भारत में चलते धूल और रेत भरे अंधड़; फोटो: आईस्टॉक 
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वायुमंडल से गायब हो रही धूल, 2003 से 10 फीसदी की आई रहस्यमयी गिरावट; क्या है इसका क्लाइमेट कनेक्शन?

रिसर्च में खुलासा हुआ है कि 2003 से 2023 के बीच वातावरण में मौजूद धूल में 10 फीसदी की कमी आई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसका असर वैश्विक तापमान के बढ़ने पर पड़ सकता है।

Lalit Maurya

  • आसमान में दिखाई न देने वाले धूल के बेहद महीन कण धरती की जलवायु को प्रभावित करने वाली एक अहम प्राकृतिक कड़ी हैं। अब एक नए अध्ययन ने इस कड़ी में हो रहे बदलाव की ओर ध्यान खींचा है।

  • रिसर्च से पता चला है कि, 2003 से 2023 के बीच पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद धूल की मात्रा करीब 10 फीसदी घट गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, धूल में आई यह कमी मानव गतिविधियों से हो रही गर्मी में मामूली इजाफा कर सकती है, हालांकि वैश्विक तापमान बढ़ने की मुख्य वजह अब भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है।

  • धूल के कण सूर्य की कुछ किरणों को परावर्तित कर वापस अंतरिक्ष में भेजते हैं, जिससे धरती पर पड़ने वाली सौर गर्मी कुछ कम होती है। इसलिए वातावरण में धूल घटने का अर्थ इस प्राकृतिक ठंडक में कमी भी हो सकता है। लेकिन वैज्ञानिक अभी यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि पिछले दो दशकों में धूल क्यों घटी है। बदलती हवाएं, जमीन की स्थिति और दूसरे पर्यावरणीय बदलाव इसके संभावित कारणों में शामिल हैं।

  • इस बदलाव का असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं है। धूल समुद्र और जमीन तक पोषक तत्व पहुंचाने में मदद करती है, जबकि बर्फ पर जमकर वह उसके पिघलने की रफ्तार भी बढ़ा सकती है। दूसरी ओर, सूखती झीलें और जलाशय भी धूल के नए स्रोत बन रहे हैं।

  • वैज्ञानिकों के मुताबिक, वायुमंडल में धूल अभी भी औद्योगिक युग से पहले के स्तर से अधिक है। इसलिए इसका बदलता चक्र जलवायु, हवा की गुणवत्ता, पारिस्थितिकी तंत्र और पानी के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।

भले ही धरती के ऊपर फैला वायुमंडल हमें अपनी आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन उसमें मौजूद धूल के बेहद महीन कण मौसम और जलवायु को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। हम अक्सर धूल को गंदगी और प्रदूषण से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है।

आसमान में मौजूद यही धूल सूर्य की किरणों को वापस अंतरिक्ष की ओर भेजकर धरती को उसकी तपिश से भी बचाती है।

अब इस कड़ी में किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि पिछले दो दशकों में वायुमंडल में मौजूद इस धूल में करीब 10 फीसदी की गिरावट आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस गिरावट का असर धरती के बढ़ते तापमान पर पड़ सकता है।

इसे समझने के लिए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स (यूसीएलए) से जुड़े वैज्ञानिकों ने 2003 से 2023 के बीच वायुमंडलीय धूल में आए बदलाव का अध्ययन किया है। इसके लिए उन्होंने उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों, जमीन पर किए गए माप और वायुमंडलीय मॉडल की मदद ली है। इसके निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं।

दो दशकों में 10 फीसदी कम हुई धूल

अध्ययन के मुताबिक, 2003 से 2023 के बीच पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद धूल की मात्रा में करीब 10 फीसदी की कमी आई है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धूल का वैश्विक जलवायु तंत्र पर लगातार असर पड़ता है।

गौरतलब है कि वातावरण में छाई इस धूल का बड़ा हिस्सा उत्तरी गोलार्ध से आता है। उत्तरी अफ्रीका का सहारा मरुस्थल और एशिया के विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र, खासकर गोबी, दुनिया में धूल के प्रमुख स्रोत हैं। तेज हवाएं इन क्षेत्रों से धूल के महीन कणों को उठाकर हजारों किलोमीटर दूर तक ले जाती हैं।

