वैज्ञानिकों ने पाया कि सूर्य से निकलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन हमेशा समान रूप से नहीं फैलते, बल्कि उनका आकार असममित होता है। प्रतीकात्मक छवि, साभार: आईस्टॉक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

सूरज के तूफान का बदला मिजाज, आदित्य-एल1 ने खोला बड़ा राज

अब तक गुब्बारे की तरह फैलता दिखता था सौर तूफान, नई खोज ने बताया कि इसकी चाल और आकार एक जैसे नहीं होते

Dayanidhi

  • भारत के आदित्य-एल1 ने सौर तूफानों के फैलने की प्रक्रिया को समझने में वैज्ञानिकों को नई और महत्वपूर्ण जानकारी दी है।

  • वैज्ञानिकों ने पाया कि सूर्य से निकलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन हमेशा समान रूप से नहीं फैलते, बल्कि उनका आकार असममित होता है।

  • इस खोज में आदित्य-एल1 के वीईएलसी उपकरण और नासा के सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।

  • वैज्ञानिकों ने 5 अगस्त 2024 को निकले सौर तूफान का अध्ययन कर उसकी तीन आयामी संरचना और गति का पता लगाया।

  • यह खोज भविष्य में सौर तूफानों का बेहतर पूर्वानुमान लगाने और उपग्रहों, संचार नेटवर्क तथा बिजली व्यवस्था की सुरक्षा में मददगार होगी।

सूरज सिर्फ रोशनी और गर्मी का स्रोत नहीं है। उसके भीतर समय-समय पर उठने वाले तूफान धरती के लिए भी मुसीबत बन सकते हैं। इन तूफानों में सबसे खतरनाक हैं कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई), यानी सूर्य से अंतरिक्ष में निकलने वाले गर्म प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के विशाल बादल। ये जब धरती की ओर बढ़ते हैं तो हमारे उपग्रहों, संचार नेटवर्क और बिजली व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। अब भारत के पहले अंतरिक्ष आधारित सौर वेधशाला आदित्य-एल1 ने इन सौर तूफानों को समझने में एक नई खिड़की खोल दी है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने पाया है कि सौर तूफान हमेशा किसी गोल गुब्बारे की तरह चारों दिशाओं में एक समान नहीं फैलते। उनका फैलाव असमान हो सकता है और वे टेढ़ा-मेढ़ा, असममित आकार भी ले सकते हैं। यह खोज इसलिए अहम है क्योंकि तूफान का आकार और फैलने का तरीका उसकी गति और धरती तक पहुंचने के असर को बदल सकता है।

सूर्य के तूफान की नई तस्वीर

सितंबर 2023 में लॉन्च हुआ आदित्य-एल1 अब सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित लैग्रेंज बिंदु एल1 पर काम कर रहा है। यहां से उसे सूर्य पर लगातार नजर रखने का मौका मिलता है। इसके सात वैज्ञानिक उपकरणों में सबसे प्रमुख है विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (वीईएलसी)। इसे सूर्य के बाहरी वातावरण यानी कोरोना का अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया है।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के वैज्ञानिकों ने वीईएलसी से मिले आंकड़ों को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी (एसडीओ) उपग्रह के आंकड़ों के साथ मिलाया। इसके बाद तीन आयामी मॉडलिंग की मदद से वैज्ञानिकों ने एक सौर तूफान के फैलाव और उसकी गति की तस्वीर तैयार की।

यह अध्ययन 5 अगस्त 2024 को सूर्य से निकले एक सीएमई पर आधारित था। यह तूफान सूर्य के पश्चिमी किनारे के पास मौजूद एक सक्रिय क्षेत्र से निकला था। इसके अध्ययन में वीईएलसी ने ऐसी जानकारी दी, जो केवल सामान्य तस्वीरों से मिलना मुश्किल था।

रंग की रोशनी में छिपा था तूफान का राज

वीईएलसी की खासियत यह है कि यह सूर्य के कोरोना से निकलने वाली 530.3 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य की हरी रोशनी का अध्ययन करता है। यह रोशनी अत्यधिक गर्म और आयनित लोहे के परमाणुओं से निकलती है। यहां प्लाज्मा का तापमान करीब 18 लाख केल्विन होता है।

इस रोशनी की तरंगदैर्ध्य में होने वाले बदलाव को डॉप्लर शिफ्ट कहते हैं। इससे पता चलता है कि प्लाज्मा हमारी ओर आ रहा है या हमसे दूर जा रहा है। आसान भाषा में कहें तो वीईएलसी वैज्ञानिकों को सिर्फ यह नहीं बताता कि सौर तूफान कहां है, बल्कि यह भी बताता है कि उसका पदार्थ किस दिशा में और कितनी गति से बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों को इस अध्ययन में नीले और लाल रंग की ओर खिसकी हुई रोशनी के संकेत मिले। ये संकेत प्लाज्मा की अलग-अलग दिशाओं में हो रही गति को दिखाते थे।

जब मॉडल ने खोली असली तस्वीर

टीटीए के वैज्ञानिकों ने इन संकेतों को समझने के लिए सीएमई का तीन आयामी ज्यामितीय और गतिशील मॉडल तैयार किया। उन्होंने जांचा कि तूफान की दिशा और उसके फैलने के तरीके में बदलाव से वीईएलसी में दिख रहे संकेत कैसे बन सकते हैं।

नतीजा चौंकाने वाला था। समान रूप से फैलने वाले सीएमई का मॉडल वास्तविक आंकड़ों से मेल नहीं खा रहा था। इसके बजाय, झुकी हुई धुरी और एक ओर अधिक फैलाव वाले मॉडल ने वैज्ञानिकों के सामने आई तस्वीर को बेहतर ढंग से समझाया। यानी सौर तूफान का फैलाव हर दिशा में बराबर नहीं था। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स' में प्रकाशित किया गया है।

उपग्रहों की सुरक्षा के लिए बड़ी उम्मीद

इस खोज का महत्व केवल सूर्य को बेहतर समझने तक सीमित नहीं है। जब कोई सीएमई धरती की ओर आता है तो उसकी गति, दिशा और चुंबकीय गुण अंतरिक्ष मौसम को प्रभावित करते हैं। इससे संचार उपग्रहों, जीपीएस सेवाओं, अंतरिक्ष यात्रियों और बिजली के बड़े नेटवर्क पर असर पड़ सकता है।

यदि वैज्ञानिक पहले ही यह समझ सकें कि कोई सौर तूफान किस दिशा में और किस तरह फैल रहा है, तो उसके धरती तक पहुंचने और संभावित प्रभावों का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।

अब वैज्ञानिक इस तकनीक को दूसरे सौर तूफानों पर भी आजमाने की तैयारी में हैं। खास बात यह है कि इसके जरिए केवल अलग-अलग अंतरिक्ष दूरबीनों से मिलने वाली तस्वीरों पर निर्भर हुए बिना भी सीएमई की गति और आकार को समझने में मदद मिल सकती है।

आदित्य-एल1 की यह उपलब्धि साफ संकेत देती है कि अंतरिक्ष में भारत की नजर अब केवल सूर्य को देखने तक सीमित नहीं है। वह सूर्य के मिजाज को पढ़ने और धरती को उसके तूफानों से बचाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।