नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने देशभर में जल स्रोतों पर बढ़ते दबाव और पर्यावरणीय क्षरण को लेकर दो अहम मामलों में सख्त रुख अपनाया है।
एक ओर लखनऊ में ओमैक्स सिटी टाउनशिप के भीतर कथित रूप से कब्जा किए गए पांच तालाबों को 10 दिनों के भीतर नगर निगम को लौटाने का आदेश दिया गया है, वहीं दूसरी ओर मेघालय में वाह ल्वू और उमियाम नदी को मिट्टी कटाव और गाद जमाव से बचाने के लिए हरित ढलान स्थिरीकरण उपाय अपनाने पर जोर दिया गया है।
लखनऊ मामले में एनजीटी ने स्पष्ट किया कि तालाबों की सफाई, बहाली और पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए, ताकि वे फिर से भूजल रिचार्ज और बाढ़ नियंत्रण में अपनी भूमिका निभा सकें।
दूसरी तरफ, मेघालय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर ट्रिब्यूनल ने ढलानों पर गहरी जड़ों वाले स्थानीय पौधों और घास लगाने की आवश्यकता रेखांकित की, जिससे भविष्य में कटाव और नदी प्रदूषण को रोका जा सके।
इन दोनों मामलों से साफ है कि एनजीटी अब केवल प्रदूषण रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि जलाशयों और नदियों की पारिस्थितिकी को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए जवाबदेही तय कर रहा है।
लखनऊ में तालाबों पर कब्जे को लेकर बड़ी कार्रवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 26 मई 2026 को लखनऊ नगर निगम को ओमैक्स सिटी प्रोजेक्ट के भीतर मौजूद पांच तालाबों को अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया है। एनजीटी ने डेवलपर्स को आदेश दिया है कि वे 10 दिनों के भीतर इन तालाबों को नगर निगम को सौंपें और इस संबंध में कार्रवाई रिपोर्ट भी दाखिल करें।
साथ ही, लखनऊ नगर निगम को निर्देश दिए गए हैं कि कब्जा मिलने के बाद तालाबों की सफाई, बहाली और नियमित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए। यह काम सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी द्वारा जलाशयों के संरक्षण को लेकर जारी दिशा-निर्देशों के तहत किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि तालाबों के पानी की समय-समय पर जांच कराई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पानी की गुणवत्ता केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) द्वारा तय मानकों और दिनशानिर्देशों के अनुरूप है।
क्या है पूरा मामला
मामला लखनऊ के औरंगाबाद खालसा और रमणिया एस्टेट नाम के गांवों की जमीन पर विकसित ‘ओमैक्स सिटी’ टाउनशिप से जुड़ा है। आरोप है कि ओमैक्स लिमिटेड ने यहां मौजूद पांच तालाबों पर अतिक्रमण कर एक रेजिडेंशियल टाउनशिप बनाने के लिए उन्हें प्लॉट, पार्क और सड़कों में बदल दिया है।
इससे पहले 19 फरवरी 2025 को हुई सुनवाई में अदालत को बताया गया था कि ‘ओमैक्स सिटी’ दो अलग-अलग परियोजनाओं का हिस्सा है। इनमें से एक परियोजना ओमैक्स लिमिटेड द्वारा लगभग 41.2 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित की गई है, जबकि दूसरी परियोजना रमणिया एस्टेट डेवलपर्स द्वारा करीब 19.2 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित की गई है।
खसरा नंबर 1211, 1250, 1251 और 1681 वाले तालाब ओमैक्स लिमिटेड की परियोजना क्षेत्र में आते हैं, जबकि खसरा संख्या 1653 का तालाब रमणिया एस्टेट डेवलपर्स के हिस्से में स्थित है।
26 मई 2026 की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि अब तक तालाब लखनऊ नगर निगम को नहीं सौंपे गए हैं। हालांकि, ओमैक्स लिमिटेड और रमणिया एस्टेट डेवलपर्स की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि वे तालाबों का कब्जा नगर निगम को सौंपने के लिए तैयार हैं।
एनजीटी का यह आदेश शहरों में तेजी से खत्म हो रहे जलाशयों और उन पर बढ़ते अतिक्रमण के खिलाफ एक अहम संदेश माना जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक तालाब केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि भूजल रिचार्ज, बाढ़ नियंत्रण और स्थानीय पारिस्थितिकी को बचाने के लिए बेहद जरूरी हैं।
मेघालय: वाह ल्वू को बचाने के लिए ‘ग्रीन शील्ड’ जरूरी: मेघालय प्रदूषण बोर्ड
उमियाम और वाह ल्वू नदी को मिट्टी के कटाव और गाद जमाव से बचाने के मामले में मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमएसपीसीबी) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को अपनी ताजा रिपोर्ट सौंप दी है। बोर्ड ने 25 मई 2026 को सौंपी अपनी इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि वाह ल्वू धारा को इन खतरों से बचाने के लिए ढलान को स्थिर करना बेहद जरूरी है। इसके लिए ढलानों पर पौधे लगाने की जरूरत है।
गौरतलब है कि यह मामला 26 मई 2024 को शिलांग टाइम्स में प्रकाशित खबर 'सॉइल डंपिंग: उमियाम रिवर क्राइज फॉर हेल्प' से जुड़ा है। इस पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 30 जनवरी और 24 अप्रैल 2026 को आदेश जारी किए थे, जिनके पालन में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यह रिपोर्ट दाखिल की है।
इस मामले में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 7 मई 2026 को पूर्वी खासी हिल्स जिले में वाह ल्वू नदी के पास स्थित ओरिएंटल स्टार लग्जरी रिजॉर्ट साइट का निरीक्षण किया। जांच के दौरान बोर्ड ने पाया कि दोनों रिटेनिंग वॉल कंक्रीट और पत्थर से बनाई गई हैं। निर्माण की तकनीक ढलान को स्थिर रखने और मिट्टी कटाव रोकने के लिहाज से पर्याप्त दिखाई दी।
निरीक्षण में यह भी पाया गया कि वाह ल्वू नदी के किनारे कहीं भी ताजा मिट्टी या बोल्डर डंपिंग नहीं हुई है। नदी के निचले हिस्से का पानी भी मिट्टी और पत्थरों से साफ मिला।
हालांकि, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने रिटेनिंग वॉल के ऊपर और आसपास कुछ खुली और बिना ढकी असुरक्षित ढलानों को देखा, जो भारी बारिश या अन्य प्राकृतिक घटनाओं के दौरान मिट्टी कटाव की चपेट में आ सकती हैं। इसी को देखते हुए, लंबे समय तक पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने और ढलानों को और मजबूत बनाने के लिए बोर्ड ने पौधारोपण आधारित ढलान स्थिरीकरण उपाय अपनाने की सिफारिश की है।
इसके तहत गहरी जड़ों वाले स्थानीय पौधे और घास लगाने की बात कही गई है, ताकि मिट्टी लंबे समय तक स्थिर रहे और कटाव रोका जा सके।