हालांकि, वैज्ञानिक अभी तक यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि हाल के वर्षों में वायुमंडलीय धूल के घटने की वजह क्या है।

इससे पहले की गई एक अन्य रिसर्च से पता चला है कि हर साल 200 करोड़ टन धूल और रेत हमारे वातावरण में प्रवेश कर रही है। यह धूल कितनी ज्यादा है, इसी बात से समझा जा सकता है कि इस धूल और रेत का कुल वजन गीजा के 307 महान पिरामिडों के बराबर है।

आंकड़ों के मुताबिक वातावरण में पहुंचने वाली 80 फीसदी से ज्यादा धूल उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व के रेगिस्तानों से उठती है और हजारों किलोमीटर दूर महाद्वीपों और समुद्रों को पार कर फैल जाती है।

डब्ल्यूएमओ ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की है कि 150 देशों के करीब 33 करोड़ लोग धूल भरे रेतीले तूफानों से प्रभावित हैं, जो उनकी सेहत पर गहरा असर डाल रहा है। रुझान दर्शाते हैं कि 2018 से 2022 के बीच करीब 380 करोड़ लोग यानी दुनिया की करीब आधी आबादी धूल के खतरनाक स्तर के संपर्क में आई थी। यह आंकड़ा 2003 से 2007 के मुकाबले 31 फीसदी अधिक है।

वहीं एक अन्य खोज दर्शाती है कि आर्कटिक में बढ़ते तापमान की वजह से पृथ्वी के कई हिस्सों में धूल का स्तर घट रहा है, जिससे भारत पर भी असर पड़ रहा है।

धूल कम हुई तो गर्मी पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों के मुताबिक वायुमंडल में तैरते धूल के कण सूर्य से आने वाली कुछ किरणों को परावर्तित कर वापस अंतरिक्ष की ओर भेज देते हैं। इससे धरती की सतह तक पहुंचने वाली सूर्य की तपिश कुछ कम हो जाती है और इसका हल्का ठंडा प्रभाव पड़ता है।

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता और यूसीएलए के वायुमंडलीय वैज्ञानिक जैस्पर कोक के मुताबिक, धूल में आई कमी ने मानव गतिविधियों से हो रही गर्मी में मामूली इजाफा किया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि धूल में आई कमी जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह है। मानव गतिविधियों से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन आज भी वैश्विक तापमान बढ़ने का प्रमुख कारण है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक अशोक गुप्ता का इस बारे में कहना है, यह अब तक का सबसे मजबूत प्रमाण है कि 21वीं सदी की शुरुआत में धरती का वायुमंडल पहले से कम धूलभरा हुआ है।

डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट से पता चला है कि हवा में आ रहे बदलावों का सामना न केवल राजस्थान बल्कि दुनिया के लगभग सभी रेतीले इलाके कर रहे हैं। राजस्थान में पिछले कई दशकों में आंधियों की संख्या घटी है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान से संबद्ध केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक पीसी मोहराणा के एक अध्ययन के मुताबिक हवा की ताकत में भारी गिरावट आई है, जिसके चलते धूल भरी आंधियों की संख्या औसतन सालाना 17 से घटकर पांच रह गई है।

पूरे राज्य में 1970 से 2013 के बीच रेत के टीलों में 16 प्रतिशत की गिरावट आई है।

20वीं सदी के रुझान से अलग है बदलाव

वायुमंडल में धूल का मौजूदा बदलाव इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि 20वीं सदी के दौरान धूल की मात्रा में बढ़ोतरी देखी गई थी। वैज्ञानिकों के अनुसार उस दौरान वायुमंडलीय धूल 1980 के दशक में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि, उस वृद्धि के पीछे की वजह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

अब इसके उलट धूल में कमी का रुझान दिखाई दे रहा है। ऐसे में वैज्ञानिक यह पता लगाने में जुटे हैं कि इसके पीछे हवा की बदलती रफ्तार, जमीन की स्थिति और दूसरे पर्यावरणीय बदलावों की कितनी भूमिका है।

