नई पहचान वाली प्याज लाइनों से भविष्य में गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और देशभर में व्यापक किस्म सिफारिश की उम्मीद बढ़ी। फोटो साभार: आईस्टॉक
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प्याज के फिरेंगे दिन: भारतीय वैज्ञानिकों ने तैयार की आठ ऐसी किस्में जो बदलते मौसम में भी देंगी भरोसेमंद उपज

बदलते मौसम और अलग-अलग इलाकों में भी स्थिर उपज देने वाली प्याज की आठ नई किस्मों से किसानों की पैदावार और बाजार आपूर्ति को मिलेगा बड़ा सहारा

Dayanidhi

  • भारतीय वैज्ञानिकों ने पांच अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बेहतर और स्थिर उपज देने वाले आठ प्याज जीनोटाइप पहचाने।

  • लाल प्याज की पांच और सफेद प्याज की तीन लाइनों ने बदलती परिस्थितियों में भी भरोसेमंद प्रदर्शन दर्ज कराया।

  • कम जीनोटाइप-पर्यावरण प्रभाव वाली इन लाइनों से किसानों को अलग-अलग क्षेत्रों में स्थिर उत्पादन का लाभ मिल सकता है।

  • नई पहचान वाली प्याज लाइनों से भविष्य में गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और देशभर में व्यापक किस्म सिफारिश की उम्मीद बढ़ी।

  • स्थिर उपज वाली किस्में प्याज उत्पादन में उतार-चढ़ाव घटाकर किसानों की आमदनी और बाजार में आपूर्ति बेहतर बनाने में मदद करेंगी।

भारतीय रसोई में प्याज सिर्फ सब्जी नहीं, स्वाद का आधार है। तड़के में इसकी खुशबू भूख बढ़ाती है और सलाद में तीखापन स्वाद जगाता है। गर्मी हो या सर्दी, प्याज हर मौसम में थाली की शान है। किसान की मेहनत से उगा यह साधारण कंद भारतीय भोजन की पहचान बन चुका है। लेकिन मौसम की मार व अन्य कारणों से अक्सर फसल बर्बाद हो जाती है जिसके कारण किसानों से लेकर उपभोक्ताओं तक को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

लेकिन अब प्याज की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। महाराष्ट्र के राजगुरुनगर, पुणे स्थित आईसीएआर-डायरेक्टोरेट ऑफ अनियन एंड गार्लिक रिसर्च (डीओजीआर) के वैज्ञानिकों ने प्याज की आठ ऐसी आनुवंशिक किस्मों यानी जीनोटाइप की पहचान की है, जिन्होंने अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों में भी बेहतर और स्थिर उत्पादन का प्रदर्शन किया है। यह शोध आईसीएआर के ऑल इंडिया नेटवर्क रिसर्च प्रोजेक्ट ऑन अनियन एंड गार्लिक के तहत किया गया।

शोध के नतीजे इंडियन जर्नल ऑफ जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन जीनोटाइप की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ अधिक उपज नहीं, बल्कि अलग-अलग इलाकों में भी उनका भरोसेमंद प्रदर्शन है।

पांच जगहों पर हुई कड़ी परीक्षा

वैज्ञानिकों ने इन जीनोटाइप का परीक्षण रबी मौसम में देश के पांच अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में किया। इन क्षेत्रों की मिट्टी, तापमान, बारिश और खेती की परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग थीं।

आमतौर पर किसी प्याज की किस्म का प्रदर्शन एक इलाके में शानदार रहता है, लेकिन दूसरे इलाके में उसकी उपज अचानक गिर सकती है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों के लिए ऐसी किस्में विकसित करना बड़ी चुनौती है, जो अलग-अलग परिस्थितियों में भी अच्छी उपज दें।

इस परीक्षण में जिन आठ जीनोटाइप ने बेहतर स्थिरता दिखाई, उनमें पांच लाल प्याज के हैं - आरओ -1769, आरओ-1773, आरओ-1783, भीमा किरण और एनएचआरडीएफ रेड-2 शामिल हैं। इसके अलावा सफेद प्याज के तीन जीनोटाइप डब्ल्यू-444, डब्ल्यू-500 और डब्ल्यू-045 शामिल हैं।

