पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है उद्योगों से निकलने वाला दूषित जल; प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट  
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

औद्योगिक कचरे से साफ होगा जहरीला पानी, एनआईटी राउरकेला के वैज्ञानिकों ने खोजी अनोखी तकनीक

भारतीय वैज्ञानिकों की नई तकनीक न केवल जहरीले अपशिष्ट जल को साफ करेगी, बल्कि औद्योगिक कचरे को उपयोगी संसाधन में भी बदलेगी।

Lalit Maurya

  • एक उद्योग का कचरा अब दूसरे उद्योग के प्रदूषण का इलाज बनेगा। एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने थर्मल पावर प्लांट की फ्लाई ऐश, स्टील उद्योग के ब्लास्ट फर्नेस स्लैग और काओलिन मिट्टी से एक विशेष सिरेमिक एब्जॉर्बेंट विकसित किया है, जो औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद जहरीली रासायनिक डाई ‘मेथिलीन ब्लू’ को 95 फीसदी तक हटाने में सक्षम है।

  • इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक ही समय में दो बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटती है—एक ओर यह प्रदूषित जल को साफ करती है, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदल देती है।

  • पारंपरिक जल शोधन प्रणालियों की तुलना में यह तकनीक कहीं अधिक सस्ती, ऊर्जा-दक्ष और पर्यावरण अनुकूल है।

  • बिना उच्च तापमान पर हीट-ट्रीटमेंट के तैयार होने वाला यह एब्जॉर्बेंट महज 25 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की लागत में वेस्टवाटर को प्रभावी रूप से साफ कर सकता है।

  • शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में इसी तकनीक का उपयोग भारी धातुओं और अन्य खतरनाक रसायनों को हटाने के लिए भी किया जा सकेगा।

  • यह नवाचार न केवल स्वच्छ जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह भी साबित करता है कि विज्ञान की मदद से कचरे को संसाधन में बदलकर सतत विकास की राह को मजबूत किया जा सकता है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने औद्योगिक कचरे का इस्तेमाल कर प्रदूषित पानी को साफ करने की एक बेहद अनोखी और किफायती तकनीक विकसित की है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) राउरकेला के सिरेमिक इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा विशेष 'सिरेमिक एब्जॉर्बेंट' (सोखने वाला पदार्थ) तैयार किया है, जो कारखानों से निकलने वाले पानी में मौजूद घातक 'मेथिलीन ब्लू' जैसी रासायनिक डाई को 95 फीसदी से अधिक तक साफ करने में सक्षम है।

इस स्टडी को एनआईटी राउरकेला के सिरेमिक इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर सुनीपा भट्टाचार्य और उनके रिसर्च स्कॉलर्स-सुशांत महापात्रा व सौरव रंजन सत्पथी द्वारा किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'केमिस्ट्री सिलेक्ट' में प्रकाशित हुए हैं।

आमतौर पर कपड़ा (टेक्सटाइल), रंगाई और छपाई जैसे उद्योगों से भारी मात्रा में रंगीन रासायनिक कचरा निकलता है, जो नदियों, झीलों और भूजल को दूषित कर जलीय जीवों और इंसानी सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। इस दूषित पानी को साफ करने के मौजूदा पारंपरिक तरीके न सिर्फ अत्यधिक महंगे हैं, बल्कि उनमें भारी मात्रा में बिजली की खपत होती है और वे खुद भी एक नया कचरा पैदा करते हैं।

एक तीर से दो निशाने: उद्योगों के कचरे से ही थमेगा प्रदूषण

इन्हीं समस्याओं से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख (फ्लाई ऐश), स्टील प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस से निकलने वाले कचरे ग्राउंड ग्रैन्युलेटेड ब्लास्ट-फर्नेस स्लैग (जीजीबीएस) और प्राकृतिक सफेद मिट्टी (काओलिन क्ले) को मिलाकर एक वॉटर-बेस्ड सिरेमिक एब्जॉर्बेंट तैयार किया है।

यह तकनीक दोहरे मोर्चे पर काम करती है, एक तरफ यह पानी से घातक रसायनों को सोखती है, तो दूसरी तरफ बिजली और स्टील उद्योगों के सामने खड़े लाखों टन ठोस कचरे के निपटारे की समस्या का भी स्थाई समाधान देती है।

बता दें कि इन दोनों अपशिष्ट पदार्थों के निपटान की समस्या लंबे समय से पर्यावरण के लिए चिंता का विषय रही है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इन्हीं बेकार समझे जाने वाले पदार्थों को उपयोगी संसाधन में बदल दिया है।

पर्यावरण और जेब दोनों के अनुकूल है यह खोज

इस सिरेमिक एब्जॉर्बेंट को विशेष रूप से मेथिलीन ब्लू नामक रंग को हटाने के लिए तैयार किया गया है, जो उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल में व्यापक रूप से पाया जाता है। प्रयोगशाला परीक्षणों में यह एब्जॉर्बेंट 95 प्रतिशत से अधिक मेथिलीन ब्लू को हटाने में सफल रहा है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी निर्माण प्रक्रिया और कम लागत है।

अध्ययन का नेतृत्व कर रहीं डॉक्टर सुनीपा भट्टाचार्य ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया, "आमतौर पर जियोपॉलिमर आधारित एब्जॉर्बेंट बनाने के लिए मिट्टी को बहुत उच्च तापमान पर गर्म करना पड़ता है, जो काफी खर्चीला और ऊर्जा सोखने वाला काम है।“

“लेकिन उनकी टीम ने बिना किसी हीट-ट्रीटमेंट के सीधे 'कच्ची काओलिन मिट्टी' का उपयोग किया है, जिससे इस प्रक्रिया में ऊर्जा की भारी बचत होती है और यह पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल बन जाती है।“

लागत के मामले में भी यह तकनीक बेहद क्रांतिकारी है। जहां पारंपरिक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने और चलाने में लाखों का खर्च आता है, वहीं इस सिरेमिक एब्जॉर्बेंट को तैयार करने की लागत मात्र 25 से 50 रुपए प्रति किलोग्राम (लगभग) आती है। इतने कम खर्च में फैक्ट्रियों के पानी से 95 फीसदी से अधिक डाई को अलग करना उद्योगों के लिए व्यावसायिक रूप से बेहद फायदेमंद सौदा है।

वैज्ञानिकों की यह खोज संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास के लक्ष्यों, विशेष रूप से 'एसडीजी 6' (स्वच्छ जल और स्वच्छता) और 'एसडीजी 12' (जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग और उत्पादन) के मापदंडों के भी अनुरूप है।

भविष्य की राह

अपनी इस सफलता से उत्साहित शोधकर्ताओं की टीम अब अगले चरण में इस अपशिष्ट पदार्थों से अलग-अलग आकारों के छिद्रदार एब्जॉर्बेंट बनाने की योजना पर काम कर रही है, ताकि पानी में घुले अन्य खतरनाक केमिकल और भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) को भी साफ किया जा सके।

ऐसे में यह तकनीक न केवल उद्योगों को कम लागत में अपशिष्ट जल के उपचार का प्रभावी विकल्प प्रदान कर सकती है, बल्कि नदियों, झीलों और अन्य जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

यह अध्ययन इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि यदि विज्ञान और नवाचार को सही दिशा मिले, तो एक उद्योग का कचरा दूसरे उद्योग की पर्यावरणीय समस्या का समाधान बन सकता है। इससे न केवल प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि बेकार समझे जाने वाले संसाधनों को नई उपयोगिता देकर सतत विकास की राह भी मजबूत होगी।