निकलने वाले महीन रेशेदार प्लास्टिक (जैसे पॉलिएस्टर) जड़ों के आसपास उलझकर उन्हें “जाम” कर देते हैं। इससे पानी और पोषक तत्वों का प्रवाह बाधित हो जाता है। यही वजह है कि पौधों में क्लोरोफिल भी कम हो जाता है।

रिसर्च से पता चला है कि खेतों में प्लास्टिक एक ही रूप में नहीं आता। जब प्लास्टिक के अलग-अलग तरह के कण एक साथ मौजूद होते हैं, तो उनका प्रभाव और ज्यादा खतरनाक हो जाता है। टमाटर में प्लास्टिक के ऐसे मिश्रण के कारण बढ़त में 47 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई।

पुराना प्लास्टिक, ज्यादा घातक

प्लास्टिक के पुराने, घिसे-पिटे कण पौधों में ज्यादा आसानी से प्रवेश करते हैं, जबकि प्लास्टिक के नए कण उतने प्रभावी नहीं होते। समय के साथ प्लास्टिक की सतह बदल जाती है, जिससे वह मिट्टी और जड़ों के साथ ज्यादा चिपकने लगता है।

इस स्टडी की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें प्रयोगशाला की कृत्रिम परिस्थितियों के बजाय वास्तविक हालात को अपनाया गया। वैज्ञानिकों ने पुराने और पहले से इस्तेमाल हो चुके प्लास्टिक कणों का उपयोग किया, वही आकार और मात्रा रखी जो आम तौर पर खेतों और जैविक खाद में मिलती है। यही वजह है कि इसके नतीजे जमीनी सच्चाई के ज्यादा करीब माने जा रहे हैं।

हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि खाद्य फसलों के हिस्सों में कितनी मात्रा में प्लास्टिक पहुंच रहा है, लेकिन यह अध्ययन एक बड़ा संकेत देता है, मिट्टी से पौधों के अंदर तक प्लास्टिक की राह खुल चुकी है। अध्ययन का नेतृत्व करने वाली वैज्ञानिक डॉक्टर शिमा जियाजाह्रोमी के मुताबिक, “खेतों की मिट्टी सिर्फ प्लास्टिक का भंडार नहीं, बल्कि उसे खाद्य श्रृंखला में पहुंचाने का भी रास्ता बन रही है।“

क्या हमारी थाली तक पहुंच चुका है प्लास्टिक?

उन्होंने चेताया कि अगर समय रहते इस पर रोक न लगी, तो इसका सीधा असर इंसानों की सेहत पर पड़ सकता है।

उनका आगे कहना है कि हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग को काबू में रखने के लिए बेहतर प्रबंधन, रोकथाम के असरदार उपाय और वैज्ञानिक आधार पर सख्त नियम जरूरी हैं, ताकि इसकी वजह से हमारे भोजन और सेहत पर पड़ने वाले खतरे को कम किया जा सके।

इसी तरह चीन, अमेरिका और जर्मनी के शोधकर्ताओं द्वारा किए एक अन्य अध्ययन में भी सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक वैश्विक स्तर पर पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्षमता को 12 फीसदी तक कम कर सकता है।

पिछले शोधों ने भी खतरे से किया आगाह

वैज्ञानिकों ने गणना की है कि माइक्रोप्लास्टिक की वजह से अगले 25 वर्षों में किसानों को सालाना मक्का, धान और गेहूं की पैदावार में 4.1 से 13.5 फीसदी की गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। मतलब की इससे पैदावार में सालाना 36.1 करोड़ मीट्रिक टन का नुकसान हो सकता है।

रिसर्च में यह भी सामने आया है कि बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक्स की वजह से समुद्री खाद्य उत्पादन में 7.24 फीसदी तक की कमी आ सकती है, क्योंकि प्रकाश संश्लेषण में आती बाधा से जलीय खाद्य जाल के आधार शैवाल कम हो रहे हैं। मतलब की इसकी वजह से सी-फूड पैदावार में 2.43 करोड़ मीट्रिक टन की गिरावट आ सकती है।

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने अपनी रिपोर्ट में कृषि में उपयोग होते प्लास्टिक पर चिंता जताते हुए जानकारी दी थी कि वैश्विक स्तर पर कृषि से जुड़ी सप्लाई चेन में हर साल करीब एक करोड़ 25 लाख टन प्लास्टिक इस्तेमाल किया जा रहा है।

वहीं करीब 3.73 करोड़ टन प्लास्टिक का उपयोग हर साल खाद्य उत्पादों के भण्डारण और पैकेजिंग के लिए किया जाता है। इसी तरह दुनिया में मछली पालन और एक्वाकल्चर के क्षेत्र में भी हर साल 21 लाख टन प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है। एफएओ ने भी माना है कि यह प्लास्टिक खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।

कुल मिलकर यह अध्ययन एक नई चिंता को जन्म देता है, अगर प्लास्टिक फसलों की जड़ों में जमा होकर उनकी बढ़त रोक रहा है और अंदर तक पहुंच रहा है, तो आने वाले समय में यह खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

ऐसे में अब सवाल यह है कि हम खेतों में पहुंच रहे प्लास्टिक को कैसे रोकें, क्योंकि यह खतरा दबे पांव तेजी से बढ़ रहा है। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायर्नमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।