मौजूदा समय में दुनिया की करीब एक-तिहाई जमीन ऐसी है जहां कम से कम 10 फीसदी विदेशी पौधे उग सकते हैं। इन क्षेत्रों को वैज्ञानिकों ने “इनवेजन हॉटस्पॉट” यानी आक्रमण के सबसे बड़े खतरे वाले इलाके बताया है; फोटो: आईस्टॉक 
वन्य जीव एवं जैव विविधता

जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ रही ‘घुसपैठ’, नए इलाकों में फैल रहे विदेशी पौधे

दुनिया की करीब एक-तिहाई जमीन पर विदेशी आक्रामक पौधों का खतरा मंडरा रहा है। वहीं बढ़ते तापमान के साथ दुनिया में पौधों का भूगोल बदल रहा है, जिससे 'इनवेजन हॉटस्पॉट' तेजी से नए इलाकों में उभर रहे हैं।

Lalit Maurya

  • जलवायु परिवर्तन के साथ दुनिया भर में विदेशी आक्रामक पौधों का फैलाव तेजी से बढ़ रहा है और अब दुनिया की करीब एक-तिहाई जमीन इनके खतरे में है।

  • बढ़ते तापमान के कारण पौधों का वैश्विक भूगोल बदल रहा है, जिससे आक्रमण के हॉटस्पॉट नए इलाकों में उभर रहे हैं, खासकर ठंडे और समशीतोष्ण क्षेत्रों में। वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि यह ‘घुसपैठ’ जैव विविधता, कृषि, अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

  • भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में इसके असर पहले से दिख रहे हैं, इसलिए समय रहते निगरानी, नियंत्रण और क्षेत्रीय रणनीति बनाना बेहद जरूरी होगा।

दुनिया में एक बड़ा लेकिन धीमा बदलाव हो रहा है, एक ऐसा बदलाव जिसे आम लोग शायद महसूस नहीं कर पा रहे। जलवायु परिवर्तन के कारण अब विदेशी पौधे उन इलाकों में फैल रहे हैं, जहां वे पहले कभी नहीं पाए जाते थे। वैज्ञानिक इसे प्रकृति के लिए एक धीमा लेकिन खतरनाक बदलाव मान रहे हैं। देखा जाए तो

दुनिया में बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन का असर अब महज तापमान और मौसम तक सीमित नहीं, बल्कि इसका प्रभाव धरती के पेड़-पौधों पर भी तेजी से दिखने लगा है।

इस बारे में किए एक नई अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि विदेशी यानी बाहर से लाए गए पौधे अब दुनिया के नए इलाकों में फैलने लगे हैं और आने वाले समय में यह खतरा और बढ़ सकता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल नेचर इकोलॉजी एंड एवोल्यूशन में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में वियना विश्वविद्यालय सहित दुनिया के कई अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है।

क्या हैं विदेशी आक्रामक पौधे और क्यों हैं खतरनाक?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, ‘एलियन’ या विदेशी पौधे वे होते हैं जिन्हें इंसान कृषि, बागवानी, सजावटी पौधों या व्यापार के जरिए एक देश से दूसरे देश में ले जाता है।

इन पौधों में से कुछ नए वातावरण में बहुत तेजी से पनपने लगते हैं और पौधों की स्थानीय प्रजातियों को खत्म कर देते हैं। इससे न केवल जैव विविधता को नुकसान होता है, बल्कि कृषि पैदावार भी घटती है और कई मामलों में इंसानों के स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर कुछ विदेशी पौधों के पराग से लोगों में तेज एलर्जी की समस्या होती है।

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में पौधों की 9,701 विदेशी प्रजातियों के आंकड़ों के साथ-साथ तापमान, बारिश तथा भूमि उपयोग जैसे पर्यावरणीय कारकों का विश्लेषण किया। इसके आधार पर कंप्यूटर मॉडल की मदद से यह पता लगाया गया कि अभी दुनिया के कौन-कौन से इलाके इन पौधों के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल हैं और भविष्य में यह खतरा किन क्षेत्रों में बढ़ेगा।

खतरे में एक-तिहाई दुनिया, कहां हैं इनवेजन हॉटस्पॉट

रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में दुनिया की करीब एक-तिहाई जमीन ऐसी है जहां कम से कम 10 फीसदी विदेशी पौधे उग सकते हैं। इन क्षेत्रों को वैज्ञानिकों ने “इनवेजन हॉटस्पॉट” यानी आक्रमण के सबसे बड़े खतरे वाले इलाके बताया है। अभी ये हॉटस्पॉट मुख्य रूप से उप-उष्णकटिबंधीय और गर्म समशीतोष्ण क्षेत्रों जैसे यूरोप, उत्तर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में केंद्रित हैं।

वैज्ञानिकों ने इस बात का भी खुलासा किया है कि इस समस्या को बढ़ाने में इंसानी गतिविधियों की बड़ी भूमिका है। जब जंगल काटे जाते हैं, शहरों का विस्तार होता है या नई सड़कें और निर्माण होते हैं, तो पौधों की स्थानीय प्रजातियां नष्ट हो जाती हैं और विदेशी पौधों के फैलने के लिए जगह बन जाती है।

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार और यात्रा के जरिए बीज एक देश से दूसरे देश तक पहुंच जाते हैं, जिससे नए क्षेत्रों में इन पौधों के पनपने की संभावना बढ़ जाती है।

