जीवनदायनी गंगा; फोटो: आईस्टॉक 
नदी

बढ़ते तापमान के साथ भारतीय नदियों में तेजी से घट रही ऑक्सीजन, गंगा पर भी गहरा रहा संकट

अध्ययन का दावा है कि बढ़ते जलवायु संकट के कारण भारतीय नदियों में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिर रहा है। ऐसा ही चलता रहा तो सदी के अंत तक कई नदियों में यह घटकर 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे पहुंच सकता है

Lalit Maurya

  • जर्नल 'साइंस एडवांसेज' में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन के अनुसार, जलवायु संकट और बढ़ते तापमान के कारण दुनिया भर की 78.8 फीसदी (करीब 16,000) नदियां तेजी से अपनी ऑक्सीजन खो रही हैं।

  • 1985 से 2023 के बीच 21,439 नदी धाराओं के विश्लेषण से पता चला है कि वैश्विक स्तर पर नदियों में ऑक्सीजन गिरने की दर हर दशक 0.045 मिलीग्राम प्रति लीटर है।

  • इस मूक संकट का सबसे विनाशकारी असर भारत की नदियों और विशेष रूप से गंगा पर पड़ रहा है। गंगा में ऑक्सीजन की कमी वैश्विक औसत से करीब दोगुनी तेजी (0.1 मिलीग्राम प्रति लीटर प्रति दशक) से बढ़ रही है, जबकि कुछ भारतीय नदियों में यह गिरावट 0.2 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी अधिक है।

  • इस तबाही के लिए मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग (62.7 फीसदी) और भीषण लू (22.7 फीसदी) जिम्मेदार हैं, क्योंकि गर्म पानी में ऑक्सीजन घुलने की क्षमता कम हो जाती है। इसके अलावा बांधों, घटते बहाव और बढ़ते प्रदूषण ने भी संकट को और गहरा कर दिया है।

  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो सदी के अंत तक भारत की कई नदियों में ऑक्सीजन का स्तर 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे चला जाएगा।

  • हमें समझना होगा कि यह महज आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह धरती का वह करुण क्रंदन है जो वह अपनी नदियों के माध्यम से हमसे कर रही है। सच कहें तो इंसानों के जीने का तरीका प्रकृति को रास नहीं आ रहा है। शोधकर्ताओं का भी कहना है कि यह संकट धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन इसके असर बेहद गहरे होंगे।

करोड़ों लोगों की आस्था, आजीविका और जीवन का आधार गंगा आज एक ऐसे संकट से गुजर रही है, जो पानी की सतह पर दिखाई नहीं देता। वैज्ञानिकों की मानें तो बढ़ते तापमान और प्रदूषण के चलते जीवनदायनी गंगा धीरे-धीरे अपनी 'सांसें' खो रही है। कुछ ऐसी ही स्थिति भारत सहित दुनिया की 79 फीसदी नदियों की भी है, जिनमें घटती ऑक्सीजन एक नए संकट को जन्म दे रही है।

चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए अध्ययन में दावा किया गया है कि 2001 से 2015 के बीच गंगा के कुछ हिस्सों में हर दशक औसतन 0.1 मिलीग्राम प्रति लीटर ऑक्सीजन कम हो रही है। वहीं इसकी तुलना में दुनिया की नदियों में ऑक्सीजन गिरने की औसत दर 0.045 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई।

यानी गंगा में ऑक्सीजन की कमी वैश्विक औसत से करीब दो गुणा तेजी से बढ़ रही है। हालांकि सुनने में यह कमी छोटी लग सकती है, लेकिन जलीय जीवन के लिए यह किसी धीमे जहर की तरह है।

दुनिया की 79 फीसदी नदियां खो रही हैं ऑक्सीजन

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 1985 से 2023 के बीच पिछले चार दशकों में दुनिया भर की 21,439 नदी धाराओं और सैटेलाइट से प्राप्त 34 लाखों तस्वीरों का विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण के नतीजे दर्शाते हैं कि भारत सहित दुनिया की 78.8 फीसदी नदियां लगातार ऑक्सीजन खो रही हैं। इनके ऑक्सीजन खोने की दर हर दशक औसतन 0.045 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई है।

नतीजे दर्शाते हैं कि दुनिया में करीब 16,000 से अधिक नदियां इस 'मौन संकट' से गुजर रही हैं। हालात यह हैं कि हर दशक में ये नदियां अपनी बची-खुची ऑक्सीजन का एक बड़ा हिस्सा खोती जा रही हैं।