ज्यादा उपज से ज्यादा जरूरी है स्थिर उपज

किसान के लिए केवल यह जानना काफी नहीं है कि कोई किस्म सबसे ज्यादा उपज देती है। असली सवाल यह है कि क्या वह किस्म हर साल और अलग-अलग खेतों में भी भरोसा कायम रखेगी।

यही इस शोध की खासियत है। वैज्ञानिकों ने जीनोटाइप और पर्यावरण के बीच होने वाले प्रभाव यानी जीनोटाइप-बाय-एनवायरनमेंट इंटरैक्शन को भी देखा। जिन जीनोटाइप में यह प्रभाव कम रहा, उनकी उपज अलग-अलग स्थानों पर अपेक्षाकृत स्थिर रही। सरल भाषा में कहें तो इन किस्मों ने मौसम और स्थान बदलने के बावजूद अपना प्रदर्शन ज्यादा नहीं बिगाड़ा। खेती के लिहाज से यह एक बड़ा फायदा है।

महाराष्ट्र से लेकर राजस्थान तक उम्मीद

भारत दुनिया के प्रमुख प्याज उत्पादक देशों में सबसे आगे है। महाराष्ट्र का नासिक प्याज उत्पादन के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। इसके अलावा कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और देश के पूर्वी हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर प्याज की खेती होती है।

इन राज्यों में तापमान, मिट्टी और बारिश की स्थिति काफी अलग है। ऐसे में ऐसी किस्में, जो कई तरह की परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन कर सकें, किसानों के लिए खास महत्व रखती हैं।

अगर स्थिर प्रदर्शन करने वाली किस्में बड़े क्षेत्र में सफल होती हैं, तो किसानों को हर इलाके के लिए अलग-अलग किस्म चुनने की परेशानी कम हो सकती है। साथ ही बीज उत्पादकों और कृषि विभागों के लिए भी ऐसी किस्मों की सिफारिश करना आसान हो सकता है।

खेत से बाजार तक लंबा सफर

वैज्ञानिकों की ओर से किसी जीनोटाइप की पहचान हो जाना अंतिम पड़ाव नहीं होता। इसके बाद भी कई चरण पूरे करने पड़ते हैं। बेहतर प्रदर्शन करने वाली लाइनों का आगे परीक्षण, गुणवत्ता और रोग प्रतिरोध जैसी खूबियों का मूल्यांकन तथा औपचारिक किस्म जारी करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।

इसके बाद ही इनका बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन और किसानों तक वितरण संभव होता है। इसलिए अभी इन आठ जीनोटाइप को सीधे बाजार में उपलब्ध नई किस्में मानना जल्दबाजी होगी।

प्याज की कीमतों पर भी पड़ सकता है असर

प्याज केवल रसोई की जरूरी सब्जी नहीं है, बल्कि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए बेहद संवेदनशील फसल है। उत्पादन में थोड़ी कमी आते ही बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर, अच्छी पैदावार होने पर किसानों को कम कीमतों का सामना करना पड़ता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम की मार से होने वाली उत्पादन कमी इस समस्या को और बढ़ा देती है। ऐसे में ऐसी किस्में, जो अलग-अलग परिस्थितियों में स्थिर उपज देने में सक्षम हों, भविष्य में प्याज की आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाने में मदद कर सकती हैं।

आईसीएआर-डीओजीआर की यह पहल इसी दिशा में एक अहम कदम है। यदि इन जीनोटाइप का प्रदर्शन आगे भी कायम रहता है और इन्हें व्यावसायिक स्तर पर अपनाया जाता है, तो आने वाले सालों में भारतीय किसानों के खेतों में ऐसी प्याज की किस्में दिखाई दे सकती हैं, जो बदलते मौसम के बीच भी उपज का भरोसा बनाए रखें।