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कृषि

महंगाई की आहट: युद्ध, तेल-ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से थाली पर मंडराता नया संकट

युद्ध के बीच भले ही फिलहाल अनाज की पर्याप्त आपूर्ति है, लेकिन महंगी ऊर्जा और उर्वरक संकट ने वैश्विक बाजार में अनिश्चितता को और गहरा दिया है

Lalit Maurya

  • संकेत साफ हैं कि दुनिया अभी खाद्य संकट में नहीं है, लेकिन खाद्य महंगाई के एक नए दौर की शुरुआत हो चुकी है।

  • मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण महंगा होता कच्चा तेल, बढ़ती उर्वरक कीमतें और खेती की बढ़ती लागत आने वाले समय में खाद्य उत्पादन और कीमतों दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

  • फिलहाल अनाज की वैश्विक आपूर्ति पर्याप्त है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी सीमित है, लेकिन अगर ऊर्जा और उर्वरक की कीमतें ऊंची बनी रहीं और संघर्ष लंबा चला, तो आने वाले सीजन में पैदावार घट सकती है और खाद्य कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है।

  • यानी अभी यह सिर्फ महंगाई की आहट है, लेकिन अगर हालात नहीं बदले, तो यह आहट जल्द ही दुनिया भर की रसोई में एक बड़े संकट की तरह महसूस हो सकती है।

दुनिया के एक हिस्से में चल रहे युद्ध का असर अब धीरे-धीरे पूरी दुनिया की थाली तक पर दिखाने लगा है। महंगा कच्चा तेल, उर्वरक की बढ़ती कीमतें और खेती की बढ़ती लागत, ये तीनों मिलकर एक नई खाद्य महंगाई की जमीन तैयार कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया है कि वैश्विक खाद्य कीमतों में लगातार दूसरे महीने उछाल दर्ज किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक इसकी मुख्य वजह मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के कारण ऊर्जा कीमतों में आई तेजी है, जिससे खाद्य बाजारों पर दबाव बढ़ गया है।

हालांकि राहत की बात यह है कि मौजूदा स्तर अभी भी मार्च 2022 के रिकॉर्ड स्तर से करीब 20 फीसदी कम है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले कीमतें फिर बढ़ने लगी हैं, जो आने वाले समय में महंगाई का संकेत हो सकता है।

राहत की खबर यह है कि फिलहाल अनाज की कमी नहीं है, लेकिन अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो आने वाले महीनों में दुनिया को खाने की बढ़ती कीमतों के दौर का सामना करना पड़ सकता है। यानी युद्ध भले ही सीमाओं पर लड़ा जा रहा हो, लेकिन उसकी कीमत दुनिया का आम आदमी अपनी रसोई में चुकाएगा।

खाद्य मूल्य सूचकांक में बढ़ोतरी

रिपोर्ट से पता चला है कि एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स मार्च में बढ़कर 128.5 अंकों पर पहुंच गया, जो फरवरी के मुकाबले 2.4 फीसदी अधिक है। वहीं पिछले साल मार्च से तुलना करें तो इसमें एक फीसदी से अधिक का इजाफा दर्ज किया गया है।

देखा जाए तो यह बढ़ोतरी अचानक नहीं हुई। इसकी शुरुआत तेल से होती है। जब युद्ध के बादल गहराते हैं, तो कच्चा तेल महंगा हो जाता है। जब तेल महंगा होता है, तो ट्रैक्टर, खाद से लेकर फसल ढोने तक हर कुछ महंगा हो जाता है। ऐसे में जब कृषि लागत बढ़ती है तो इसका असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है।

आंकड़े दर्शाते हैं कि सबसे ज्यादा असर गेहूं पर दिखा है। गेहूं की वैश्विक कीमतों में 4.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

क्यों बढ़ीं अनाज की कीमतें?

इसकी वजह पर नजर डालें तो अमेरिका में सूखे ने फसल की उम्मीदें कम कर दीं, वहीं ऑस्ट्रेलिया में महंगे उर्वरक के कारण किसान बुवाई में कमी कर सकते हैं। इसी तरह मक्के की कीमतों पर भी दबाव है, क्योंकि महंगे तेल के कारण एथेनॉल (बायोफ्यूल) की मांग बढ़ने की संभावना है। मक्के की कीमतों में 0.9 फीसदी की वृद्धि हुई क्योंकि दुनिया में इसकी उपलब्धता अभी पर्याप्त है। इसी तरह जौ और ज्वार भी महंगे हुए हैं।

