दुनिया की थाली पर मौसम की मार अब साफ दिखाई देने लगी है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने 2026 में वैश्विक अनाज उत्पादन का अनुमान घटाकर 298 करोड़ टन कर दिया है, जो 2025 के रिकॉर्ड उत्पादन से 6.11 करोड़ टन यानी 2 फीसदी कम है।
हालांकि, यह फिर भी अब तक की दूसरी सबसे बड़ी पैदावार होगी। उत्पादन में सबसे बड़ी चोट मक्का पर पड़ने की आशंका है, जिसका वैश्विक उत्पादन 130.9 करोड़ टन रहने का अनुमान है।
यूरोप में गर्मी और सूखे ने फसल की संभावनाएं कमजोर की हैं। गेहूं का उत्पादन 81.07 करोड़ टन और चावल का 55.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है। चावल उत्पादन में भी 1.9 फीसदी गिरावट की आशंका है, जिसमें अल नीनो और किसानों के घटते मुनाफे की बड़ी भूमिका है।
चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि उत्पादन घटने के बावजूद 2026-27 में वैश्विक अनाज खपत 296.5 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं भंडार में महज 0.2 फीसदी बढ़ोतरी की उम्मीद है।
अगस्त में वैश्विक खाद्य कीमतें भी 1.9 फीसदी बढ़ी हैं। यानी फिलहाल दुनिया के पास पर्याप्त अनाज है, लेकिन गर्मी, सूखा, अल नीनो और अस्थिर व्यापार मार्गों का बढ़ता दबाव भविष्य की खाद्य सुरक्षा और आम लोगों की थाली के लिए गंभीर चेतावनी है।
दुनिया की बढ़ती आबादी के लिए भोजन जुटाने की चुनौती एक बार फिर गहराती दिख रही है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने अपनी नई रिपोर्ट में 2026 के लिए जारी वैश्विक अनाज उत्पादन के अनुमान को घटाकर 298 करोड़ टन कर दिया है। यह 2025 की रिकॉर्ड पैदावार से 6.11 करोड़ टन यानी 2 फीसदी कम है।
हालांकि, इसके बावजूद 2026 की पैदावार इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी रहने का अनुमान है।
एफएओ के ताजा आकलन के मुताबिक, उत्पादन में सबसे बड़ी गिरावट मक्का में देखने को मिल सकती है। वैश्विक मक्का उत्पादन का अनुमान घटाकर 130.9 करोड़ टन किया गया है। यूरोप में लगातार गर्मी और सूखे ने फसल को नुकसान पहुंचाया है। खासकर फ्रांस और पोलैंड में उत्पादन की संभावनाएं कमजोर हुई हैं।
भारत और पराग्वे के अनुमान में भी मामूली कमी की गई है। हालांकि अर्जेंटीना और ब्राजील में उम्मीद से बेहतर पैदावार इस गिरावट को कुछ हद तक थाम सकती है।
बढ़ सकता है गेहूं उत्पादन, लेकिन धान में दिखेगी गिरावट
रिपोर्ट के मुताबिक गेहूं का वैश्विक उत्पादन 81.07 करोड़ टन रहने का अनुमान है। जुलाई के अनुमान से इसमें 42 लाख टन (0.5 फीसदी) की बढ़ोतरी की गई है, लेकिन फिर भी यह 2025 के मुकाबले 3.8 फीसदी कम होगा। इसके बावजूद यह गेहूं की अब तक की दूसरी सबसे बड़ी पैदावार होगी।
कनाडा और मोरक्को में बेहतर उत्पादन की उम्मीद से वैश्विक अनुमान बढ़ा है, जबकि यूरोप और ब्रिटेन में कम बारिश और बढ़ते तापमान ने फसल पर असर डाला है।
धान की कहानी भी राहत देने वाली नहीं है। 2026-27 में वैश्विक धान उत्पादन 55.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले सीजन के रिकॉर्ड स्तर से 1.9 फीसदी कम है।
एफएओ के अनुसार, किसानों को मिलने वाला कम मुनाफा और अल नीनो से जुड़ी प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां उत्पादन में गिरावट की प्रमुख वजह हैं। यानी दुनिया की रसोई में रोजाना इस्तेमाल होने वाले इस सबसे अहम अनाज पर भी मौसम का दबाव साफ दिखाई दे रहा है।
खपत बढ़ रही, उत्पादन घट रहा
चिंता की एक और वजह यह है कि उत्पादन घटने के बावजूद अनाज की वैश्विक खपत बढ़ने का अनुमान है। 2026-27 में दुनिया में कुल 296.5 करोड़ टन अनाज की खपत की संभावना जताई गई है, जो पिछले साल से 55 लाख टन यानी 0.2 फीसदी अधिक है।
