आरोप है कि सारण की तेल नदी अतिक्रमण, गाद और प्रशासनिक लापरवाही के बोझ तले दम तोड़ रही है।
नदी का प्राकृतिक प्रवाह लगभग खत्म होने से 40 फीसदी उपजाऊ जमीन स्थायी जलभराव की चपेट में आ गई है, जिससे खेती, किसानों की आजीविका और पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।
याचिका के अनुसार, तेल नदी और उसकी सहायक धाराएं अब गाद से भर गई हैं। साथ ही जलकुंभी, खरपतवार और अतिक्रमण के चलते इनका प्रवाह मार्ग इतना संकरा हो गया है कि वे घागरा के अतिरिक्त पानी का निकास नहीं कर पा रहीं। इससे क्षेत्र में बाढ़ और स्थाई जलजमाव जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
एनजीटी में दायर याचिका ने चेताया है कि यदि समय रहते तेल नदी और उससे जुड़ी आर्द्रभूमियों का पुनर्जीवन नहीं हुआ, तो यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।
बिहार के सारण जिले की जीवनदायिनी तेल नदी आज अतिक्रमण, गाद जमाव और कृत्रिम अवरोधों के कारण अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। नदी का प्राकृतिक प्रवाह करीब-करीब समाप्त हो चुका है। प्रवाह में अवरोध के चलते क्षेत्र की 40 फीसदी से अधिक उपजाऊ जमीन जलभराव की चपेट में आ गई है।
यह मामला वेटरन्स फोरम फॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ द्वारा 6 मार्च 2026 को दायर याचिका में उठाया गया, जिसे 15 अप्रैल 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है।
याचिका में मांग की गई है कि सारण जिले के जलालपुर, रेवेलगंज और छपरा सागर ब्लॉकों से होकर गुजरने वाली तेल नदी को अतिक्रमण और अवरोधों से मुक्त कर पुनर्जीवित किया जाए। तेल नदी का उद्गम भटकेसरी, गमरहिया और मंगोलपुर नामक तीन आद्रभूमियों से होता है। यह नदी कई गांवों से होकर बहते हुए इनाई गांव के पास घाघरा (सरयू) नदी में मिल जाती है।
गाद, जलकुंभी, अतिक्रमण ने बिगाड़ी हालत
घाघरा की सहायक धाराएं सारण के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र के लिए प्राकृतिक जल निकासी का काम करती हैं। सामान्य बारिश के दौरान यही धाराएं अतिरिक्त पानी को उत्तर से दक्षिण की ओर बहाकर घाघरा नदी में पहुंचाती हैं। इस तरह यह क्षेत्र को जलभराव और फसलों के नुकसान से बचाती हैं।
हालांकि याचिका के अनुसार, तेल नदी और उसकी सहायक धाराएं अब गाद से भर गई हैं। साथ ही जलकुंभी, खरपतवार और अतिक्रमण के चलते इनका प्रवाह मार्ग इतना संकरा हो गया है कि वे घागरा के अतिरिक्त पानी का निकास नहीं कर पा रहीं। इससे क्षेत्र में बाढ़ और स्थाई जलजमाव जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
कई गांवों में बने ‘चोक प्वाइंट’
विदेश, राष्ट्रमंडल एवं विकास कार्यालय द्वारा तेल नदी के पुनर्जीवन के लिए तैयार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में कई ऐसे ‘चोक प्वाइंट’ चिन्हित किए गए हैं, जहां नदी का प्रवाह बुरी तरह बाधित है। इनमें रुशी, भटकेसरी, गमरहिया, नवादा, कुमना, देवरिया और विष्णुपुरा जैसे कई गांव शामिल हैं।
इन गांवों में, गाद और अतिक्रमण ने तेल नदी के वजूद को खतरे में डाल दिया है, जिससे पानी के मुक्त प्रवाह में भारी रुकावट आ रही है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुताबिक सारण जिले में 543 आद्रभूमियां हैं, जो 21,170 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हैं। लेकिन तेल नदी से जुड़ी तीन प्रमुख आद्रभूमियां चैनलों (पाइन्स) से जुड़ी हैं और मानसून में आपस में ज्यादा पानी ट्रांसफर करती हैं।
तीनों आर्द्रभूमियां अव्यवस्थित निर्माण, प्रदूषण व कचरा निपटान, अतिक्रमण और भूमि भराई, आक्रामक प्रजातियों के प्रसार, जलवायु परिवर्तन तथा जल प्रवाह में बदलाव के चलते करीब निष्क्रिय हो चुकी हैं और काम नहीं कर रही। इसकी वजह से क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई है और जलभराव स्थाई रूप से बना हुआ है। इससे फसलें और कृषि गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।
प्रशासन पर लगे गंभीर आरोप
याचिका में यह भी कहा गया है कि आवेदक ने तेल नदी तथा गमरहिया, भटकेसरी और मंगोलपुर आर्द्रभूमियों की मौजूदा स्थिति को लेकर संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजा था। लेकिन समस्या के समाधान के बजाय अधिकारियों ने तेल नदी की मुख्य धारा में भौतिक अवरोध (डैम) बना दिया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।
आवेदन में यह भी कहा गया है कि बिहार राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने भटकेसरी, मंगोलपुर और गमरहिया आर्द्रभूमियों की सीमा निर्धारण के लिए मनमाने और केवल कागजी सर्वे किए, जो जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। साथ ही, सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों और स्पेस एप्लीकेशन सेंटर एटलस 2021 के आंकड़ों को भी नजरअंदाज किया गया।
ऐसे में याचिका में मांग की गई है कि राजस्व अभिलेखों के आधार पर तेल नदी के वास्तविक मार्ग की पहचान की जाए। नदी पर हुए सभी अवरोधों और अतिक्रमणों को हटाया जाए साथ ही तेल नदी और उससे जुड़ी आद्रभूमियों को पुनर्जीवित किया जाए
स्पष्ट है कि तेल नदी का संकट अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सारण की कृषि, जलनिकासी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। यदि समय रहते पुनर्जीवन और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं हुई, तो किसानों की आजीविका और क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ सकता है।