म्यांमार के एम्बर में 10 करोड़ साल पुराना अनोखा कीट मिला, जिसके आगे के पंजे केकड़े जैसे पिंसर में विकसित थे फोटो साभार: इंसेक्ट्स पत्रिका
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

10 करोड़ साल पुराने अनोखे जीव की हुई खोज, जिसके सामने के पंजे केकड़े की तरह

म्यांमार के एम्बर में अनोखी खोज : म्यांमार एम्बर में 10 करोड़ साल पुराना जीव मिला है, केकड़े जैसे पंजों वाला अनोखे जीव के लिए वैज्ञानिकों ने नई प्रजाति 'कार्सिनोनेपा लिबेररैंट्स' घोषित की

Dayanidhi

  • म्यांमार एम्बर में 10 करोड़ साल पुराना अनोखा कीट मिला, जिसके आगे के पंजे केकड़े जैसे पिंसर में विकसित थे

  • वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन से कीट की थ्रीडी संरचना समझी और इसके अनोखे पंजों की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया

  • नई प्रजाति कार्सिनोनेपा लिबेररैंट्स को नया जीनस दिया गया, जो असली बग्स समूहहेटेरोप्टेरा से संबंधित है

  • यह कीट पानी के किनारे रहने वाले नेपोमोर्फा समूह से जुड़ा माना गया, जो आधुनिक टोड बग्स जैसा है

  • शोध से पता चला कि ऐसे पिंसर जैसे पंजे अलग-अलग कीट समूहों में स्वतंत्र रूप से कई बार विकसित हुए हैं

म्यांमार के काचिन क्षेत्र से मिले एम्बर (राल) में वैज्ञानिकों को लगभग 10 करोड़ साल पुराना एक बहुत ही अजीब कीट मिला है। यह कीट उस समय के क्रिटेशियस काल के जंगलों में रहता था। एम्बर में दबा यह जीव आज भी बहुत अच्छी हालत में सुरक्षित मिला, जिससे वैज्ञानिक इसके शरीर की बनावट को अच्छे से समझ पाए।

यह खोज जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलियन यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में की गई। इस शोध में वैज्ञानिक की टीम ने माइक्रो-सीटी स्कैनिंग जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग किया, जिससे कीट का थ्रीडी मॉडल तैयार किया गया। यह शोध इंसेक्ट्स नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

कीट की सबसे बड़ी खासियत: केकड़े जैसे पंजे

यह जीव एक प्रकार का असली बग था, जिसे विज्ञान में हेटेरोप्टेरा कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसके आगे वाले पैर थे। इन पैरों के अंत में ऐसे पंजे थे जो बिल्कुल केकड़े के पंजों जैसे दिखते हैं। इन पंजों को “चेले” कहा जाता है, जो किसी चीज को पकड़ने के लिए काम आते हैं।

ऐसे पंजे कीटों में बहुत ही दुर्लभ होते हैं। अब तक केवल तीन प्रकार के कीट समूहों में ही ऐसे पंजों का पता चला था। यह नया जीव चौथा ऐसा उदाहरण है, जिसमें यह संरचना अलग तरीके से विकसित हुई है। इससे पता चलता है कि प्रकृति ने अलग-अलग समय पर अलग-अलग जीवों में एक जैसी क्षमता विकसित की है।

नया नाम और नया वंश

वैज्ञानिकों ने इस नए जीव को पहले से किसी भी ज्ञात समूह में फिट नहीं पाया। इसलिए इसे एक नया वंश और प्रजाति दी गई। इसका नाम 'कार्सिनोनेपा लिबेररैंट्स' रखा गया है।

इस नाम में “कार्सिनो” शब्द का अर्थ केकड़ा होता है और “नेपा” पानी में रहने वाले बग्स के समूह से जुड़ा है। यह समूह वैज्ञानिक रूप से नेपोमोर्फा कहलाता है। इस नाम का एक दिलचस्प हिस्सा भी है। इसका प्रजाति नाम एक लोकप्रिय के-पॉप ग्रुप स्ट्राय किड्स से प्रेरित है। यह नाम शोध टीम की एक सदस्य की पसंदीदा संगीत टीम को सम्मान देने के लिए रखा गया।

यह जीव कैसे रहता होगा?

शरीर की बनावट देखकर वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कीट पानी के पास या नम जगहों पर रहता होगा। इसकी बनावट आज के “टोड बग्स” जैसे जीवों से मिलती है, जिन्हें गेलास्टोकोरिडे कहा जाता है।

आज के टोड बग्स जमीन और पानी के किनारे छोटे कीड़ों का शिकार करते हैं। उसी तरह यह प्राचीन जीव भी अपने बड़े पंजों की मदद से छोटे कीड़ों को पकड़कर खाता होगा। इसके पंजे उसे शिकार को तेजी से पकड़ने में मदद करते होंगे।

प्राचीन जंगल की झलक

वैज्ञानिकों के अनुसार यह जीव लगभग 10 करोड़ साल पहले एक तटीय जंगल में रहता था। उस समय का वातावरण गर्म और नम था। वहां पानी, पेड़ और घनी वनस्पति मौजूद थी। ऐसे माहौल में यह कीट अपने अनोखे पंजों की मदद से जीवित रहता था और शिकार करता था।

इस खोज से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि लाखों साल पहले पृथ्वी पर जीवन कितना विविध और अजीब था। छोटे-छोटे कीट भी बहुत खास और अनोखी क्षमताओं के साथ विकसित हुए थे।

खोज का वैज्ञानिक महत्व

यह खोज केवल एक नए जीव की जानकारी नहीं देती, बल्कि यह भी दिखाती है कि प्रकृति में एक जैसी समस्याओं के लिए अलग-अलग जीव एक जैसे समाधान विकसित कर सकते हैं। केकड़े जैसे पंजे अलग-अलग समूहों में बार-बार विकसित होना “अभिसारी विकास” यानी समान विकास का अच्छा उदाहरण है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे जीवों का अध्ययन करने से हमें आज के कीटों और उनके विकास को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलती है। म्यांमार के एम्बर में मिला यह प्राचीन कीट न केवल वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पृथ्वी के इतिहास की एक दिलचस्प कहानी भी बताता है। इसके केकड़े जैसे पंजे और अनोखी बनावट हमें यह दिखाते हैं कि प्रकृति कितनी रचनात्मक और विविध हो सकती है।