बदलता भूगोल: अब ठंडे इलाकों की ओर बढ़ेगा खतरा

अध्ययन की सबसे बड़ी चेतावनी यह है कि आने वाले दशकों में आक्रामक विदेशी पौधों के हॉटस्पॉट यानी सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाकों का भूगोल बदल जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण यह खतरा धीरे-धीरे ठंडे और समशीतोष्ण क्षेत्रों की ओर खिसकने लगेगा, जबकि बहुत ज्यादा गर्म और सूखे उप-उष्णकटिबंधीय इलाकों में इसका असर कुछ कम हो सकता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि जो क्षेत्र आज तक अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे, वही आने वाले समय में आक्रामक पौधों के सबसे बड़े शिकार बन सकते हैं। यानी खतरा बढ़ ही नहीं रहा, बल्कि अपना ठिकाना भी बदल रहा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भविष्य में सिर्फ जगह ही नहीं बदलेगी, बल्कि विदेशी पौधों की प्रजातियां भी बदल जाएंगी। यानी आज जो विदेशी पौधे किसी क्षेत्र में हैं, उनकी जगह भविष्य में नई प्रजातियां ले सकती हैं, जो गर्म जलवायु में ज्यादा तेजी से फैलने में सक्षम होंगी। इससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना बदल सकती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, पौधों के प्रसार में तापमान सबसे बड़ा कारक है। जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ेगा, वैसे-वैसे नए इलाके इन पौधों के लिए अनुकूल बनते जाएंगे। यही वजह है कि उत्तरी जंगलों और ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे अब तक अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों में भी भविष्य में विदेशी पौधों का खतरा बढ़ सकता है। ये इलाके पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं, ऐसे में वहां छोटे बदलाव भी बड़े नुकसान का कारण बन सकते हैं।

नई प्रजातियां, नया खतरा

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि इसका असर सिर्फ प्रकृति तक सीमित नहीं रहेगा। विदेशी आक्रामक पौधे कृषि को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जैव विविधता कम कर सकते हैं और एलर्जी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ा सकते हैं।

चिंता की बात यह है कि भविष्य के कई उच्च-जोखिम वाले इलाके घनी आबादी वाले क्षेत्र में भी हैं, जिससे यह समस्या सीधे मानव जीवन को प्रभावित कर सकती है।

ईटीएच ज्यूरिख से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए एक अध्ययन से पता चला है कि कश्मीर सहित दुनिया भर में परिवहन मार्गों के साथ-साथ पौधों की विदेशी प्रजातियां तेजी से ऊंचे अनछुए पहाड़ी क्षेत्रों में भी फैल रही हैं।

"द असेसमेंट रिपोर्ट ऑन इनवेसिव एलियन स्पीशीज एंड देयर कंट्रोल" नामक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 60 फीसदी पौधों और जानवरों के विलुप्त होने की वजह विदेशी आक्रामक प्रजातियां हैं।

पहाड़ों तक पहुंची घुसपैठ, कश्मीर जैसे इलाके भी अछूते नहीं

इस रिपोर्ट में आक्रामक विदेशी प्रजातियों को दुनिया भर में जैव विविधता को हो रहे नुकसान के सबसे बड़े कारकों में से एक के रूप में पहचाना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 37,000 से ज्यादा विदेशी प्रजातियां हैं, जिनमें से करीब 3500 से ज्यादा आक्रामक प्रजातियां हैं जो अपने मूल स्थानों से दूर भी स्थानीय जैवविविधता के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। वहीं हर साल 200 नई विदेशी प्रजातियां दर्ज की जाती हैं।

पिछले शोधों से भी पता चला है कि विदेशी आक्रामक प्रजातियां न केवल पर्यावरण और जैवविविधता बल्कि कृषि, पर्यटन और स्वास्थ्य के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन चुकी हैं। एक अध्ययन के मुताबिक 1970 से 2017 के बीच विदेशी आक्रामक प्रजातियों से 94.5 लाख करोड़ रूपए से ज्यादा का नुकसान हुआ था।

यदि भारत की बात करें तो देश में भी आक्रामक विदेशी प्रजातियां स्थानीय जैवविविधता के लिए बड़ा खतरा बन चुकी हैं। इनमें से एक विलायती कीकर भी है, जिसे अंग्रेज 20वीं शताब्दी की शुरूआत में दिल्ली लाए थे, इसके बाद यह प्रजाति पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैल गई। ऐसा ही एक मामला असम में सामने आया है, जहां एक विदेशी आक्रमणकारी पौधा लुडविगिया पेरूविया धनसीरी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के साथ-साथ कोपिली नदी के पूर्वी हिस्‍से में स्थित स्थानीय जैव विविधता के लिए खतरा बन गया है।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि यह समस्या स्थिर नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों के साथ लगातार बदल रही है। इसलिए जरूरी है कि अलग-अलग क्षेत्रों के लिए पहले से रणनीति बनाई जाए, निगरानी बढ़ाई जाए और समय रहते इन पौधों को नियंत्रित करने के उपाय किए जाएं, ताकि प्रकृति और मानव जीवन दोनों को बड़े नुकसान से बचाया जा सके।

देखा जाए तो प्रकृति का यह बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है, इसलिए शायद हमें अभी इसका एहसास नहीं, लेकिन अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाली पीढ़ियां शायद वह प्रकृति कभी देख ही न पाएं, जिसे हम आज जानते हैं।