जल संकट के बीच अपशिष्ट जल से सिंचाई नई जरूरत बन रही है, लेकिन वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि इसके साथ दवाओं के अंश भी फसलों में पहुंच रहे हैं।
राहत की बात यह है कि ये रसायन मुख्य रूप से पत्तियों में जमा होते हैं, जबकि खाने योग्य हिस्सों में इनकी मात्रा कम पाई गई, फिर भी यह सवाल अब टल नहीं सकता कि हमारी थाली कितनी सुरक्षित है।
दुनिया में जैसे-जैसे जल संकट गहरा रहा है, उसके साथ ही खेतों की प्यास बुझाने के लिए पानी की हर बूंद कीमती होती जा रही है।
यही वजह है कि जिन क्षेत्रों में पानी की भारी किल्लत है, वहां किसान खेतों की प्यास बुझाने के लिए शुद्ध किए अपशिष्ट जल (वेस्टवॉटर) का भी सहारा ले रहे हैं। इससे पानी की बचत तो होती है, लेकिन नई चिंता भी उभर रही है। दरअसल, इस पानी में अदृश्य रूप से कई रसायनों के अंश मौजूद हो सकते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या इस पानी के साथ दवाओं के अंश भी हमारी फसलों तक पहुंच रहे हैं?
इस बारे में जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए नए अध्ययन में सामने आया है कि टमाटर, गाजर और लेट्यूस जैसी फसलें इस तरह के पानी में मौजूद कुछ दवाओं के अंश को अपने भीतर जमा कर सकती हैं। लेकिन राहत की बात यह है कि ये रसायन मुख्य रूप से पत्तियों में इकट्ठा होते हैं, यानी टमाटर के फल और गाजर की जड़, जिन्हें हम खाते हैं, उनमें इनकी मात्रा काफी कम पाई गई।
पत्तियों में छिपा ‘दवा का असर’
यह अध्ययन बताता है कि जब पौधों को ऐसे पानी से सींचा जाता है जिसमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दवाओं के सूक्ष्म अंश मौजूद हों, तो ये पदार्थ जड़ों से होकर तने के जरिए पत्तियों तक पहुंच जाते हैं। पानी तो पत्तियों से भाप बनकर उड़ जाता है, लेकिन दवाओं के अंश वहीं ठहर जाते हैं।
इस शोध में टमाटर, गाजर और लेट्यूस जैसी आम फसलों का अध्ययन किया गया। इसमें सामने आया कि एंटीडिप्रेसेंट और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दवाओं जैसे रसायन पौधों द्वारा अवशोषित किए जाते हैं।
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि टमाटर की पत्तियों में इन रसायनों की मात्रा फल की तुलना में 200 गुणा तक ज्यादा हो सकती है। इसी तरह, गाजर की पत्तियों में जड़ से करीब सात गुणा ज्यादा दवा के अंश मिले। यानी, जो हिस्सा हम खाते हैं, उसमें इन दवाओं की मात्रा बहुत कम होती है।
अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
ऐसा क्यों होता है इस बारे में वैज्ञानिकों ने जानकारी दी है कि पानी जड़ों से ऊपर पत्तियों तक जाता है और साथ में दवाओं के अंश भी ले जाता है। पत्तियों तक पहुंचने के बाद पानी तो भाप बनकर उड़ जाता है, लेकिन दवाएं वहीं जमा रह जाती हैं।
पौधों के पास इन रसायनों को बाहर निकालने का कोई मजबूत तंत्र नहीं होता। वे इन्हें अपनी कोशिकाओं में जमा कर लेते हैं, कुछ पत्तियों की दीवारों में चिपक जाते हैं, तो कुछ “वैक्यूल” नाम के छोटे भंडारण हिस्सों में बंद हो जाते हैं। समय के साथ ये अंश जमा होते जाते हैं।
क्या यह स्वास्थ्य के लिए खतरा है?
शोध में यह भी पाया गया कि अलग-अलग दवाओं का व्यवहार अलग होता है। कुछ दवाएं बहुत कम मात्रा में पाई गईं, जबकि कुछ, जैसे कार्बामाजेपीन पौधे के हर हिस्से में ज्यादा मात्रा में जमा होती दिखीं, यहां तक कि खाने योग्य हिस्सों में भी।
विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं है कि ये दवाएं हमारी सेहत पर सीधा असर डाल रही हैं। लेकिन यह जरूर साफ हो गया है कि जैसे-जैसे पानी की कमी बढ़ेगी और हम अपशिष्ट जल का इस्तेमाल बढ़ाएंगे, वैसे-वैसे हमें इसकी सुरक्षा को लेकर ज्यादा गहराई से समझ विकसित करनी होगी।
वैज्ञानिक साफ कहते हैं कि इन नतीजों को सीधे स्वास्थ्य खतरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह अध्ययन सिर्फ यह समझने के लिए है कि फसलें इन रसायनों को अपने भीतर कैसे और कहां जमा करती हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक दुनिया भर में जिस तरह से पानी की किल्लत बढ़ रही है। ऐसे में अपशिष्ट जल का दोबारा उपयोग कृषि के लिए एक जरूरी विकल्प बनता जा रहा है।
लेकिन इसके साथ ही यह समझना बेहद जरूरी है कि कौन से रसायन फसलों में पहुंच रहे हैं। वे फसलों के किस हिस्से में जमा हो रहे हैं और क्या भविष्य में इसके लिए नियम बनाने की जरूरत होगी। अध्ययन बताता है कि अपशिष्ट जल से सिंचाई पूरी तरह खतरनाक नहीं है, लेकिन इसके प्रभावों को गहराई से समझना बेहद जरूरी है।
ऐसे में पानी की बढ़ती किल्लत के दौर में अपशिष्ट जल खेती का सहारा तो बन रहा है, लेकिन यह सवाल भी छोड़ रहा है कि क्या हम अनजाने में अपनी थाली में रसायनों का एक नया खतरा ला रहे हैं? फिलहाल राहत है कि खाने वाले हिस्सों में इनका स्तर कम है, लेकिन यह चेतावनी भी उतनी ही साफ है कि अब सिर्फ पानी बचाना ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता को समझना और नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी है।
आने वाले समय में यही संतुलन तय करेगा कि हमारी फसलें सिर्फ पेट भरेंगी या सेहत भी सुरक्षित रखेंगी।