प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

भारत-चीन के वैज्ञानिकों को 'जंग' के खिलाफ मिला नया हथियार, सेब के पत्तों से बनाई नैनों तकनीक

स्टडी से पता चला है कि सेब के पत्तों से बने ये कार्बन क्वांटम डॉट्स अम्लीय माहौल में तांबे पर लगने वाले जंग को 94 फीसदी तक रोक देते हैं। वहीं समय के साथ यह सुरक्षा बढ़कर 96.2 फीसदी तक पहुंच जाती है।

Lalit Maurya

  • नागालैंड विश्वविद्यालय और बीजिंग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने सेब के पत्तों से कार्बन क्वांटम डॉट्स विकसित किए हैं, जो धातुओं को जंग से बचाने में सक्षम हैं।

  • यह पर्यावरण-अनुकूल तकनीक धातुओं पर जंग रोकने के लिए एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करती है, जिससे उद्योगों में जहरीले रसायनों की आवश्यकता कम होगी।

  • अध्ययन के मुताबिक, सेब के पत्तों से बने ये सूक्ष्म कण (कार्बन क्वांटम डॉट्स) अम्लीय माहौल में तांबे पर लगने वाले जंग को 94 फीसदी तक रोक देते हैं। इतना ही नहीं समय के साथ यह सुरक्षा बढ़कर 96.2 फीसदी तक पहुंच जाती है।

  • यह अध्ययन सिर्फ उद्योगों के लिए नहीं, बल्कि किसानों के लिए भी नई उम्मीद लेकर आया है। कृषि कचरे से उच्च-मूल्य नैनो सामग्री बनाकर ‘कचरे से कमाई’ का रास्ता खुल सकता है और सर्कुलर इकोनॉमी को बल मिल सकता है।

कृषि कचरे को अक्सर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, लेकिन यही कचरा अब उद्योगों की बड़ी समस्या को हल करने में मददगार होगा। नागालैंड विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, बीजिंग से जुड़े वैज्ञानिकों ने जंग से लड़ने के लिए एक अनोखा, पर्यावरण-अनुकूल समाधान खोज निकाला है।

उन्होंने सेब के फेंके गए पत्तों से ऐसे ‘कार्बन क्वांटम डॉट्स’ विकसित किए हैं, जो धातुओं को लंबे समय तक जंग से सुरक्षित रखने में सक्षम है।

यह खोज धातुओं पर लगने वाली जंग और उसे रोकने में इस्तेमाल होने वाले जहरीले रसायनों की समस्या का एक पर्यावरण-अनुकूल समाधान पेश करती है। यह ऐसी समस्या है जिससे दुनिया भर के उद्योग जूझ रहे हैं।

अध्ययन के मुताबिक, सेब के पत्तों से बने ये सूक्ष्म कण (कार्बन क्वांटम डॉट्स) अम्लीय माहौल में तांबे पर लगने वाले जंग को 94 फीसदी तक रोक देते हैं। इतना ही नहीं समय के साथ यह सुरक्षा बढ़कर 96.2 फीसदी तक पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी ऊंची प्रभावशीलता औद्योगिक उपयोग के लिए बेहद उत्साहजनक है, जहां अक्सर धातुएं कठोर रसायनों के संपर्क में रहती हैं।

यह अध्ययन नागालैंड विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसर अम्ब्रिश सिंह और बीजिंग स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर युजी क्यांग के नेतृत्व में किया गया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल ‘जर्नल ऑफ एलॉयज एंड कंपाउंड्स’ में प्रकाशित हुए हैं।

क्या है इसके पीछे का विज्ञान

बीजिंग विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसर युजी क्यांग के मुताबिक, पर्यावरण अनुकूल तकनीक (हाइड्रोथर्मल प्रोसेस) की मदद से रिसर्च टीम ने सेब के पत्तों को सल्फर और नाइट्रोजन में मिलाकर नैनोस्केल कार्बन पार्टिकल्स तैयार किए हैं। ये एलिमेंट्स कई एक्टिव साइट बनाते हैं जो धातु की सतह से मजबूती से चिपक जाते हैं।

इससे तांबे पर एक मजबूत सुरक्षात्मक परत बनती है, जो जंग फैलाने वाले आयनों को रोक देती है। एडवांस्ड थ्योरेटिकल मॉडलिंग से यह भी पता चला कि खास नाइट्रोजन वाले ग्रुप प्रोटेक्टिव लेयर को मेटल की सतह पर एंकर करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

शोधकर्ताओं को बधाई देते हुए नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जगदीश कुमार पटनायक ने कहा कि, “उन्हें गर्व है कि नागालैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय दल ने सेब के पत्तों से ऐसा पर्यावरण-अनुकूल जंगरोधी पदार्थ तैयार किया है, जो तांबे को 96.2 फीसदी तक सुरक्षा देता है।“

उन्होंने यह भी कहा कि भारत-चीन का यह सहयोग पर्यावरण-संवेदनशील विज्ञान के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो असल समस्याओं का समाधान करता है और जहरीले रसायनों पर निर्भरता कम करता है।

किसानों के लिए खुल सकता है ‘कचरे से कमाई’ का रास्ता

यह अध्ययन सिर्फ उद्योगों के लिए नहीं, बल्कि किसानों के लिए भी नई उम्मीद लेकर आया है। कृषि कचरे से उच्च-मूल्य नैनो सामग्री बनाकर ‘कचरे से कमाई’ का रास्ता खुल सकता है और सर्कुलर इकोनॉमी को बल मिल सकता है।

अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर अम्ब्रिश सिंह ने इसके उपयोगों पर प्रकाश डालते हुए प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "इसके लाभ कई अहम क्षेत्रों में मिल सकते हैं। तेल-गैस, रासायनिक उद्योग, बिजली उत्पादन और जल शोधन जैसे क्षेत्रों में अम्लीय माहौल जंग को तेज करता है। इससे रखरखाव का खर्च बढ़ता है और सुरक्षा का खतरा भी रहता है। वहीं सेब के पत्तों से बने ये जैव-आधारित रक्षक पाइपलाइनों, टैंकों और मशीनों की उम्र बढ़ा सकते हैं और पारंपरिक जहरीले रसायनों से पर्यावरण और स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान को भी कम कर सकते हैं।“

फिलहाल यह काम प्रयोगशाला स्तर पर सफल रहा है। अब वैज्ञानिक इसे बड़े पैमाने पर परखने और औद्योगिक कोटिंग्स में जोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

देखा जाए तो यह खोज न केवल जंग से सुरक्षा का पर्यावरण अनुकूल विकल्प पेश करती है, बल्कि कृषि कचरे को मूल्यवान संसाधन में बदलकर पर्यावरण और उद्योगों दोनों के लिए नई संभावनाओं के द्वार भी खोलती है। उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में यह तकनीक औद्योगिक सुरक्षा, किसानों की आय और सर्कुलर इकोनॉमी में बड़ा बदलाव लाएगी।