सिर्फ जलवायु नहीं, प्रकृति के लिए भी जरूरी धूल

सच कहें तो वातावरण में मौजूद धूल को केवल प्रदूषण या गंदगी के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसके कण समुद्र और जमीन तक कई पोषक तत्व और खनिज पहुंचाने में मदद करते हैं। यानी धूल का एक हिस्सा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जरूरी प्राकृतिक प्रक्रिया का भी अहम हिस्सा है।

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरमेंटल साइंसेज के पूर्व डीन उमेश चंद्र कुलश्रेष्ठ का कहना है कि वायुमंडलीय धूल की प्रचुरता को एक वरदान भी माना जा सकता है, क्योंकि यह भारतीय वायुमंडल में अम्लीकरण को नियंत्रित करती है। कैल्शियम कार्बोनेट से भरपूर मिट्टी की धूल वातावरण में कैल्शियम सल्फेट बनाने वाले सल्फर डाइऑक्साइड स्कैवेंजर के रूप में कार्य करती है।

कुलश्रेष्ठ अप्रैल 2015 में वायुमंडलीय धूल के महत्व पर प्रकाशित रिसर्च पेपर इंपोर्टेंस ऑफ एटमोस्फेरिक डस्ट इन इंडिया: फ्यूचर स्कोप ऑफ रिसर्च के प्रमुख लेखक हैं।

हालांकि, धूल वायु प्रदूषण में भी योगदान देती है। इसके अलावा जब धूल बर्फ और हिम पर जमती है तो उनकी सतह की चमक कम हो जाती है। इससे बर्फ और हिम अधिक मात्रा में सूर्य की ऊर्जा सोखने लगते हैं और उनके पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है।

इस तरह वायुमंडल में धूल का कम या ज्यादा होना सिर्फ तापमान का सवाल नहीं, बल्कि इसका असर हवा की गुणवत्ता, पारिस्थितिकी तंत्र और बर्फ-पानी के चक्र पर भी पड़ सकता है।

सूखती झीलें भी बन रहीं धूल का स्रोत

दिलचस्प बात यह है कि आज की वायुमंडलीय धूल का कुछ हिस्सा पारंपरिक रेगिस्तानों से नहीं, बल्कि सूखती झीलों और जलाशयों की जमीन से भी आ रहा है। कैलिफोर्निया का साल्टन सी और ओवेन्स वैली, अमेरिका की ग्रेट साल्ट लेक तथा कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान की सीमा पर स्थित अरल सागर इसके मुख्य उदाहरण हैं।

इन क्षेत्रों में कृषि और दूसरी मानवीय जरूरतों के लिए पानी का रुख बदलने से जलाशयों का कुछ हिस्सा सूख गया, जिससे वहां की सूखी जमीन धूल का स्रोत बनने लगी।

यह दिखाता है कि पानी के इस्तेमाल से जुड़े इंसानी फैसलों के असर कभी-कभी स्थानीय सीमाओं से बहुत आगे तक पहुंच सकते हैं और वायुमंडल को भी प्रभावित कर सकते हैं।

अभी भी कई सवालों के जवाब खोजने हैं बाकी

वैज्ञानिकों के मुताबिक, हाल की कमी के बावजूद वायुमंडल में धूल का स्तर औद्योगिक युग से पहले की तुलना में अभी भी अधिक है।

ऐसे में अब शोधकर्ताओं का अगला सवाल यही है कि धूल में आई मौजूदा कमी आखिर क्यों हो रही है। शोधकर्ता अशोक गुप्ता और उनकी टीम यह समझने की कोशिश कर रही है कि बदलती सतही हवाओं और दूसरे पर्यावरणीय बदलावों का इसमें कितना योगदान है।

देखा जाए तो इस बदलाव को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के साथ वायुमंडलीय धूल का चक्र किस दिशा में जाएगा, इसका असर धरती की गर्मी, हवा की गुणवत्ता, पारिस्थितिकी तंत्र और बर्फ के पिघलने पर पड़ सकता है।