सारांश
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के किसानों का कहना है कि नीलगाय, जंगली सूअर और आवारा पशुओं द्वारा बार-बार फसलों पर हमला करने से खेती करना अब मुमकिन नहीं रह गया है।
अब कई किसान रातें अपनी खेतों में बनी कच्ची झोपड़ियों में बिताते हैं और टॉर्च की रोशनी में अपने खेतों की रखवाली करते हैं, ताकि जानवर उनकी फसलों को बर्बाद न कर सकें।
कई किसानों ने तिल, मटर, चना और दूसरी फसलों में भारी नुकसान होने की बात कही है, कुछ तो यहां तक कहते हैं कि अब उन्हें सूखे से ज्यादा जानवरों से डर लगता है।
इस संकट की वजह से किसान खेती-बाड़ी छोड़ रहे हैं, बटाई पर खेती करने से बच रहे हैं और मजदूरी की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
“मैं इस साल (2025-26 के रबी सीजन) के बाद शायद कभी खेती नहीं करूंगा। मुझे मजदूर बनना मंजूर है लेकिन अब किसानी मुझसे नहीं हो पाएगी।” मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के पठा गांव के रहने वाले चंदन सिंह राजपूत इस निष्कर्ष पर बेवजह नहीं पहुंचे हैं। पिछले चार साल से खेती में लगातार नुकसान उठाने के बाद चंदन सिंह में अब इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वह अब और जोखिम उठा पाएं।
चंदन सिंह ने पठा गांव से लगे झिन्ना गांव में 20 बीघा (8 एकड़) जमीन 85,000 रुपए में बलकट (एक साल के लिए किराए पर) ली है। इसमें 16 बीघा पर गेहूं और शेष 4 बीघा पर मटर उगाया है। अपनी फसल की रखवाली के लिए वह दिन-रात खेतों पर ही रहते हैं। खेत में ही उनका नहाना, धोना और खाना होता है। खेत में दिनरात रुकने की वजह पूछने पर बताते हैं, “रोज रात को रोझ (नीलगाय) झुंड में आते हैं। जरा सी चूक का मतलब है फसल का सफाया।”
चंदन सिंह ने अपने खेत में नीलगायों के पैरों के निशान और उनकी लीद दिखाते हुए बताया कि यह बिल्कुल ताजा हैं। पिछली रात ही उनका हमला हुआ था। उन्होंने शुरुआत में ही फसलों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। वह कहते हैं, इसी को बचाने के लिए हम टॉर्च लेकर रातभर जागते हैं और जरा भी हलचल होने पर उन्हें खदेड़ते हैं। लेकिन फिर भी खेत को पूरी तरह नहीं बचा पाते।
जानवरों से चंदन सिंह के खेती को नुकसान हर साल हो रहा है। पिछले साल उन्होंने खरीफ के सीजन में 20 बीघा खेत में तिल लगाया था जो केवल 4 क्विंटल ही निकला। रबी में 10-12 क्विंटल मटर ही हाथ लगा। उनके अनुसार, अगर जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते तो कम से कम 60 क्विंटल मटर की पैदावार होती। पिछले साल केवल मटर में ही उन्हें 55 हजार रुपए का नुकसान पहुंचा। जबकि कुल नुकसान 1.5 लाख रुपए तक पहुंच गया था।
2025 के खरीफ सीजन में उन्होंने तिल लगाया था जो ज्यादा बारिश होने पर खेत में ही सड़ गया। रबी सीजन में उन्हें ज्यादा उम्मीदें हैं और इसी उम्मीद में उन्होंने पिछले साल के भारी घाटे के बाजवूद खेत बलकट पर ले लिए। वह बताते हैं कि अगर इस साल भी नुकसान हुआ तो वह खेती को पूरी तरह त्याग देंगे और दिल्ली जाकर मजदूरी करेंगे। इससे उन्हें कम से कम रात भर खेतों में जागना तो नहीं पड़ेगा। खेती छोड़कर वह आर्थिक, शारीरिक और मानसिक पीड़ा से भी मुक्त हो जाएंगे।