बता दें कि जैसे हम हवा में मौजूद ऑक्सीजन से सांस लेते हैं, वैसे ही पानी में रहने वाली मछलियां, कछुए, पौधे और छोटे जीव पानी में घुली ऑक्सीजन (डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन') के सहारे ज़िंदा रहते हैं। जब पानी में ऑक्सीजन ही नहीं बचेगी, तो नदियां 'जलीय जीवन के कब्रिस्तान' में बदल जाएंगी।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि सबसे ज्यादा संकट उष्णकटिबंधीय यानी ट्रॉपिकल नदियों में है। इनमें भारत की गंगा और दक्षिण अमेरिका की अमेजन जैसी नदियां शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक 1985 से 2023 के बीच दुनिया की 21,439 नदी धाराओं में घुली ऑक्सीजन की औसत मात्रा 8.31 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। इनमें से करीब 76.2 फीसदी नदियां उत्तरी गोलार्ध में, जबकि 23.8 फीसदी दक्षिणी गोलार्ध में स्थित थीं। यह भी पुष्टि हुई है कि भूमध्य रेखा से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बढ़ने पर नदियों में ऑक्सीजन की मात्रा भी बढ़ती जाती है।

बढ़ती गर्मी कैसे छीन रही है नदियों की जीवनदायिनी शक्ति

छह महाद्वीपों में यूरोप और उत्तरी अमेरिका की नदियों में ऑक्सीजन का स्तर सबसे ज्यादा रहा, जहां यह क्रमशः 10.07 और 9.78 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया। वहीं, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका की नदियों में यह स्तर सबसे कम, यानी 7 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी नीचे रहा।

अध्ययन से यह भी पता चला है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों की नदियों में ऑक्सीजन का स्तर आमतौर पर मैदानी इलाकों की नदियों से ज्यादा होता है। उदाहरण के तौर पर तिब्बती पठार की नदियों में समान अक्षांश वाले मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक ऑक्सीजन पाई गई।

क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो नदियों में ऑक्सीजन की सबसे बड़ी गिरावट दक्षिण अमेरिका में दर्ज की गई। वहां करीब 86.4 फीसदी नदी क्षेत्रों में ऑक्सीजन का स्तर घटता पाया गया, जबकि 51.5 फीसदी नदियों में यह गिरावट बेहद गंभीर थी। इसके पीछे अमेजन नदी बेसिन और ब्राजील के ऊंचाई वाले इलाकों में तेजी से बढ़ रही ऑक्सीजन की कमी को मुख्य वजह माना गया है।

भारत की नदियों का सबसे बुरा हाल

वहीं, भारत की नदियों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब देखी गई। यहां कई नदियों में ऑक्सीजन का स्तर हर दशक में 0.2 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी ज्यादा की दर से घट रहा है। ऐसे में अगर यह गिरावट जारी रही, तो आने वाले समय में नदियों के भीतर जीवन का संतुलन बुरी तरह टूट सकता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन नदियों का पानी पहले से ही अपेक्षाकृत गर्म और कम ऑक्सीजन वाला होता है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन और बढ़ती हीटवेव इन्हें तेजी से “हाइपॉक्सिया” यानी खतरनाक ऑक्सीजन कमी की स्थिति की ओर धकेल रही हैं।

वैज्ञानिकों ने इस तबाही के पीछे के कारणों को भी स्पष्ट किया है, जो सीधे तौर पर इंसानी लालच और पर्यावरण से हो रहे खिलवाड़ से जुड़े हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, पानी की ऑक्सीजन को संजोए रखने की क्षमता घटती जा रही है।

रसायन विज्ञान का नियम है कि पानी जितना गर्म होगा, उसमें गैसें उतनी ही कम घुलेंगी। बढ़ते तापमान के कारण पानी और ऑक्सीजन के अणुओं के बीच का कमजोर रिश्ता टूट रहा है और पानी में ऑक्सीजन कम हो रही है।

अध्ययन में इस बात की भी चिंता जताई गई है कि यदि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि (एसएसपी5-8.5 परिदृश्य) इसी तरह बढ़ती रही तो सदी के अंत तक भारत, अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी हिस्सों और पराना पठार जैसे क्षेत्रों की नदियों में ऑक्सीजन में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिलेगी। जहां ऑक्सीजन का स्तर 12 फीसदी से ज्यादा घटने का अंदेशा है।

क्या इस तबाही के लिए हम इंसान नहीं जिम्मेवार?

अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में नदियों में हो रहे डीऑक्सीजनेशन की करीब 62.7 फीसदी वजह केवल जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान है। इसी तरह मौसम में अचानक आने वाले बदलाव और जानलेवा लू भी नदियों से करीब 22.7 फीसदी ऑक्सीजन छीनने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि नदियों में बनते बांधों, घटते बहाव और बढ़ते प्रदूषण ने स्थिति और खराब कर दी है। नदियां जब पहाड़ों से टकराकर, पत्थरों के बीच से कल-कल करती बहती हैं, तो वे हवा से ऑक्सीजन खुद में समेटती हैं।

लेकिन इंसानों द्वारा बनाए गए बांधों और नदियों में घटते पानी के कारण उनका प्राकृतिक बहाव थम गया है। जब नदी का प्रवाह घटता है, तो हवा से पानी में घुलने वाली ऑक्सीजन भी कम हो जाती है। वहीं गर्मी पानी से ऑक्सीजन को बाहर धकेल देती है।

इसके अलावा, नदियों में बढ़ता साल्ट, पोषक तत्व, जैविक कचरा और रासायनिक प्रदूषण भी पानी की गुणवत्ता को बिगाड़ रहे हैं। इसका सीधा असर जलीय जीवों पर पड़ रहा है। इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों की नदियों और उनसे जुड़े पारिस्थितिक तंत्रों में ऑक्सीजन की कमी बढ़ सकती है, जिससे पानी की गुणवत्ता खराब होने और जलीय जीवों के लिए संकट गहराने का खतरा रहेगा।

भारतीय नदियों के लिए भयावह हो सकता है आने वाला कल

अध्ययन के मुताबिक आने वाले समय में भारत की नदियों में घुली ऑक्सीजन (डीओ) में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। सदी के अंत तक कई नदियों में ऑक्सीजन का स्तर घटकर 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे पहुंच सकता है।

ऑक्सीजन का इतना कम स्तर जलीय जीवों और नदी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। इससे मछलियों और दूसरे जलजीवों के जीवित रहने की स्थिति खराब हो सकती है। इसकी वजह से ऑक्सीजन पर निर्भर प्रजातियां खत्म होने लगेंगी, बड़े पैमाने पर मछलियों की मौत हो सकती है और पानी की गुणवत्ता तेजी से बिगड़ सकती है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर कार्बन उत्सर्जन पर तुरंत लगाम न लगाई, तो आने वाले दशकों में नदियों में “डेड जोन’ बनने की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जहां जलीय जीवन लगभग खत्म हो जाता है।

बता दें कि जब नदी में ऑक्सीजन एक खास स्तर से नीचे गिरती है, तो पानी के भीतर एक खौफनाक चक्र शुरू हो जाता है। पहले मछलियां और जलीय पौधे मरते हैं। फिर पानी में मौजूद बैक्टीरिया उन मृत जीवों को सड़ाने के लिए बची-खुची ऑक्सीजन भी सोख लेते हैं। अंत में, वह नदी पानी का प्रवाह नहीं, बल्कि एक 'डेड जोन' (मृत क्षेत्र) बन जाती है। यह एक ऐसा जलीय कब्रिस्तान होता है जहां पानी तो है, लेकिन जीवन की एक भी सांस बाकी नहीं रह जाती।

हमें समझना होगा कि यह महज आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह धरती का वह करुण क्रंदन है जो वह अपनी नदियों के माध्यम से हमसे कर रही है। सच कहें तो इंसानों के जीने का तरीका प्रकृति को रास नहीं आ रहा है। शोधकर्ताओं का भी कहना है कि यह संकट धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन इसके असर बेहद गहरे होंगे।

ऐसे में यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी गंगा के आचमन की पवित्रता को महसूस कर सकें और दुनिया की नदियां खुशहाल बनी रहें, तो वैश्विक नेताओं और नीति निर्माताओं को समय रहते ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते प्रदूषण के खिलाफ कड़े कदम उठाने होंगे। नदियों की सांसें बचाना अब महज पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि यह हमारे खुद के वजूद को बचाए रखने की भी लड़ाई है।