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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

पीएम2.5 की मार से कमजोर हो रहे पौधे, घट रही कार्बन सोखने की क्षमता: स्टडी

रिसर्च से पता चला है कि अदृश्य प्रदूषण धरती के हरे-भरे फेफड़ों को कमजोर कर रहा है, जिससे पौधों की कार्बन सोखने और पानी का कुशलता से इस्तेमाल करने की कुदरती क्षमता घट सकती है।

Lalit Maurya

  • हवा में घुला पीएम2.5 प्रदूषण अब केवल इंसानों के फेफड़ों और दिल के लिए खतरा नहीं, बल्कि धरती की प्राकृतिक जलवायु सुरक्षा व्यवस्था को भी कमजोर कर रहा है।

  • एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि ये महीन कण पौधों की कार्बन डाइऑक्साइड सोखने और पानी का कुशलता से उपयोग करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

  • इसका सबसे बड़ा असर प्रकाश संश्लेषण पर पड़ता है, जिससे पौधों की कार्बन हासिल करने की ताकत कमजोर होती है। यानी प्रदूषण धरती की हरियाली को उसी काम से रोक रहा है, जिसके जरिए वह हवा को संतुलित रखने और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में हमारी मदद करती है।

  • अध्ययन ने यह भी चेताया है कि कई मौजूदा जलवायु मॉडल इस खतरे को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे हैं, क्योंकि उनमें एयरोसोल और बारीक प्रदूषण कणों के प्रभाव को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है।

  • ऐसे में पीएम2.5 पर नियंत्रण केवल बेहतर स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि जंगलों और पौधों की कार्बन सोखने की प्राकृतिक क्षमता बचाने के लिए भी जरूरी है। साफ हवा अब सिर्फ स्वस्थ सांसों की नहीं, बल्कि धरती की हरियाली और सुरक्षित भविष्य की भी बुनियादी जरूरत है।

हवा में घुले प्रदूषण के महीन कण केवल इंसानों के फेफड़ों और दिल के लिए ही खतरा नहीं, बल्कि यह धरती के हरे-भरे फेफड़ों को भी कमजोर कर रहे हैं।

इस बारे में किए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चेताया है कि हवा में मौजूद पीएम2.5 पौधों की पानी का कुशलता से उपयोग करने और वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की कुदरती क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। इसका मतलब है कि जिन पेड़-पौधों पर हम जलवायु संकट से लड़ने के लिए भरोसा करते हैं, प्रदूषण कार्बन सोखने की उसी प्राकृतिक ताकत को कमजोर कर रहा है।

हांगकांग विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज, यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो और पेकिंग यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं ने दुनिया भर से जुटाए गए पेड़ों के छल्लों, वायुमंडलीय कार्बन प्रवाह और उपग्रह से प्राप्त वनस्पति संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया है।

अध्ययन में पुष्टि हुई है कि पीएम2.5 पौधों के पानी उपयोग करने की दक्षता (यानी वाटर यूज एफिशिएंसी) को कमजोर करता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड और बदलती जलवायु के कारण पौधों के पानी उपयोग करने की दक्षता में सुधार देखा गया था। लेकिन चिंता की बात है कि पीएम2.5 इस सुधार की रफ्तार को कम कर रहा है। यानी बढ़ता प्रदूषण पौधों को उस लाभ से भी वंचित कर रहा है, जो उन्हें बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड के कारण मिल सकता था।

प्रकाश संश्लेषण में बाधा बन रहा अदृश्य जहर

प्रोफेसर युयू झोउ के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन से पता चला है कि पीएम2.5 का सबसे बड़ा असर पौधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया पर पड़ता है। यह प्रदूषण पौधों तक पहुंचने वाले प्रकाश को कम करता है और उनकी कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बन में बदलने की क्षमता को कमजोर करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि पौधों की पानी के इस्तेमाल की दक्षता में कमी का मुख्य कारण ज्यादा पानी खोना नहीं, बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की उनकी क्षमता का कमजोर होना है।

यानी प्रदूषण पौधों की उस अहम क्षमता को कमजोर कर रहा है, जिसके जरिए वे कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर हवा को संतुलित रखते हैं और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करते हैं।

जलवायु मॉडलों की बड़ी चूक, नजरअंदाज हो रहा प्रदूषण का असर

अध्ययन ने मौजूदा पारिस्थितिकी और जलवायु मॉडलों की एक बड़ी कमी को भी उजागर किया है। कई मॉडल वायुमंडल में मौजूद एयरोसोल और बारीक प्रदूषण कणों के प्रभाव को शामिल नहीं करते। इसी वजह से वे पीएम2.5 और पौधों की जल-उपयोग दक्षता के बीच के वास्तविक संबंध को सही ढंग से नहीं समझा पा रहे हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य के अर्थ  सिस्टम मॉडलों में एयरोसोल की संरचना, आकार और पौधों व जमीन पर उनके जमाव जैसे कारकों को शामिल करना जरूरी है। ऐसा नहीं किया गया तो जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियां अधूरी या गलत साबित हो सकती हैं।

साफ हवा अब सिर्फ सांसों नहीं, धरती के भविष्य की जरूरत

यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि पीएम2.5 उत्सर्जन में कमी केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि जलवायु कार्रवाई की भी बड़ी जरूरत है। प्रदूषण कम होगा तो पौधे बेहतर ढंग से कार्बन सोख सकेंगे, पानी का अधिक कुशलता से उपयोग कर सकेंगे और बदलती जलवायु के सामने ज्यादा मजबूती से टिक पाएंगे।

ऐसे समय में, जब दुनिया जंगलों और हरित क्षेत्रों से कार्बन उत्सर्जन का बोझ कम करने की उम्मीद कर रही है, हवा में फैला यह अदृश्य जहर धरती की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर सकता है। इसलिए साफ हवा अब केवल सांस लेने की जरूरत नहीं, बल्कि धरती की हरियाली और भविष्य को बचाने की शर्त भी बनती जा रही है।