भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार इमली के संपूर्ण जीनोम का मानचित्र तैयार कर उसके अनूठे खट्टे स्वाद, सुगंध, औषधीय गुणों और करोड़ों वर्षों के विकासक्रम से जुड़े अहम रहस्यों का खुलासा किया है।
आईआईएसईआर भोपाल के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में इमली के 12 गुणसूत्रों में मौजूद लगभग 48,867 जीनों की पहचान की गई, जो फल की गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधक क्षमता, पर्यावरणीय तनाव सहनशीलता और अन्य महत्वपूर्ण जैविक विशेषताओं को नियंत्रित करते हैं।
स्टडी से पता चला कि इमली ने अपने विकासक्रम में स्वतंत्र रूप से पूरे जीनोम की प्रतिलिपि तैयार की, जिससे उसमें जलवायु के अनुरूप ढलने और नए गुण विकसित करने की क्षमता बढ़ी।
वैज्ञानिकों ने ऐसे जीन भी खोजे हैं जो टार्टरिक एसिड के निर्माण के जरिए इमली को उसका विशिष्ट खट्टा स्वाद देते हैं, जबकि अन्य जीन औषधीय महत्व वाले ट्राइटरपीन यौगिकों के निर्माण से जुड़े हैं।
यह उपलब्धि भविष्य में अधिक उपज देने वाली, जलवायु-सहिष्णु और रोगरोधी इमली की किस्में विकसित करने के साथ-साथ खाद्य, आयुर्वेद और दवा उद्योग में नए नवाचारों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
भारतीय रसोइयों की शान, चटनी का स्वाद बढ़ाती और बचपन की खट्टी-मीठी यादों को ताजा करती इमली सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक अटूट हिस्सा है।
सांभर की खटास से लेकर पानीपुरी के तीखे-मीठे पानी तक, इमली हमारे खान-पान और दादी-नानी के देसी नुस्खों में सदियों से रची-बसी है। अब इसी इमली के अनोखे स्वाद और सेहत के गुणों को लेकर भारतीय वैज्ञानिकों ने एक बड़ा खुलासा किया है।
करोड़ों वर्षों की तपस्या से पाई अपनी पहचान
भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार इमली के पूरे जीनोम का खाका तैयार कर यह पता लगाया है कि इसके वो कौन से ऐसे जीन हैं जो इसे ऐसा अनोखा खट्टा स्वाद, सुगंध और औषधीय गुण देते हैं। रिसर्च से पता चला कि कैसे प्रकृति ने करोड़ों सालों में इमली को इतना खास, सेहतमंद और रोगों के साथ-साथ बदलती जलवायु का सामना करने के काबिल बनाया है।
यह अध्ययन इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर), भोपाल से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जिसका नेतृत्व डॉक्टर विनीत कुमार शर्मा ने किया है। इस शोध दल में उनके साथ मिताली सिंह और मनोहर बिष्ट, अभिजीत एम जी, और श्रुति महाजन भी शामिल थी। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल मॉलिक्यूलर हॉर्टिकल्चर में प्रकाशित हुए हैं।
इमली के 12 गुणसूत्रों में छिपी 48,867 जीनों की कहानी
वैज्ञानिकों ने अपने इस अध्ययन में इमली के 12 गुणसूत्रों (क्रोमोसोम्स) से करीब 48,867 प्रोटीन का निर्माण करने वाले जीनों की पहचान की है। ये जीन फल के विकास, पर्यावरणीय तनाव को सहन करने की क्षमता और पेड़ की अन्य महत्वपूर्ण जैविक विशेषताओं से जुड़े हैं।
रिसर्च में खुलासा हुआ है कि इमली ने अपने विकासक्रम के दौरान करोड़ों साल पहले स्वतंत्र रूप से डीएनए (जीनोम) को खुद ही दोगुना कर लिया था।
इस दौरान इमली ने अपने पूरे जीनोम की स्वतंत्र रूप से प्रतिलिपि तैयार की थी।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रकृति के इस अनूठे बदलाव ने इमली को बदलती जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने तथा नए जैविक गुण विकसित करने में मदद की। साथ ही उसे एक अनोखा स्वाद, महक और औषधीय गुण भी प्रदान किए।
रिसर्च में यह भी सामने आया है कि इमली और अंगूर के पूर्वज करीब 11.7 करोड़ वर्ष पहले अलग हुए थे।
क्या है इमली की मशहूर खटास और अनोखे गुणों का राज?
वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी में ऑक्सीडोस्क्वालेन साइक्लेज नामक जीन परिवार की भी पहचान की है, जो ट्राइटरपेन्स जैसे प्राकृतिक यौगिकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही यौगिक इमली की विशिष्ट सुगंध, स्वाद और औषधीय गुणों के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं।
इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने एल-आइडोनेट डिहाइड्रोजनेज (एल-आईडीएच) एंजाइम से जुड़े एक महत्वपूर्ण जीन की भी पहचान की है। माना जाता है कि यही जीन इमली में टार्टरिक एसिड के अत्यधिक मात्रा में बनने में अहम भूमिका निभाता है। गौरतलब है कि यही अम्ल इमली के फलों को उसका अलग चटपटा खट्टा स्वाद देता है।
बता दें कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां इमली का व्यापक उपयोग भोजन, पेय पदार्थों, चटनी, मसालों और पारंपरिक चिकित्सा में होता है। देश के कई राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और ओडिशा में लाखों ग्रामीण परिवार इमली के संग्रह और व्यापार से अपनी जीविका कमाते हैं।
कृषि और दवा उद्योग के लिए नई उम्मीद
देखा जाए तो यह महज एक प्रयोगशाला में की गई रिसर्च नहीं है, बल्कि हमारे देश के कृषि और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भी एक बड़ा कदम है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद कि इमली के जीनोम संबंधी यह जानकारी भविष्य में इमली की ऐसे किस्में विकसित करने में मदद करेगी जिनमें बेहतर फल गुणवत्ता, अधिक उपज, रोग प्रतिरोधक क्षमता और जलवायु परिवर्तन का सामना करने की शक्ति हो। साथ ही इमली के औषधीय गुणों को समझकर स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद उत्पाद और दवाइयां बनाई जा सकेंगी।
भारत में इमली केवल एक खट्टा फल नहीं, बल्कि लाखों ग्रामीण परिवारों की आजीविका, पारंपरिक भोजन और आयुर्वेदिक विरासत का अहम हिस्सा है। ऐसे में इमली के जीनोम का यह खाका वैज्ञानिक खोज के साथ-साथ भारतीय कृषि और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने वाली ऐतिहासिक पहल है।
इससे भविष्य में इमली की बेहतर किस्मों के विकास, किसानों की आय में वृद्धि और खाद्य व औषधि उद्योग में नवाचार की नई राह खुल सकती है।
सच कहें तो इमली का हर पत्ता, छाल और फल हमारे जीवन में काम आता है। ऐसे में आज भारतीय वैज्ञानिकों ने प्रकृति के इस अनमोल तोहफे के छिपे हुए वैज्ञानिक रहस्यों को दुनिया के सामने लाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक तकनीक से जोड़ दिया है।