अध्ययन के अनुसार वर्ष 2050 तक जनसंख्या के बूढ़े होने से वैश्विक जल निकासी 15 से 31 फीसदी कम हो सकती है फोटो साभार: आईस्टॉक
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बुजुर्गों की बढ़ती संख्या से वैश्विक जल मांग में 31% तक की कमी संभव: अध्ययन

बढ़ती उम्र और बदलती जीवनशैली भविष्य में वैश्विक जल मांग को कैसे प्रभावित कर सकती है, इस पर एक नई वैज्ञानिक समझ

Dayanidhi

  • दुनिया भर में 65 वर्ष से अधिक आबादी में एक फीसदी वृद्धि होने पर कुल पानी का उपयोग औसतन 2.17 फीसदी तक घट जाता है।

  • अध्ययन के अनुसार वर्ष 2050 तक जनसंख्या के बूढ़े होने से वैश्विक जल निकासी 15 से 31 फीसदी कम हो सकती है।

  • भविष्य में चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में आबादी के वृद्ध होने से जल मांग 42 से 62 फीसदी घटने का अनुमान है।

  • उद्योग क्षेत्र में उम्र बढ़ने का सबसे बड़ा असर दिखता है, जहां पानी की निकासी लगभग 2.6 फीसदी घटती है।

  • युवा आबादी वाले उप-सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में उम्र बढ़ने से पानी की मांग में कमी का प्रभाव सीमित रहेगा।

पानी जीवन के लिए सबसे जरूरी संसाधन है। लेकिन आज पूरी दुनिया में पानी की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं सूखा बढ़ रहा है तो कहीं बाढ़ आ रही है। नदियां, झीलें और भूमिगत जल स्रोत दबाव में हैं। इसके साथ-साथ जनसंख्या बढ़ने और आर्थिक विकास के कारण पानी की मांग भी लगातार बढ़ रही है।

लेकिन हाल ही में वाटर रिसोर्स रिसर्च नाम की पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने पानी की मांग को लेकर एक अलग और रोचक बात सामने रखी है। इस शोध के अनुसार, दुनिया की आबादी का बूढ़ा होना (यानि बुजुर्गों की संख्या बढ़ना) भविष्य में पानी की मांग को काफी हद तक कम कर सकता है।

दुनिया बूढ़ी हो रही है

आज दुनिया भर में जन्म दर कम हो रही है और लोग पहले से ज्यादा लंबा जीवन जी रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 1960 के दशक में जहां बुजुर्गों की संख्या लगभग 13 करोड़ थी, वहीं आज यह संख्या 75 करोड़ के करीब पहुंच चुकी है। अनुमान है कि इस सदी के अंत तक यह संख्या 250 करोड़ तक पहुंच सकती है।

उम्र और पानी का संबंध

अक्सर हम सोचते हैं कि पानी की मांग सिर्फ इस बात पर निर्भर करती है कि कितने लोग हैं। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि लोगों की उम्र भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शोधकर्ताओं ने दुनिया के कई देशों के आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि जैसे-जैसे किसी देश में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ता है, वैसे-वैसे कुल पानी की खपत घटने लगती है।

आंकड़ों के अनुसार, यदि किसी देश में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों का अनुपात एक फीसदी बढ़ता है, तो कुल पानी की मांग लगभग 2.17 फीसदी कम हो जाती है। यह कमी सबसे ज्यादा उद्योग क्षेत्र में देखी गई, जहां पानी का उपयोग लगभग 2.6 फीसदी घटता है। घरेलू उपयोग में यह कमी करीब 2.3 फीसदी और कृषि में लगभग 1.9 फीसदी पाई गई।

ऐसा क्यों होता है?

बुजुर्ग लोग आमतौर पर युवाओं की तुलना में कम पानी से संबंधी गतिविधियां करते हैं। वे कम यात्रा करते हैं, कम उद्योगों में काम करते हैं और उनका उपभोग का तरीका भी अलग होता है। उदाहरण के लिए, वे कम नए सामान खरीदते हैं, जिनके उत्पादन में बहुत पानी लगता है। इस तरह उनकी जीवनशैली अप्रत्यक्ष रूप से पानी की मांग को कम करती है

यह कहना गलत होगा कि उम्र बढ़ने से पानी अपने-आप बच जाता है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उम्र बढ़ने से खपत के तरीके बदल जाते हैं और इसका असर पानी की कुल मांग पर पड़ता है।

एशिया में सबसे बड़ा असर

इस अध्ययन के अनुसार, एशिया के कई देशों में इस बदलाव का प्रभाव बहुत ज्यादा होगा। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि इन देशों में पानी की मांग 42 से 62 फीसदी तक कम हो सकती है।

यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भी पानी की मांग की वृद्धि धीमी हो सकती है या कुछ जगहों पर घट भी सकती है। इसके विपरीत, अफ्रीका के कई देशों में जहां आबादी अभी भी काफी युवा है, वहां उम्र बढ़ने से पानी की मांग में ज्यादा कमी नहीं आएगी।

पानी की मांग क्या होती है?

यह समझना जरूरी है कि “पानी की मांग” या “पानी की निकासी” का मतलब क्या है। पानी की निकासी का अर्थ है नदियों, झीलों या भूजल से पानी निकालकर उसे कृषि, उद्योग, बिजली उत्पादन या घरों में इस्तेमाल करना। यह जरूरी नहीं कि सारा निकाला गया पानी खत्म हो जाए, कई बार इस्तेमाल के बाद पानी फिर से नदियों में लौट जाता है।

पिछले सौ वर्षों में दुनिया भर में पानी की निकासी लगातार बढ़ी है, खासकर खेती के लिए। अगर नीतियों में बदलाव न किया गया, तो भविष्य में भी यह मांग बढ़ती रह सकती है।

क्या पानी की समस्या अपने-आप हल हो जाएगी?

इस शोध का यह मतलब नहीं है कि पानी की कमी की समस्या खत्म हो जाएगी। जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश और सूखे की समस्या बनी रहेगी। कई जगहों पर पानी की उपलब्धता पहले ही कम हो रही है।

हालांकि यह अध्ययन नीति-निर्माताओं और योजनाकारों के लिए एक नया नजरिया देता है। अगर भविष्य में पानी की मांग पहले के अनुमान से कम हो सकती है, तो बड़े जल प्रोजेक्ट्स की योजना बनाते समय इसे ध्यान में रखा जा सकता है। इससे अनावश्यक खर्च से बचा जा सकता है और सही जगहों पर निवेश किया जा सकता है।

बढ़ती उम्र सिर्फ सामाजिक या आर्थिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह पानी जैसे महत्वपूर्ण संसाधन की मांग को भी प्रभावित करती है। दुनिया के कुछ हिस्सों में यह बदलाव पानी पर दबाव को थोड़ा कम कर सकता है, लेकिन हर जगह ऐसा नहीं होगा।

इसलिए जरूरी है कि हम पानी की योजना बनाते समय केवल जनसंख्या और जलवायु पर ही नहीं, बल्कि जनसंख्या की उम्र संरचना पर भी ध्यान दें। भविष्य में, जब हर बूंद की कीमत और बढ़ जाएगी, तब यह समझ और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी।