भारतीय वैज्ञानिकों ने सुरक्षित पेयजल की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए ऐसा स्मार्ट और पोर्टेबल 'ई-आई' डिवाइस विकसित किया है, जो महज करीब दो रुपये प्रति जांच की लागत में पानी में मौजूद आर्सेनिक, सीसा, क्रोमियम, फ्लोराइड, आयरन और ई. कोलाई जैसे खतरनाक प्रदूषकों की मौके पर ही सटीक पहचान कर सकता है।
आईआईटी गुवाहाटी के नेतृत्व में विकसित यह स्वदेशी तकनीक प्रयोगशाला पर निर्भरता कम करते हुए जल स्रोत पर ही कुछ ही मिनटों में जांच संभव बनाती है।
लगभग 3,500 रुपये लागत वाला यह उपकरण अब तक 2,700 से अधिक नमूनों की सफल जांच कर चुका है और इसकी सटीकता मानक प्रयोगशाला उपकरणों के बराबर पाई गई है।
विशेष बात यह है कि यह तकनीक केवल पानी ही नहीं, बल्कि मिट्टी, दूध, खाद्य पदार्थों, सब्जियों और पर्यावरणीय नमूनों की जांच में भी उपयोगी है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह डिवाइस जल जीवन मिशन, औद्योगिक प्रदूषण निगरानी और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कम लागत, तेज जांच और आसान उपयोग की वजह से यह तकनीक दूर-दराज के इलाकों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने की दिशा में गेमचेंजर साबित हो सकती है।
साफ दिखने वाला पानी हमेशा सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं। कई बार पानी में आर्सेनिक, सीसा (लेड), क्रोमियम जैसे भारी धातुएं और ई कोलाई जैसे बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकते हैं।
ऐसी अदृश्य चुनौती से निपटने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने 'ई-आई' नामक एक पोर्टेबल स्मार्ट डिवाइस तैयार किया है, जो कुछ ही समय में पानी और अन्य जैविक नमूनों में मौजूद जहरीले तत्वों की सटीक पहचान कर सकता है।
एक इलेक्ट्रॉनिक आंख की तरह काम करते हुए यह छोटा पोर्टेबल डिवाइस पानी के स्रोत पर खड़े होकर ही तुरंत बता देगा कि पानी पीने लायक है या नहीं। ऐसे में यह स्वदेशी तकनीक केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन के उद्देश्य, हर घर तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
कैसे काम करता है 'ई-आई' डिवाइस?
आईआईटी, गुवाहाटी द्वारा साझा जानकारी के मुताबिक यह डिवाइस एक विशेष रासायनिक अभिक्रिया के जरिए नमूने में मौजूद प्रदूषकों की पहचान करता है। जहरीले तत्वों की मात्रा के अनुसार रंग की तीव्रता बदलती है।
इसके बाद ऑप्टिकल सेंसर और डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स की मदद से इन रंगों का विश्लेषण कर प्रदूषकों की मात्रा को डिजिटल रूप में सामने आ जाती है। इसके बाद जांच के आंकड़े वायरलेस माध्यम से सीधे वाटर ट्रीटमेंट केंद्रों तक भी भेजे जा सकते हैं।
लैब नहीं, सीधे मौके पर होगी जांच
गौरतलब है कि पारंपरिक प्रयोगशालाओं में पानी की जांच महंगे उपकरणों पर निर्भर करती है, जिसमें समय भी अधिक लगता है। इसके विपरीत, 'ई-आई' को सीधे जल स्रोत पर ले जाकर पानी की गुणवत्ता की जांच की जा सकती है।
प्रयोगशाला परीक्षणों में इसके नतीजे यूवी-विजिबल स्पेक्ट्रोफोटोमीटर और एटॉमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोफोटोमीटर (एएएस) जैसे मानक उपकरणों के बराबर ही सटीक पाए गए हैं।
किन-किन खतरनाक तत्वों की हो सकती है पहचान?
आईआईटी गुवाहाटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर तपस के मंडल के मुताबिक, यह डिवाइस बीयर-लैम्बर्ट सिद्धांत पर आधारित है और ऑप्टिकल सेंसिंग को डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ जोड़कर प्रदूषकों की सटीक मात्रात्मक पहचान करता है।
उनके मुताबिक यह डिवाइस अब तक आर्सेनिक, सीसा, आयरन, क्रोमियम, फ्लोराइड तथा ई कोलाई बैक्टीरिया की सफलतापूर्वक पहचान कर चुका है।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह उपकरण केवल पानी तक सीमित नहीं है। इससे पर्यावरणीय नमूने, जैविक नमूने, सब्जियां, खाद्य पदार्थ, चाय और हर्बल उत्पाद, मिट्टी तथा दूध में भी जहरीले तत्वों की जांच की जा सकती है।
शोधकर्ताओं ने अब तक 2,700 से अधिक नमूनों की सफल जांच कर इसकी सटीकता साबित की है।
3,500 की मशीन, महज दो रुपए में होगी जांच
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत है। ई-आई डिवाइस को करीब 3,500 रुपये में तैयार किया गया है, जबकि एक नमूने की जांच की लागत केवल करीब दो रुपये आती है। वैज्ञानिकों के अनुसार बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने के बाद इसकी कीमत और कम होने की उम्मीद है।
इस बारे में किए अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित आईईईई सेंसर्स जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर तपस के मंडल और प्रोफेसर हर्षल बी नेमाडे के साथ शोधार्थी श्रीकांत कश्यप, स्मृति सचान और नेहा माझी शामिल हैं।
इसके अलावा, कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी, भुवनेश्वर की मैत्रेयी भुइयां तथा रामकृष्ण मिशन रेजिडेंशियल कॉलेज, कोलकाता के हुमायूं कबीर ने भी इस शोध में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
सरकार, उद्योग और किसान सभी के लिए उपयोगी
अध्ययन से जुड़े प्रोफेसर हर्षल बी नेमाडे के अनुसार, यह तकनीक जल शक्ति मंत्रालय से जुड़ी एजेंसियों, खाद्य एवं हर्बल उत्पाद उद्योगों और औद्योगिक इकाइयों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती है। इससे उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी में मौजूद भारी धातुओं, बैक्टीरिया और दुर्गंध पैदा करने वाले रसायनों की भी निगरानी की जा सकेगी।
इस तकनीक के व्यावसायीकरण के लिए शोधकर्ताओं ने 'एनविओनिक्स लैब्स प्राइवेट लिमिटेड' नामक स्टार्टअप भी शुरू किया है। शोधकर्ता अब इस डिवाइस में सौर ऊर्जा और क्लाउड कनेक्टिविटी जोड़ने पर काम कर रहे हैं, ताकि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी रियल टाइम में निगरानी और डेटा प्रबंधन संभव हो सके।
गौरतलब है कि भारत के अनेक इलाकों में आज भी लोग ऐसे पानी पर निर्भर हैं, जिसमें हानिकारक धातुएं और बैक्टीरिया मौजूद हो सकते हैं। ऐसे में कम लागत, तेज, पोर्टेबल और सटीक जांच प्रणाली लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती है।
सच कहें यह नई खोज केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी तकनीक के क्षेत्र में भारत की बढ़ती क्षमता का भी एक मजबूत उदाहरण है।