चंदन सिंह के साथ ही खेतों की रखवाली कर रहे माखनलाल कहते हैं, “ घाटे का सिलिसिला पिछले 4 साल से चल रहा है। मुझे पिछली बार 2021में खेती से फायदा हुआ था, उसके बाद से हर साल डेढ़ से दो लाख का रुपए का घाटा ही हो रहा है।” माखनलाल के अनुसार, बुंदेलखंड के इस हिस्से में अब तक खेती के नुकसान को सूखे से जोड़ा जाता रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जंगली जानवर जैसे नीलगाय और जंगली सूअर सर्वाधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।
छतरपुर के एक अन्य परई गांव के किसान बाबूलाल पाल कहते हैं जानवरों के डर से किसानों ने अरहर और ज्वार उगानी पूरी तरह से बंद कर दी है। उनका अनुमान है कि मवेशियों, जंगली सूअरों और नीलगायों की वजह से 75 प्रतिशत तक फसलें नष्ट हो रही हैं। पिछले साल उन्होंने 4 बीघा में चना उगाया था जो आधा क्विंटल भी नहीं निकला। बाबूलाल के अलग-अलग करीब 50 बीघा खेत हैं और परिवार के दो से तीन लोग फसलों को जानवरों से बचाने के लिए दिनरात खेत में डटे रहते हैं। कभी-कभी नींद आने पर पूरा खेत तबाह मिलता है। बाबूलाल कहते हैं, “हमारा हुलिया देखिए। क्या कोई कह सकता है कि हम बड़े किसान हैं? हमारे पास पर्याप्त खेत हैं लेकिन हम जानवरों के कारण फसल नहीं ले पा रहे हैं। हमें खाने के लाले हैं।” यह हाल गांव से सभी छोटे-बड़े किसानों का है।
बाबूलाल के अनुसार, पिछले साल गांव के करीब 25 प्रतिशत किसानों ने खेतों की कटाई ही नहीं की क्योंकि उसमें कुछ बचा ही नहीं था। जानवरों से होने वाले नुकसान के कारण ही उनके गांव में कोई किसान खेत बटाई (जिसमें खेत किराए पर दिए जाते हैं और उपज व लागत आधी-आधी बांटी जाती है) या बलकट पर नहीं ले रहा है और गांव से पलायन चरम पर है। उनका अनुमान है कि गांव के करीब 80 प्रतिशत घरों से लोग बाहर चले गए हैं। अधिकांश घराें में केवल बुजुर्ग ही बचे हैं। बाबूलाल के साथ खेत की रखवाली कर रहे उनके 80 वर्षीय पिता भवानीदीन कहते हैं कि हम नहीं चाहते कि हमारी आने वाली पीढ़ियां खेती करें। वह कहते हैं कि जानवरों से खेतों को बचाने के लिए पिछले पांच वर्षों से हम खेत में ही झोपड़ी बनाकर रहे हैं।
परई गांव के प्रधान अरिमर्दन सिंह यादव के अनुसार, खेती का चक्र शुरू होते ही जानवरों से नुकसान शुरू हो जाता है। शुरुआत में जंगली सूअर परेशान करते हैं। चना की बुवाई करते ही जंगली सूअर खेतों को खोदकर खाना शुरू कर देते हैं। फसल थोड़ी खड़ी होने पर मवेशियों और नीलगायों का आक्रमण शुरू हो जाता है। वह कहते हैं कि 400-500 मवेशियों का झुंड जिस खेत में घुस जाए, वो खेत चौपट हो जाता है।
छतरपुर जिले में गैर लाभकारी संगठन विकास संवाद के जिला संयोजक रविकांत पाठक कहते हैं कि ऊंची छलांग लगाने वाली नीलगाय अक्सर झटका वाली सोलर तारों को भी फांद जाती हैं। वह कहते हैं कि उनकी संस्था 12 गांव के 500 किसानों को झटका मशीन में सहयोग कर रही है। चार हेक्टेयर के खेत में झटका मशीन लगाने पर करीब 20 हजार का खर्च आता है। इसकी 50 प्रतिशत राशि का भुगतान संस्था करती है।
छतरपुर जिले के एक अन्य गांव पहरा में अपने खेतों की तारबंदी कर रहे किसान ओमनारायण तिवारी कहते हैं कि खेती की दिनरात रखवाली करने पर भी किसान मुश्किल से अपनी 50 प्रतिशत फसल ही बचा पाते हैं। भगाने पर कई बार ये जानवर उग्र हो जाते हैं और किसानों पर हमला कर घायल कर देते हैं।