शहरी 'नीली टिटस' पक्षियां अपने घोंसलों में सिगरेट के फिल्टर रखकर परजीवी ब्लोफ्लाई और अन्य हानिकारक कीटों से सुरक्षा पाती हैं।
जंगलों में 'नीली टिटस' पक्षियां सुगंधित पौधों का उपयोग करती हैं, जबकि शहरों में उन्होंने मानव कचरे को अपनाया है।
अध्ययन में चूजों का रक्त जांचने पर पाया गया कि फिल्टर और कृत्रिम घोंसलों में स्वास्थ्य बेहतर और रक्त हानि कम पाई गई।
सिगरेट फिल्टर में मौजूद निकोटिन कीटों को दूर रख सकता है, जिससे चूजों के घोंसलों में परजीवी कम पाए गए।
हालांकि फिल्टर से कुछ फायदे हैं, लेकिन आर्सेनिक और भारी धातुओं जैसे रसायन लंबी अवधि के दौरान पक्षियों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकते हैं।
शहरों में कूड़ा-कचरा न केवल हमारी सड़कों और मोहल्लों को गंदा करता है, बल्कि यह जंगली जीव-जंतुओं के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है। हाल ही में 'एनिमल बिहेवियर' पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि नीली टिटस पक्षियां (ब्लू टिटस बर्ड्स) अपने घोंसलों में सिगरेट के फेंके हुए फिल्टर या बट्स का इस्तेमाल कर रही हैं। यह आदत उन्हें परजीवी संक्रमण से बचाने में मदद कर सकती है।
प्राकृतिक और शहरी व्यवहार में अंतर
वन्य जीवन में नीली टिट पक्षी अपने घोंसलों को सुगंधित पौधों जैसे लैवेंडर से सजाती हैं। इन पौधों की खुशबू खून चूसने वाले परजीवियों को दूर रखती है। लेकिन शहरों में ये पक्षी कुछ अलग कर रहे हैं। शहरी वातावरण में नीली टिट्स पक्षी फेंके हुए सिगरेट फिल्टर या बट्स इकट्ठा करके अपने घोंसलों में भर रही हैं। वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि क्या यह केवल शहरी जीवन के अनुकूलन के कारण है या ये फिल्टर वास्तव में रासायनिक ढाल की तरह काम कर रहे हैं।
कैसे किया गया अध्ययन?
पोलैंड के वैज्ञानिकों ने शहरों के पार्कों और गहरे जंगलों में 33 नीली टिटस पक्षी के परिवारों का अध्ययन किया। उन्होंने इन घोंसलों को तीन समूहों में बांटा। पहले समूह को नियंत्रण समूह बनाया गया, जिसमें घोंसलों को प्राकृतिक रखा गया और केवल दो बिना पीए गए सिगरेट फिल्टर जोड़े गए। दूसरे समूह में दो पीए गए सिगरेट फिल्टर रखे गए, ताकि यह देखा जा सके कि शहरी पक्षियों के व्यवहार का प्रभाव क्या है। तीसरे समूह में प्राकृतिक घोंसलों को हटा कर प्रयोगशाला में साफ और स्टरलाइज्ड घोंसलों को रखा गया, जो काई और कॉटन से बने थे।
चूजों की स्वास्थ्य जांच
अध्ययन के 13 दिन बाद, प्रत्येक घोंसले में जन्मे चूजों की स्वास्थ्य की जांच की गई। उनके पंखों की लंबाई मापी गई और रक्त नमूने लेकर उनकी बीमारी या एनीमिया की स्थिति जांची गई। परिणामों में पाया गया कि सिगरेट फिल्टर वाले घोंसलों और कृत्रिम घोंसलों में पले चूजों में हीमोग्लोबिन और हीमैटोक्रिट का स्तर अधिक था। इसका मतलब यह है कि इन चूजों की शारीरिक स्थिति बेहतर थी और उनमें परजीवी के कारण रक्त क्षरण कम हुआ।
सिगरेट फिल्टर और परजीवी नियंत्रण
परजीवियों की संख्या गिनने पर यह देखा गया कि प्राकृतिक घोंसलों में अधिक परजीवी थे जबकि कृत्रिम घोंसलों में लगभग कोई परजीवी नहीं थे। सिगरेट फिल्टर वाले घोंसलों में ब्लोफ्लाई लार्वा कम पाए गए। ब्लोफ्लाई लार्वा आमतौर पर घोंसलों में रहते हैं और चूजों के रक्त को चूसते हैं। इससे यह पता चलता है कि सिगरेट फिल्टर में मौजूद निकोटिन परजीवियों को दूर रख सकता है और उन्हें मारने में सहायक हो सकता है।
शहरी पक्षियों की अनोखी रणनीति
अध्ययन में अध्ययनकर्ता के हवाले से कहा गया है कि सिगरेट फिल्टर का उपयोग शहरी नीली पक्षियों की एक अवसरवादी अनुकूलन रणनीति हो सकती है। यह प्राकृतिक पौधों की तरह ही परजीवियों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है और घोंसले में पले चूजों के स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है। यह शहरी पक्षियों की अनोखी बुद्धिमानी और पर्यावरण के अनुकूलन की क्षमता को दर्शाता है।
लंबे समय में होने वाले खतरे
हालांकि यह अच्छी खबर लग सकती है, लेकिन शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है। सिगरेट फिल्टर में आर्सेनिक और भारी धातुएं जैसी हानिकारक रसायन भी मौजूद होती हैं। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि लंबे समय में ये रसायन पक्षियों के स्वास्थ्य पर क्या असर डाल सकते हैं। इसलिए शहरी वातावरण में कूड़ा-कचरा पूरी तरह से सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि शहरी नीली टिट्स पक्षियां मानव निर्मित पर्यावरण का फायदा उठाकर अपने घोंसलों की सुरक्षा कर रही हैं। यह पर्यावरण के अनुकूलन की एक अद्भुत मिसाल है। हालांकि इस व्यवहार के फायदे और खतरे दोनों हैं।
सिगरेट फिल्टर या बट्स से परजीवी दूर होते हैं और चूजों का स्वास्थ्य बेहतर होता है, लेकिन इसमें मौजूद रसायन लंबे समय में नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह शोध हमें यह भी याद दिलाता है कि कूड़ा फेंकना केवल हमारे लिए ही नहीं, बल्कि जंगली जीवों के लिए भी खतरा बन रहा है।