किसानों के लिए कृषि का सबसे कठिन पहलू यह है कि जब तक फसल की पत्तियां मुरझाती हैं या बढ़वार रुकती है, तब तक नुकसान शुरू हो चुका होता है। अब यह स्थिति बदल सकती है।
वैज्ञानिकों ने पौधों के लिए ऐसी अनोखी 'स्मार्ट सेंसर' विकसित किया है, जो फसल की सेहत पर चौबीसों घंटे नजर रखेगा और बीमारी, पानी की कमी, पोषक तत्वों की कमी या लवणता जैसे तनाव के शुरुआती संकेत नुकसान दिखने से पहले ही बता देगा।
टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित ये बेहद हल्के सेंसर पत्तियों और तनों पर लगाए जाते हैं तथा किसी बैटरी के बिना, पौधों से निकलने वाली प्राकृतिक नमी से ही ऊर्जा प्राप्त कर काम करते हैं।
खास बात यह है कि ये पहली बार खेत की नहीं, बल्कि पौधे की अपनी स्थिति को समझने का मौका देंगे। भविष्य में इन्हें वायरलेस नेटवर्क से जोड़कर किसान मोबाइल फोन पर हर पौधे की वास्तविक सेहत की जानकारी हासिल कर सकेंगे।
यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो खेती अनुमान और अनुभव से आगे बढ़कर रियल-टाइम वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित होगी, जिससे पानी और उर्वरकों की बचत के साथ फसल उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।
जब कोई इंसान बीमार पड़ता है तो स्मार्टवॉच उसकी धड़कन, ऑक्सीजन का स्तर और नींद पर नजर रखकर समय रहते संकेत दे देती है। अब कुछ ऐसा ही कमाल पौधों के लिए भी संभव होने जा रहा है। वैज्ञानिकों ने ऐसे बेहद छोटे 'प्लांट वियरेबल सेंसर' विकसित किए हैं, जो पौधों की सेहत पर चौबीसों घंटे नजर रखेंगे और बीमारी, पानी की कमी या अन्य तनाव के शुरुआती संकेत किसानों तक पहुंचा देंगे।
इससे फसल में नुकसान दिखाई देने से पहले ही आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे।
अक्सर किसान तब तक इंतजार करते हैं, जब तक पौधों की पत्तियां मुरझाने न लगें या उनकी बढ़त रुक न जाए। लेकिन तब तक फसल कई दिनों से तनाव और दर्द झेल रही होती है और नुकसान शुरू हो चुका होता है। इसी चुनौती को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने पौधों के लिए पहनने योग्य नई तकनीक विकसित की है।
टफ्ट्स यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों ने दो तरह के सेंसर तैयार किए हैं। इसमें पहला सेंसर बेहद बारीक अस्थाई टैटू की तरह है, जो पत्तियों पर चिपक जाता है, जबकि दूसरा लचीली पट्टी की तरह बैंड तैयार किया है, जो पौधों के तने पर लिपट जाता है।
क्यों खास हैं ये सेंसर
ये दोनों सेंसर मिलकर पौधे की दो अहम गतिविधियों- पत्ती के भीतर का तापमान और नमी के साथ तने की बढ़त- पर नजर रखते हैं। सबसे खास बात यह है कि इन्हें चलाने के लिए अलग से बैटरी की जरूरत नहीं पड़ती। पौधों से प्राकृतिक रूप से निकलने वाली नमी ही इनके लिए ऊर्जा का स्रोत बन जाती है।
इन सेंसर्स के बारे में अधिक जानकारी प्रतिष्ठित एसीएस जर्नल एप्लाइड मैटेरियल्स एंड इंटरफेसेस में प्रकाशित हुई है।
अमेरिका के टफ्ट्स विश्वविद्यालय और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर समीर सोनकुसले के मुताबिक, भविष्य में पूरे खेत में ऐसे सेंसरों का नेटवर्क लगाया जा सकेगा। तब हर पौधा खुद बता सकेगा कि उसे पानी की जरूरत है, मिट्टी में नमक बढ़ गया है, पोषक तत्वों की कमी है या किसी बीमारी का खतरा मंडरा रहा है। आज किसान फसलों की निगरानी के लिए उपग्रह, ड्रोन, मौसम केंद्र और मिट्टी के सेंसर का सहारा लेते हैं।
