उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में किसानों की फसलों से बचाने के लिए राज्य सरकार गोशालाओं पर बड़ी राशि खर्च कर रही है। बांदा जिले में निराश्रित पशुओं के लिए लगभग हर गांव में गोशाला है, जिससे फसलों को मवेशियों से होने वाले नुकसान पर कुछ हद तक नियंत्रण है लेकिन नीलगाय और जंगली सूअर का कोई इलाज नहीं है।
बांदा जिले के खप्टिहा कलां गांव के रहने वाले संतोष यादव जंगली सूअरों के डर से मटर नहीं बो रहे हैं। संतोष भूमिहीन हैं और उन्होंने 16 बीघा जमीन बटाई पर ली है। उनकी इतनी क्षमता नहीं है कि वह खेतों के चारों तरफ लोहे की कंटीली तार लगा सकें, इसलिए वह कांटों की बाड़ लगा रहे हैं। उनके खेतों में गेहूं की नई पौध आते ही नीलगाय ने खानी शुरू कर दी है। वह बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जानवरों से नुकसान के कारण एक बीघा में औसतन 5-6 क्विंटल गेहूं निकल रहा है जबकि सामान्य स्थिति में उपज 10-12 क्विंटल प्रति बीघा निकलती है। इस तरह उनकी उपज को सीधा-सीधा आधा नुकसान है।
बांदा के ही अलोना गांव के रहने वाले कल्लू कहते हैं कि उनके परिवार के पास करीब 90 बीघा जमीन है, जिसमें से 30 बीघा जमीन पर वह खेती नहीं करते क्योंकि उनमें इन खेतों की रखवाली की क्षमता नहीं है। अलोना गांव में ऐसे बहुत से किसान हैं जिन्होंने अपने खेत जानवरों से डर से परती छोड़े हुए हैं। कल्लू के अनुसार, गांव में गोशाला तो है लेकिन उसका प्रबंधन बहुत खराब है। गोशाला में करीब 90 गाय ही हैं जबकि गांव के अन्ना पशुओं की संख्या कम से कम 1,000 है। ये भूखे पशु अक्सर रात को खेतों में पहुंचकर फसल चरने लगते हैं।
अलोना निवासी और निकटवर्ती सांडी गांव में खेतों की रखवाली कर रहे शिवकुमार कहते हैं कि उनके खेत से करीब दो किलोमीटर दूर तक परती खेत जंगल में तब्दील हो चुके हैं। उनका कहना है कि सांडी गांव की कम से कम 100 हेक्टेयर खेती की जमीन जंगल बन चुकी है और विलायती कीकर से भरी है। गांव में मवेशियों, नीलगायों और सूअरों का आतंक से किसानों की नींद उड़ी रहती है। अपना खेत दिखाते हुए शिवकुमार कहते हैं कि 26 अक्टूबर की रात 5.5 बीघा के इस खेत को सूअरों ने खोद डाला और करीब 50 प्रतिशत चने की फसल तबाह कर दी। उन्होंने जानवरों को भगाने के लिए खेत में बने मकान में पटाखे रखे हैं, लेकिन यह भी स्वीकार करते हैं कि अब जानवरों पर पटाखों का भी असर नहीं होता।
शिवकुमार के अनुसार, जो किसान बुवाई के बाद खेत की रखवाली करने में असमर्थ हैं, जब वे कटाई करने पहुंचते हैं वो सोचते हैं कि फसल काटें या नहीं क्योंकि नुकसान इतना ज्यादा चुका होता है कि लागत निकालनी मुश्किल होती है।
तारबंदी से भी बचाव नहीं
बुंदेलखंड के किसान फसलों को जानवरों से बचाने के लिए भारी भरकम निवेश कर रहे हैं। किसानों के लिए सबसे सस्ता बचाव का तरीका लोहे की कंटीली तारों में निवेश है। करीब 5,000 रुपए प्रति क्विंटल यह तार पड़ती है। समृद्ध किसानों के बीच सौर ऊर्जा से संचालित झटका वाली तारबंदी भी लोकप्रिय हो रही है, लेकिन इसका खर्च करीब 6,000 प्रति बीघा आता है जो अधिकांश किसानों के बजट से बाहर है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 2024 में बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए बुंदेलखंड एकीकृत कृषि विकास (सोलर फेंसिंग) योजना 2024-25 को स्वीकृति प्रदान की थी। योजना को तहत सोलर फेंसिंग करने वाले किसानों को 80 प्रतिशत अनुदान की प्रावधान है।
उत्तर प्रदेश सरकार में विशेष सचिव ने कृषि निदेशक को 18 अक्टूबर 2024 को योजना के संबंध में भेजे पत्र में स्वीकार किया गया है कि दलहन और तिलहन की खेती को विगत वर्षों में जंगली जानवरों और निराश्रित पशुओं से भारी नुकसान पहुंचने के कारण तथा विशेष रूप से असमतल खेतों में नमी का अभाव रहने से प्रदेश में इन फसलों के आच्छादन और उत्पादन में कमी आ रही है। साथ की कृषकों का आय भी प्रभावित हुई है। एक अनुमान के अनुसार, जंगली जानवरों और निराश्रित पशुओं द्वारा पहुंचाई जा रही क्षतियों के कारण बुंदेलखंड के कई अंचलों में पारंपरिक फसलों को नहीं बोया जा रहा है अथवा अत्यंत अलाभकारी उत्पादन से कृषक हतोत्साहित हो रहे हैं।
पत्र के अनुसार, “बुंदेलखंड क्षेत्र के सभी जनपदों से प्राप्त किए गए आंकड़ों से ज्ञात होता है कि लगभग 10 लाख (उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 15 प्रतिशत) हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल जंगली जानवरों और निराश्रित पशुओं के प्रकोप से अत्यधिक प्रभावित होता है। जंगलों का क्षेत्र कम होते जाने के कारण जंगली जानवरों को पर्याप्त भोजन व चारा न मिल पाने से वे कृषि फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।”