हालांकि चावल की कीमतों में कुछ गिरावट आई है, लेकिन यह राहत अस्थाई मानी जा रही है। बता दें कि पिछले महीने की तुलना में धान की कीमतों में तीन फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। कुल मिलाकर देखें तो मार्च में अनाज मूल्य सूचकांक औसतन 110.4 अंक रिकॉर्ड किया गया, जो फरवरी के मुकाबले 1.5 फीसदी और पिछले साल की तुलना में 0.6 फीसदी अधिक है।

तेल चीनी में भी दिखी तेजी

रिपोर्ट से पता चला है कि मार्च में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी वनस्पति तेल में देखी गई। खाद्य तेल मूल्य सूचकांक 5.1 फीसदी बढ़कर 183.1 अंक पर पहुंच गया। इसमें लगातार तीसरे महीने बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं सूचकांक एक साल पहले के स्तर से भी 13.2 फीसदी अधिक है। इसके साथ ही पाम ऑयल की कीमतें 2022 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं।

प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण बायोफ्यूल की मांग बढ़ रही है, जिससे सोयाबीन तेल की कीमतें में भी उछाल आया है। इसी तरह ब्लैक सी क्षेत्र में आपूर्ति की कमी से सूरजमुखी तेल महंगा हुआ। यानी महंगी ऊर्जा, बायोफ्यूल और खाद्य तेल महंगें होने का सीधा असर बाजार में दिखाई दे रहा है।

रिपोर्ट में सामने आया है कि मार्च में चीनी की कीमतों में 7.2 फीसदी की बड़ी बढ़ोतरी हुई, क्योंकि ब्राजील ज्यादा से ज्यादा गन्ने का उपयोग एथेनॉल बनाने में कर सकता है।

देखा जाए तो वैश्विक बाजार में चीनी की कीमतें नवंबर 2025 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध से व्यापार मार्ग प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि भारत और थाईलैंड में अच्छी फसल से कीमतों पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ा।

दूध-मांस हुए महंगे

रिपोर्ट के मुताबिक डेयरी कीमतों में जुलाई 2025 के बाद पहली बार बढ़ोतरी हुई है। मार्च 2026 में डेयरी मूल्य सूचकांक 120.9 अंक दर्ज किया गया, जो पिछले महीने के मुकाबले 1.2 फीसदी की बढ़ोतरी को दर्शाता है। लेकिन एक साल पहले के स्तर से अभी भी 18.7 फीसदी नीचे है।

इस दौरान स्किम्ड मिल्क पाउडर, बटर और फुल क्रीम मिल्क पाउडर महंगे हुए हैं। हालाँकि चीज की कीमतों में गिरावट ने कुल बढ़ोतरी को सीमित रखा हुआ है।

मांस की कीमतों भी इस दौरान एक फीसदी बढ़ी हैं। मार्च में मांस मूल्य सूचकांक 127.7 अंक दर्ज किया गया, जो फरवरी से एक फीसदी अधिक है, जबकि पिछले साल के मुकाबले इसमें आठ फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

भविष्य में कीमतों में आ सकता है बड़ा उछाल

एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेतावनी दी है कि, “अगर यह संघर्ष लंबा चला और उर्वरक व ऊर्जा की कीमतें ऊंची रहीं, तो किसानों को कठिन फैसले लेने पड़ेंगे। इससे किसान कम खाद का इस्तेमाल करेंगें, बुवाई घटेगी और किसान कम लागत वाली फसलों की ओर शिफ्ट होने को मजबूर हो जाएंगे। इन फैसलों का असर तुरंत नहीं, लेकिन आने वाले सीजन में पैदावार पर पड़ेगा, और तब खाद्य कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है।“

कुल मिलाकर, दुनिया फिलहाल खाद्य संकट में नहीं जूझ रही, लेकिन खाद्य महंगाई के एक नए दौर की दहलीज पर जरूर खड़ी है। युद्ध, महंगी ऊर्जा और उर्वरक संकट ने खेती की लागत बढ़ा दी है, और अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो आने वाले सीजन में उत्पादन घट सकता है और खाद्य कीमतों में बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि असली असर आने वाले महीनों में दिखेगा।

आज बाजार में अनाज है, लेकिन अनिश्चितता भी है। कीमतें धीरे बढ़ रही हैं, लेकिन दबाव लगातार बन रहा है। और अगर हालात नहीं बदले, तो आने वाले समय में महंगाई सिर्फ एक आर्थिक खबर नहीं, बल्कि हर घर की रसोई की सबसे बड़ी चिंता बन सकती है।