ये तकनीकें खेत की स्थिति तो बताती हैं, लेकिन पौधा उस समय वास्तव में कैसा महसूस कर रहा है, यह जानकारी नहीं दे पातीं। दूसरी तरफ ये नए सेंसर पहली बार पौधे के नजरिए से उसकी वास्तविक स्थिति बताएंगे। यह सीधे 'पौधे की नजर से' उसके दिल का हाल जानने जैसा होगा।"
नुकसान दिखने से पहले मिलेगी चेतावनी
रिसर्च का नेतृत्व करने वाली वैज्ञानिक नफीज हुसैन के मुताबिक अब तक खेतों की निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले तरीके या तो मौसम का अंदाजा लगाते हैं या फिर नुकसान हो जाने के बाद उसकी समीक्षा करते हैं। लेकिन यह तकनीक एक तरह का अर्ली वार्निंग सिस्टम है। यह पौधों में तनाव के संकेत तब पकड़ लेती है, जब बाहर से कोई बदलाव दिखाई भी नहीं देता। इससे किसान समय रहते सिंचाई, पोषक तत्वों की आपूर्ति या अन्य जरूरी उपाय कर सकेंगे।
उन्होंने उम्मीद जताई है कि भविष्य में इन सेंसरों की मदद से पौधों में पोषक तत्वों, हार्मोन और रोगजनकों से जुड़े शुरुआती बदलावों की भी निगरानी की जा सकेगी।
पौधे खुद बनाएंगे सेंसर के लिए बिजली
वैज्ञानिकों के मुताबिक पत्ती पर लगाए जाने वाले ये सेंसर इतने हल्के और कोमल हैं कि इसके लगे होने के बावजूद पत्तियां हवा में आराम से झूम सकती हैं और सांस ले सकती हैं। इसमें वैनेडियम पेंटाक्साइड और ग्रेफिन की नैनो-परतों का इस्तेमाल किया गया है। जब पत्ती से नमी बाहर आती है, तो वह खुद-ब-खुद बिजली की हल्की तरंगें पैदा करती है, जिससे यह सेंसर बिना किसी बाहरी पावर के काम करने लगता है।
यह ऊर्जा बेहद कम होती है, लेकिन सेंसर को लगातार काम करते रहने के लिए पर्याप्त है। यानी यह तकनीक बिना बाहरी बैटरी के लंबे समय तक खेतों में इस्तेमाल की जा सकती है।
हर तरह के तनाव को पहचानने में सक्षम
वहीं, तने पर बांधा जाने वाला डिवाइस जापान की कागज काटने की पारंपरिक कला 'किरीगामी' से प्रेरित है, जो तने के फैलने और सिकुड़ने के साथ खुद का आकार बदल लेता है। तने पर लगाया गया सेंसर पौधे की बढ़वार पर नजर रखता है। एक स्वस्थ पौधे का तना दिन-ब-दिन मोटा होता है, लेकिन जब वह किसी तनाव में होता है, तो उसका विकास रुक जाता है या तना सिकुड़ जाता है।
शोधकर्ताओं ने शिमला मिर्च के पौधों पर किए गए परीक्षणों में पाया कि यह तकनीक स्वस्थ पौधों और पानी या लवणता से प्रभावित पौधों के बीच स्पष्ट अंतर पहचान सकती है।
खेतों के लिए तैयार हो रही अगली पीढ़ी की तकनीक
वैज्ञानिक अब इन सेंसरों को लॉन्ग रेंज और ब्लूटूथ आधारित वायरलेस संचार प्रणाली से जोड़ने पर काम कर रहे हैं। भविष्य में किसान अपने मोबाइल फोन पर ही यह देख सकेंगे कि खेत का कौन-सा पौधा कब और किस तरह के तनाव से गुजर रहा है।
ऐसे में यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो खेती केवल मौसम या अनुभव पर नहीं, बल्कि हर पौधे की वास्तविक सेहत से मिलने वाले लाइव आंकड़ों के आधार पर की जा सकेगी। इससे पानी की बचत होगी, उर्वरकों का बेहतर उपयोग होगा और फसल का उत्पादन बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।