इन समस्याओं को देखते हुए बुंदेलखंड के सात जिलों-झांसी, ललितपुर, जालौन, चित्रकूट, बांदा, महोबा और हमीरपुर के 47 विकास खंडों में सोलर फेंसिंग योजना लागू की गई। लेकिन यह योजना व्यक्तिगत किसानों के लिए नहीं बल्कि कृषक समूहों के लिए है, जिसमें कम से कम 10 हेक्टेयर का क्लस्टर शामिल हो। पांच किसानों का समूह बनाकर इस योजना का लाभ लेने वाले बांदा जिले के लामा गांव के धर्मराज कहते हैं कि सोलर फेंसिंग अन्ना पशुओं से खेतों को बचाने में कारगर है लेकिन जंगली सूअरों से सुरक्षा नहीं कर पाती। सूअर तार से नीचे से आसानी से निकलकर खेतों में पहुंच जाते हैं।
अन्ना मवेशी
बुंदेलखंड ऐतिहासिक रूप से सूखा प्रभावित क्षेत्र रहा है। यह कम वर्षा, कम कृषि उपज, जल संकट, मृदा अपरदन, जल संसाधनों का क्षरण, चारा संकट, आजीविका के अस्थिर स्रोत, पलायन आदि जैसी अनेक गंभीर समस्याओं का सामना करता है। यह मुख्यतः कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था है, जहां लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। किसानों की आय में इनका 96 प्रतिशत योगदान है। बुंदेलखंड में कृषि वर्षा-आधारित इसे जोखिमपूर्ण बनाती है। किसान मुख्यत: रबी की फसल लेते हैं, इसलिए इस एकल फसल को पशुओं से जोखिम का अर्थ है किसानों की रीढ़ का टूटना।
क्षेत्र में चारे की कमी के कारण अन्ना अथवा छुट्टा पशुओं इतिहास रहा है। बांदा के प्रगतिशील किसान और आवर्तनशील खेती करने वाले प्रेम सिंह कहते हैं कि अन्ना प्रथा एक समय में पशु प्रबंधन का नायाब तरीका थी। 1960 के दशक में 25-30 प्रतिशत चारागाह जमीनों को वेस्टलैंड घोषित कर पट़्टे पर दे दिया गया। इससे हर गांव में पशु चराई के लिए इस्तेमाल होने वाली सार्वजनिक जमीनें खत्म हो गईं। वहीं दूसरी तरफ लोग पशुओं को छुट्टा छोड़ते रहे और इन जानवरों ने खेती को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। भूमि सुधारों के नाम पर सार्वजनिक जमीन का निजीकरण एक अदूरदर्शिता पूर्ण नीति थी जिससे पशु प्रबंधन का नायाब तरीका समस्या बनकर सामने आ गई। खेतों में पशुओं का उपयोग बंद होने और 2017 में बूचड़खाने बंद होने से पशु बाजार बंद हो गए और निराश्रित पशुओं की संख्या बेहताशा बढ़ गई। 2019 की 20वीं पशुधन गणना को अनुसार देश में कुल 50.2 लाख आवारा मवेशी हैं। उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या 11.8 लाख है। इनमें से 3.18 लाख निराश्रित पशु केवल उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के थे।
निराश्रित पशुओं के प्रबंधन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से लगभग हर गांव में स्थायी और अस्थायी गोशालाएं बनाई गई हैं, जिसमें प्रति मवेशी हर महीने 1,500 रुपए का भुगतान किया जाता है। मौजूदा बजट में सरकार ने गोशालाओं के लिए 1,200 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। बांदा निवासी देवनारायण सिंह के अनुसार, गोशालाओं के प्रबंधन में भारी अनियमितताएं हैं और ये भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई हैं।
महोबा जिले के एक ग्राम पंचायत अधिकारी नाम गुप्त रखने की शर्त पर डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि इसी कारण गोशालाओं में भूख से मवेशियों के मरने की घटनाएं लगातार सामने आती हैं। वह कहते हैं कि अक्सर गोशालाओं में अधिक मवेशी दिखाकर सरकार को पैसों की डिमांड भेजी जाती है। इन पैसों की प्रधान और सचिव के स्तर पर बंटरबांट होती है। उनके अनुसार, कुछ गोशालाओं में चारे का इतना अभाव रहता है कि पशुओं को रात को निकाल दिया जाता है ताकि खेतों में पहुंचकर पेट कर सकें।
बांदा जिले के बसहरी गांव के किसान इंद्रपाल मानते हैं कि बूचड़खाने बंद होने से जानवरों को कोई फायदा नहीं हुआ। पहले वे बूचड़खानों में मरते, अब भूख से मर रहे हैं। वह यह भी कहते हैं कि किसानों को प्राकृतिक आपदा से नुकसान पर मुआवजा मिलता है लेकिन जानवरों से नुकसान पर कोई मुआवजा नहीं है। उनके अनुसार, करीब एक दशक पहले क्षेत्र में कम पानी में उगने वाला और पौष्टिक कठिया गेहूं बड़े पैमाने पर उगाया जाता था लेकिन अब किसानों से जानवरों के डर से इसे उगाना बंद कर दिया है।
शिवकुमार के अनुसार, अगर सभी अन्ना पशु गोशालाओं में भेज दिए जाएं तो खेती को पहुंचने वाले नुकसान में 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है, लेकिन गोशाला प्रधान के अधीन रहने पर सुधार की उम्मीद नहीं है।