नदियों और भूजल की सुरक्षा से जुड़े दो मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेशों ने सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी और जवाबदेही को फिर सामने ला दिया है।
सोलानी नदी के मामले में एनजीटी के निर्देश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 100 साल में आने वाली संभावित बाढ़ को ध्यान में रखते हुए नदी के बाढ़ क्षेत्र की नए सिरे से पैमाइश कर उसकी सीमाएं तय की हैं।
एक मीटर की सटीकता वाले डिजिटल एलिवेशन मॉडल के आधार पर तैयार नक्शे के बाद सहारनपुर और मुजफ्फरनगर में बाढ़ क्षेत्र को अधिसूचित किया गया और जमीन पर सीमांकन स्तंभ भी लगाए गए। यह कदम नदी के प्राकृतिक फैलाव वाले क्षेत्र को अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण से बचाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
दूसरी ओर, दिल्ली के सिविल लाइंस में अवैध बोरवेल के खिलाफ एनजीटी के आदेश पर कार्रवाई न होने से सवाल उठे हैं।
27 जनवरी 2026 के निर्देश के बावजूद बोरवेल हटाने या सील करने की कार्रवाई नहीं होने पर ट्रिब्यूनल ने दिल्ली जल बोर्ड, डीपीसीसी और एसडीएम से जवाब मांगा है। तीनों एजेंसियों को 27 नवंबर की अगली सुनवाई से पहले कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
एक मामला नदी को उसका प्राकृतिक सुरक्षा घेरा देने का है, तो दूसरा भूजल की लूट पर लगाम लगाने में सरकारी सुस्ती का—दोनों ही पर्यावरणीय जवाबदेही की अहम तस्वीर पेश करते हैं।
बरसात के दिनों में नदी का शांत बहता पानी कब उफान में बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। बाढ़ का पानी खेतों, घरों और सड़कों तक पहुंचकर लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में नदी के बाढ़ क्षेत्र की सही पहचान केवल कागज पर बनी लकीर नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षा से जुड़ा बेहद अहम कदम है।
इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग ने सोलानी नदी के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन को लेकर अपनी रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में 7 सितंबर 2026 को दाखिल की। यह रिपोर्ट एनजीटी द्वारा 8 जुलाई 2026 को दिए आदेश पर अदालत में सौंपी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक सोलानी नदी उत्तराखंड में देहरादून के पास हिमालय की तलहटी से निकलती है। इसके बाद यह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जिलों से होती हुई शुक्रताल से पहले गंगा की सहायक नदी बाणगंगा में मिल जाती है।
क्यों पड़ी इस सर्वे की जरूरत?
एनजीटी ने पाया था कि गंगा और उसकी सहायक नदियों के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन में इस्तेमाल किए जाने वाले एक मीटर के कंटूर अंतराल को पहले पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया था। पुराने नक्शों की जांच में भी एक मीटर के कंटूर अंतराल का पालन नहीं किया गया था।
इसके बाद एनजीटी के निर्देश पर सोलानी नदी के पूरे प्रवाह क्षेत्र का भौतिक सर्वेक्षण कराया गया। हरिद्वार के बहादराबाद स्थित हाइड्रोलॉजी डिवीजन ने यह सर्वे किया। इसके आधार पर एक मीटर की सटीकता वाला हाइब्रिड डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम) तैयार किया गया।
एक मीटर के अंतराल पर तैयार हुआ बाढ़ क्षेत्र का नक्शा
इस मॉडल की मदद से नदी के दोनों किनारों पर 100 साल में एक बार आने वाली संभावित बाढ़ यानी 1:100 वर्ष की बाढ़ को ध्यान में रखते हुए बाढ़ क्षेत्र का मॉडल तैयार किया गया और पूरे नदी क्षेत्र के नक्शे बनाए गए।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि सोलानी नदी बिजनौर जिले से होकर नहीं गुजरती। जिले में नदी का कोई हिस्सा मौजूद नहीं है। इसलिए वहां हाइड्रोलॉजिकल सर्वेक्षण, डीईएम मॉडलिंग या कंटूर मैपिंग की जरूरत नहीं पड़ी और न ही यह काम कराया गया।
अधिसूचना जारी, नदी के अस्तित्व को मिलेगी संजीवनी
रिपोर्ट के मुताबिक, एक मीटर डीईएम सर्वे और 100 साल की वापसी अवधि वाली बाढ़ के आकलन के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार ने सोलानी नदी के बाढ़ क्षेत्र को सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जिलों में चिन्हित कर अधिसूचित किया था। इसके लिए 24 दिसंबर 2024 और 27 दिसंबर 2024 को सरकारी गजट में अधिसूचना जारी की गई थीं।
इसके बाद नदी के दोनों किनारों पर 100 साल की वापसी अवधि वाली बाढ़ के आधार पर बाढ़ क्षेत्र की सीमा को जमीन पर चिन्हित करने का काम भी पूरा किया गया। सिंचाई निर्माण खंड, सहारनपुर ने 7 फरवरी 2025 तक सीमांकन स्तंभ लगा दिए थे।
यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि नदी के प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र को स्पष्ट रूप से चिन्हित करने से भविष्य में ऐसे इलाकों में अनियोजित निर्माण और अतिक्रमण पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। बाढ़ के समय नदी को फैलने के लिए प्राकृतिक जगह मिले, तो आसपास बसे लोगों और उनकी आजीविका पर खतरा कम किया जा सकता है।
आदेश के बावजूद नहीं हटे सिविल लाइंस के अवैध बोरवेल, एनजीटी ने अधिकारियों से मांगा जवाब
दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में अवैध रूप से चल रहे बोरवेल को हटाने या सील करने के मामले में संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
आरोप है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा 27 जनवरी 2026 को दिए आदेश के बावजूद अब तक इस मामले में जरूरी कदम नहीं उठाए गए हैं। आवेदक के वकील ने ट्रिब्यूनल को बताया कि संबंधित विभागों ने एनजीटी के निर्देशों का पालन नहीं किया है।
ऐसे में एनजीटी ने 3 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी), दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और सिविल लाइंस के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इन विभागों को अगली सुनवाई यानी 27 नवंबर 2026 से पहले अपनी रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करनी होगी।
क्या है पूरा मामला
गौरतलब है कि इससे पहले 27 जनवरी को एनजीटी ने दिल्ली जल बोर्ड और सिविल लाइंस के एसडीएम को शिकायत की मौके पर जाकर जांच करने का निर्देश दिया था। ट्रिब्यूनल ने कहा था कि यदि शिकायत सही पाई जाती है तो संबंधित अवैध बोरवेल को सील किया जाए।
एनजीटी ने जल बोर्ड और एसडीएम को अवैध बोरवेल की जानकारी डीपीसीसी के सदस्य सचिव को देने का भी निर्देश दिया था। इसके बाद डीपीसीसी को अवैध रूप से भूजल दोहन की अवधि के आधार पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति तय कर उसकी वसूली के लिए उचित कदम उठाने थे।
प्रशासनिक लापरवाही के कारण सिविल लाइंस क्षेत्र में लगातार गिरते भूजल स्तर और एनजीटी के आदेशों की अनदेखी को लेकर अब तीनों मुख्य एजेंसियों की जवाबदेही तय होना तय माना जा रहा है। अब अगली सुनवाई में संबंधित अधिकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि एनजीटी के पुराने आदेश पर अब तक क्या कार्रवाई की गई और अवैध बोरवेल के खिलाफ जमीन पर कितने कदम उठाए गए।