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वन्य जीव एवं जैव विविधता

कुकरैल नाइट सफारी को सुप्रीम कोर्ट से मिली हरी झंडी, लेकिन पर्यावरण से जुड़ी शर्तों का करना होगा पालन

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के साथ ही देश की पहली नाइट सफारी का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन अदालत ने विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • देश की पहली कुकरैल नाइट सफारी और प्राणी उद्यान परियोजना को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिल गई है, जिससे लखनऊ में इस महत्वाकांक्षी परियोजना के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है।

  • हालांकि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह मंजूरी बिना शर्त नहीं है। परियोजना को केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी), केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए), पर्यावरण मंत्रालय और अन्य सक्षम प्राधिकरणों द्वारा तय सभी पर्यावरणीय एवं वैधानिक शर्तों का सख्ती से पालन करना होगा।

  • अदालत ने सीईसी को परियोजना की नियमित निगरानी और 28 अक्टूबर 2026 तक पहला निरीक्षण कर रिपोर्ट सौंपने का भी निर्देश दिया है।

  • उत्तर प्रदेश सरकार ने भरोसा दिया है कि परियोजना क्षेत्र के करीब 71 फीसदी हिस्से को हरित आवरण के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा, केवल आवश्यक होने पर ही पेड़ों की कटाई या स्थानांतरण होगा और विदेशी आक्रामक प्रजातियों की जगह देशी पौधे लगाए जाएंगे।

  • सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक बड़ी विकास परियोजना को मंजूरी भर नहीं है, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते सभी कानूनी और पर्यावरणीय मानकों का पूरी ईमानदारी से पालन किया जाए।

लखनऊ में देश की पहली 'कुकरैल नाइट सफारी और प्राणी उद्यान' परियोजना के निर्माण का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस ड्रीम प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है।

अदालत का यह फैसला लखनऊ स्थित ऐतिहासिक नवाब वाजिद अली शाह चिड़ियाघर को कुकरैल के आरक्षित वन क्षेत्र में स्थानांतरित करने और एक आधुनिक नाइट सफारी विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

हालांकि परियोजना को मंजूरी देते हुए अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी), केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) तथा अन्य सक्षम वैधानिक प्राधिकरणों द्वारा निर्धारित सभी शर्तों और सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य होगा।

15 जुलाई 2026 को दिए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी को परियोजना की नियमित निगरानी करने और समय-समय पर साइट का निरीक्षण करने का भी निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि पहला निरीक्षण 28 अक्टूबर 2026 तक पूरा किया जाए और इसके बाद रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि परियोजना का कोई भी ऐसा हिस्सा, जिसके लिए अलग से वैधानिक मंजूरी या अनुमति आवश्यक है, उसे संबंधित सक्षम प्राधिकरण की अनुमति मिलने से पहले शुरू नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार सीईसी, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, पर्यावरण मंत्रालय तथा अन्य सक्षम प्राधिकरणों द्वारा निर्धारित सभी शर्तों का पूरी तरह पालन करेगी।

सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा यह मामला?

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ के कुकरैल वन क्षेत्र में नाइट सफारी और जूलॉजिकल पार्क स्थापित करने की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन किया था।

यह आवेदन इसलिए आवश्यक हुआ क्योंकि 19 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा था कि संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थित वन क्षेत्रों में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत किसी भी नए चिड़ियाघर या सफारी को राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा तब तक मंजूरी नहीं दी जाएगी, जब तक शीर्ष अदालत की पूर्व अनुमति न मिल जाए।

उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत को बताया कि 24 अगस्त 2022 के सरकारी आदेश के तहत मौजूदा नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान, लखनऊ को उसके मौजूदा स्थान से हटाकर कुकरैल वन क्षेत्र में नया जूलॉजिकल पार्क और नाइट सफारी विकसित करने का निर्णय लिया गया। सरकार के अनुसार, मौजूदा चिड़ियाघर शहर के अत्यधिक घनी आबादी वाले क्षेत्र और व्यस्त सड़कों के बीच स्थित है।

ऐसे में वहां वन्यजीव संरक्षण, प्रजनन, विस्तार और आधुनिक पशु बाड़ों के विकास की पर्याप्त संभावनाएं नहीं हैं।

बढ़ाया गया परियोजना का दायरा

शुरुआत में परियोजना के तहत करीब 150 एकड़ में जूलॉजिकल पार्क और 350 एकड़ में नाइट सफारी विकसित करने का प्रस्ताव था। बाद में 22 जुलाई 2024 के सरकारी आदेश से परियोजना क्षेत्र को बढ़ाकर 855.07 एकड़ कर दिया गया।

कुकरैल वन क्षेत्र भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत अधिसूचित आरक्षित वन है, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 2,027.4 हेक्टेयर है। प्रस्तावित परियोजना इस क्षेत्र के 855.07 एकड़ में विकसित की जानी है।

71 फीसदी क्षेत्र रहेगा 'ग्रीन'

राज्य सरकार ने अदालत को बताया है कि परियोजना क्षेत्र का 610.34 एकड़ (करीब 71 फीसदी) हिस्सा हरित आवरण के रूप में सुरक्षित रहेगा। केवल अनिवार्य स्थिति में ही पेड़ों को काटा या स्थानांतरित किया जाएगा। साथ ही, पारिस्थितिकीय संतुलन को बेहतर बनाने के लिए विदेशी आक्रामक पौधों की जगह स्थानीय (देशी) प्रजातियों के पौधे लगाए जाएंगे।

राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह क्षेत्र न तो किसी वन्यजीव गलियारे (वाइल्डलाइफ कॉरिडोर) का हिस्सा है और न ही किसी संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र के निकट स्थित है।

पहले ही मिल चुकी थीं कई अहम मंजूरियां

उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत में जानकारी दी है कि15 मई 2023 को केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने परियोजना को प्रारंभिक मंजूरी दी थी। इसके बाद 10 जून 2024 को स्थापना की अनुमति मिली और 20 सितंबर 2024 को विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) एवं लेआउट को प्रमाणित किया गया।

इसके अलावा 31 जनवरी 2025 को पशु बाड़ों के डिजाइन को मंजूरी दी गई, जबकि 28 फरवरी 2025 को परियोजना के पहले चरण के लिए प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति भी प्रदान कर दी गई।

सीईसी ने जांच के बाद दी थी सकारात्मक सिफारिश

सुप्रीम कोर्ट ने 29 अगस्त 2025 को इस परियोजना से जुड़ा प्रस्ताव सीईसी को भेजते हुए उसपर विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी थी। अदालत ने परियोजना का विरोध करने वाले पक्षों को भी सीईसी के समक्ष अपनी आपत्तियां रखने की अनुमति दी थी।

सीईसी ने 27 नवंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए सभी दस्तावेजों, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की मंजूरियों, राज्य सरकार के पक्ष और प्राप्त आपत्तियों की समीक्षा के बाद सिफारिश की कि यदि रिपोर्ट में सुझाई गई सभी शर्तों और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन किया जाए, तो कुकरैल नाइट सफारी और जूलॉजिकल पार्क परियोजना को अनुमति दी जा सकती है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश की पहली कुकरैल नाइट सफारी का रास्ता तो साफ कर दिया है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण संरक्षण से समझौता किए बिना ही इस परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है। अब इस परियोजना की सफलता केवल इसके निर्माण से नहीं, बल्कि अदालत और पर्यावरणीय संस्थाओं की सभी शर्तों के ईमानदार पालन पर निर्भर करेगी।