रुझानों से पता चला है कि मक्का और अन्य मोटे अनाज तथा चावल की खपत बढ़ने की उम्मीद है। बढ़ती आबादी के कारण चावल की खपत लगातार बढ़ रही है। वहीं 2025 में रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन के कारण पशु आहार और औद्योगिक इस्तेमाल में गेहूं की खपत बढ़ी थी, लेकिन 2026-27 में इसके कुछ कम होने का अनुमान है।
भंडार में मामूली बढ़ोतरी, लेकिन राहत सीमित
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2027 में सीजन खत्म होने तक दुनिया में अनाज का कुल भंडार 94.7 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह शुरुआती भंडार से सिर्फ 18 लाख टन यानी 0.2 फीसदी अधिक होगा। यानी उत्पादन और खपत के बीच अंतर बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन वैश्विक खाद्य व्यवस्था के लिए बड़ी सुरक्षा-ढाल भी नहीं बन रही।
वैश्विक अनाज स्टॉक-टू-यूज अनुपात 31.6 फीसदी रहने का अनुमान है, जो पिछले सीजन के 31.9 फीसदी से कम है। एफएओ के मुताबिक ऐतिहासिक दृष्टि से यह स्तर अभी भी अपेक्षाकृत आरामदायक है, लेकिन इसमें गिरावट यह संकेत देती है कि खाद्य सुरक्षा का सुरक्षा-कवच कुछ कमजोर हो रहा है।
ब्लैक सी से लेकर यूरोप तक बढ़ी अनिश्चितता
वैश्विक अनाज व्यापार 2026-27 में 50.9 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह जुलाई के अनुमान से थोड़ा अधिक है, लेकिन पिछले सीजन के रिकॉर्ड स्तर से नीचे रहेगा।
सबसे बड़ी चिंता काला सागर के रास्तों से गेहूं की आपूर्ति को लेकर बनी हुई है। रूस और यूक्रेन से निर्यात जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और वैकल्पिक मार्गों की सीमित क्षमता के कारण आपूर्ति की रफ्तार और दिशा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
इसका असर उन देशों पर पड़ सकता है जो अपनी खाद्य जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
दूसरी ओर, यूरोप में उत्पादन अनुमान घटने के बाद वहां आयात की जरूरत बढ़ सकती है। अमेरिका के मक्का निर्यात में मजबूत स्थिति बनाए रखने की उम्मीद है, जबकि अर्जेंटीना का मक्का निर्यात 3.9 करोड़ टन तक पहुंच सकता है।
एफएओ ने अपनी अन्य रिपोर्ट में अगस्त 2026 के दौरान वैश्विक खाद्य कीमतों में 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी की भी पुष्टि की है। इससे आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, अगस्त में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक 133.3 अंकों पर पहुंच गया, जो जुलाई के स्तर से 1.9 फीसदी अधिक है। वहीं एक साल पहले की तुलना में भी यह सूचकांक 2.5 फीसदी ऊपर बना हुआ है।
खेतों से सीधे थाली तक पहुंच रही मौसम की मार
देखा जाए तो एफएओ के आंकड़े सिर्फ उत्पादन में कमी की कहानी बयां नहीं करते, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि मौसम का संकट अब खेतों से निकलकर दुनिया की थाली तक पहुंच रहा है।
कहीं भीषण गर्मी और सूखा फसल को कमजोर कर रहा है, तो कहीं अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं उत्पादन और किसानों के मुनाफे दोनों पर असर डाल रही हैं।
फिलहाल दुनिया के पास पर्याप्त अनाज भंडार है, इसलिए तत्काल वैश्विक खाद्य संकट की स्थिति नहीं है। लेकिन उत्पादन में लगातार गिरावट, बढ़ती खपत और अस्थिर व्यापार मार्गों का मेल भविष्य के लिए चेतावनी जरूर है। क्योंकि जब मौसम बिगड़ता है, फसल घटती है और आपूर्ति के रास्ते बाधित होते हैं, तो उसका सीधा असर आखिरकार इंसान की थाली और जेब पर पड़ता है।