केवल 13 प्रतिशत से कम देशों के पास वाश योजनाओं को लागू करने हेतु पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधन हैं
विश्व स्तर पर 2.1 अरब लोग सुरक्षित पेयजल, 3.4 अरब सुरक्षित स्वच्छता और 1.7 अरब बुनियादी स्वच्छता से वंचित हैं
भारत में जल जीवन मिशन से ग्रामीण सुरक्षित पेयजल कवरेज 2015 के 54 प्रतिशत से 2024 में 73 प्रतिशत हुआ
20 देशों के आंकड़ों के अनुसार एसडीजी-6 लक्ष्यों हेतु वाश वित्त और उपलब्ध धन में 46 प्रतिशत का अंतर है
2019 में असुरक्षित पानी और स्वच्छता से जुड़ी बीमारियों के कारण दुनिया में लगभग 14 लाख लोगों की मौत हुई
स्वच्छ पानी, शौचालय और हाथ धोने जैसी बुनियादी सुविधाएं हर व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन के लिए बहुत जरूरी हैं। इन्हें मिलाकर पानी, स्वच्छता और स्वच्छता (वाश) कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने साल 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित पानी और स्वच्छता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा है, जिसे सतत विकास लक्ष्य 6 (एसडीजी-6) कहा जाता है। लेकिन हाल की एक वैश्विक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया इस लक्ष्य से अभी काफी पीछे है और तुरंत कार्रवाई की जरूरत है।
यह जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई स्टेट ऑफ सिस्टम्स फॉर ड्रिंकिंग वाटर, सैनिटेशन एंड हाइजीन 2025 रिपोर्ट में सामने आई है। यह रिपोर्ट 105 देशों और क्षेत्रों के आंकड़ों पर आधारित है, जो दुनिया की लगभग 62 फीसदी आबादी को कवर करती है। रिपोर्ट बताती है कि कई देशों के पास योजनाएं तो हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर लागू करने की क्षमता कमजोर है।
योजनाएं हैं, लेकिन अमल कमजोर है
रिपोर्ट के अनुसार, बहुत से देशों में पानी और स्वच्छता से जुड़ी नीतियां और लक्ष्य पहले से मौजूद हैं, लेकिन उन्हें लागू करने के लिए पर्याप्त पैसा, प्रशिक्षित कर्मचारी और मजबूत संस्थाएं नहीं हैं। कुछ अहम तथ्य इस प्रकार हैं:
केवल 13 फीसदी से भी कम देशों के पास अपनी वाश योजनाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त धन और मानव संसाधन हैं।
64 फीसदी देशों में अलग-अलग सरकारी संस्थाओं की भूमिकाएं आपस में टकराती हैं, जिससे काम में देरी और भ्रम पैदा होता है।
अधिकतर देशों के पास पानी और शौचालय के लक्ष्य तो हैं, लेकिन केवल 49 फीसदी देशों ने हाथ धोने (हैंड हाइजीन) के लिए राष्ट्रीय लक्ष्य तय किए हैं।
आज भी करोड़ों लोग वंचित
हालांकि दुनिया में कुछ प्रगति हुई है, फिर भी जरूरतें बहुत बड़ी हैं। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ के संयुक्त निगरानी कार्यक्रम (जेएमपी) के अनुसार -
2.1 अरब लोग आज भी सुरक्षित पीने के पानी से वंचित हैं
3.4 अरब लोगों के पास सुरक्षित शौचालय की सुविधा नहीं है
1.7 अरब लोग बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं से भी वंचित हैं
इसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
भारत की स्थिति: जल जीवन मिशन की सफलता
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने इस क्षेत्र में खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में काफी अच्छी प्रगति दिखाई है। जल जीवन मिशन (जेजेएम) की शुरुआत साल 2019 में की गई थी, जिसका लक्ष्य हर ग्रामीण घर तक नल से पानी पहुंचाना है। इस मिशन के अच्छे नतीजे सामने आए हैं:
ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित पीने के पानी की पहुंच 2015 में 54 फीसदी थी जो 2024 में बढ़कर 73 फीसदी हो गई।
नवंबर 2025 तक 81 फीसदी ग्रामीण परिवारों (लगभग 15.7 करोड़ घरों) को नल से पानी मिल रहा था।
जल जीवन मिशन की सफलता के पीछे कुछ अहम कारण हैं -
केंद्र और राज्य सरकारों की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति
राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर तालमेल
जेजेएम डैशबोर्ड जैसे पारदर्शी डेटा सिस्टम
पानी की गुणवत्ता के लिए स्पष्ट मानक (आईएस:10500-2012), जिससे प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर सुरक्षित पानी सुनिश्चित किया जाता है
भारत का अनुभव दिखाता है कि अगर संस्थाएं मजबूत हों और निगरानी सही हो, तो बड़े पैमाने पर बदलाव संभव है।
धन, नियम और जलवायु संकट
रिपोर्ट बताती है कि कई देशों में वाश सेवाओं के लिए धन की भारी कमी है। 20 देशों के आंकड़ों के अनुसार, जरूरत और उपलब्ध धन के बीच 46 फीसदी का अंतर है। इसके अलावा, औसतन 39 फीसदी पानी रिसाव या चोरी के कारण बेकार हो जाता है, जिसे नॉन-रेवेन्यू वॉटर कहा जाता है।
नियमों की स्थिति भी कमजोर है -
आधे से भी कम देश पानी की गुणवत्ता पर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करते हैं
केवल लगभग 20 फीसदी देशों में नियमित पानी जांच सही ढंग से होती है
जलवायु परिवर्तन से खतरे और बढ़ गए हैं। हालांकि 80 फीसदी देश अपनी वाश नीतियों में जलवायु संबंधी खतरों को शामिल करते हैं, लेकिन केवल 20 फीसदी देशों के पास जलवायु से सबसे अधिक प्रभावित लोगों के लिए विशेष वित्तीय सहायता है। केवल 42 फीसदी देश इस दिशा में प्रगति की निगरानी करते हैं
स्वास्थ्य पर गंभीर असर
इन कमजोरियों के कारण स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है -
2019 में 14 लाख लोगों की मौत असुरक्षित पानी और स्वच्छता की कमी से जुड़ी बीमारियों से हुई
2024 में 60 देशों में 5.6 लाख से अधिक हैजा (कोलरा) के मामले, लगभग 6,000 मौतें दर्ज की गई
एसडीजी 6 को हासिल करने के लिए सिर्फ नई पाइपलाइन या शौचालय बनाना काफी नहीं है। जरूरत है मजबूत वाश प्रणाली की, जिसमें बेहतर योजना, पर्याप्त धन, स्पष्ट नियम, प्रशिक्षित कर्मचारी, भरोसेमंद आंकड़े और जलवायु के अनुसार तैयार सेवाएं शामिल हों।
2030 में अब पांच साल से भी कम समय बचा है। अगर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो करोड़ों लोग सुरक्षित पानी और स्वच्छता से वंचित रहेंगे। भारत का अनुभव दिखाता है कि सही दिशा में काम किया जाए, तो बदलाव संभव है।