प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

दूषित पानी में छिपा यूरेनियम भी होगा अलग, आईआईटी पटना की नई खोज से बढ़ीं उम्मीदें

आईआईटी पटना के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नया पॉलिमर विकसित किया है, जो दूषित पानी और समुद्री जल से भी यूरेनियम को तेजी से अलग कर सकता है।

Lalit Maurya

  • आईआईटी पटना के वैज्ञानिकों ने दूषित और समुद्री जल से यूरेनियम को तेजी से अलग करने के लिए एक नया पॉलिमर पदार्थ विकसित किया है।

  • पानी में यूरेनियम बहुत कम मात्रा में पाया जाता है और अन्य धातुओं के साथ मिश्रित होने के कारण इसे निकालना कठिन होता है।

  • इस पॉलिमर में ‘यूराजोल’ नामक विशेष रासायनिक समूह मौजूद है, जो यूरेनियम के ‘यूरानिल आयन’ को मजबूती से पकड़ता है। प्रयोगों में यह पदार्थ बेहद प्रभावी साबित हुआ—15 मिनट में तीन-चौथाई से अधिक यूरेनियम हट गया और दूषित भूजल व अपशिष्ट जल से 90 फीसदी तक यूरेनियम निकालने में सफलता मिली।

  • समुद्री जल में भी इसने तीन दिनों में 70 फीसदी से अधिक यूरेनियम अलग कर दिया।

पानी में मौजूद यूरेनियम को हटाना वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। यह न केवल दूषित जल स्रोतों की सफाई के लिए जरूरी है, बल्कि परमाणु ऊर्जा के लिहाज से यूरेनियम जैसे कीमती संसाधन की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।

अब भारतीय वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) पटना के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा नया पॉलिमर पदार्थ विकसित किया है, जो दूषित पानी और यहां तक कि समुद्री जल से भी यूरेनियम को तेजी और चुनिंदा तरीके से पकड़ सकता है। दूषित पानी में छिपा यूरेनियम न सिर्फ स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि परमाणु ऊर्जा के लिहाज से एक कीमती संसाधन भी है।

क्यों मुश्किल है यूरेनियम को अलग करना?

प्राकृतिक जल स्रोतों, खासकर समुद्री पानी में यूरेनियम बेहद कम मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा यह कई अन्य धातुओं और आयनों के साथ मिला रहता है, जिससे इसे अलग करना और भी जटिल हो जाता है।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने इस नए पॉलिमर को कई रासायनिक ‘हुक’ के साथ डिजाइन किया है। इनमें ‘यूराजोल’ नाम का एक विशेष समूह शामिल है, जो पानी में मौजूद यूरेनियम के सबसे सामान्य रूप ‘यूरानिल आयन’ को मजबूती से बांध लेता है।

बेहद तेज और प्रभावी परिणाम

वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशाला में किए परीक्षणों में यह पॉलिमर लगभग सामान्य पीएच स्तर पर भी शानदार तरीके से काम करता दिखा और बड़ी मात्रा में यूरेनियम को सोखने में सफल रहा। यह एक घंटे से भी कम समय में अपनी अधिकतम क्षमता तक पहुंच गया।

खास बात यह रही कि 15 मिनट में ही तीन-चौथाई से ज्यादा यूरेनियम हट गया, जो मौजूदा कई तकनीकों की तुलना में काफी तेज है। यह परिणाम सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं। जांच में पॉलिमर दूषित भूजल और अपशिष्ट जल से भी 90 फीसदी से अधिक यूरेनियम निकालने में सक्षम पाया गया।

समुद्री पानी में भी कारगर

शोधकर्ताओं ने इस पदार्थ का परीक्षण समुद्री जल पर भी किया है। बता दें कि समुद्री जल में यूरेनियम की मात्रा बेहद कम होती है और अन्य आयनों की मौजूदगी के कारण इसे निकालना और भी मुश्किल हो जाता है। इसके बावजूद इस पॉलिमर ने तीन दिनों के भीतर यूरेनियम का 70 फीसदी से अधिक हिस्सा अलग कर दिया।

वैज्ञानिकों ने कॉलम प्रयोगों में भी इसे परखा, जो वास्तविक जल उपचार प्रणालियों की तरह काम करते हैं। नतीजों से संकेत मिला कि यह पदार्थ लगातार इस्तेमाल किया जा सकता है।

कंप्यूटर मॉडलिंग से भी यह स्पष्ट हुआ है कि यूरेनियम को मजबूती और चुनिंदा तरीके से पकड़ने में यूराजोल समूह की भूमिका निर्णायक है। सबसे खास बात यह है कि यह पॉलिमर कई बार उपयोग होने के बाद भी अपनी प्रभावशीलता बनाए रखता है। यही गुण इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए बेहद उपयोगी बनाता है।

इस अध्ययन के नतीजे जर्नल ऑफ मैटेरियल्स केमिस्ट्री ए में प्रकाशित हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई तकनीक भविष्य में दूषित जल स्रोतों की सफाई के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण संसाधन की पुनर्प्राप्ति में भी अहम भूमिका निभा सकती है। यह खोज जल शुद्धिकरण और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।