‘फास्ट टेक’ बना नई चुनौती: सस्ते इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और तेजी से बदलती तकनीक ने ई-कचरे की समस्या को गंभीर बनाया। फोटो साभार: आईस्टॉक
प्रदूषण

ई-कचरे का बढ़ता पहाड़: 2025-26 मार्च तक भारत में 14 लाख मीट्रिक टन से ज्याद ई-कचरा हुआ पैदा

विश्व ई-कचरा दिवस विशेष: सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान और ‘फास्ट टेक’ के बढ़ते चलन ने बढ़ाई चिंता, पुराने उपकरणों का सही निपटान अब समय की जरूरत

Dayanidhi

  • भारत में ई-कचरे का बढ़ता बोझ: साल 2025-26 में मार्च तक देश में 14.14 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा हुआ।

  • रीसाइक्लिंग में उत्तर प्रदेश सबसे आगे: 3.76 लाख मीट्रिक टन ई-कचरे के पुनर्चक्रण के साथ उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर रहा।

  • ‘फास्ट टेक’ बना नई चुनौती: सस्ते इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और तेजी से बदलती तकनीक ने ई-कचरे की समस्या को गंभीर बनाया।

  • रीसाइक्लिंग के आंकड़ों में अंतर: मार्च 2026 तक 9.79 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पुनर्चक्रित हुआ, लेकिन सालाना आंकड़े अभी अधूरे थे।

  • जिम्मेदार इस्तेमाल से घटेगा ई-कचरा: पुराने मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत केंद्रों को सौंपने तथा मरम्मत कराने से प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी।

हर साल 14 अक्टूबर को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय ई-कचरा दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को इलेक्ट्रॉनिक कचरे के बढ़ते खतरे के प्रति जागरूक करना और उसके सही निपटान के लिए प्रेरित करना है।

इस पहल की शुरुआत वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट (डब्ल्यूईईई) फोरम ने की थी। साल 2026 में इसका नौवां संस्करण ‘फास्ट टेक’ पर आधारित है। यानी ऐसे छोटे, सस्ते और जल्दी बदल दिए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।

क्या है ई-कचरा और क्यों है चिंता?

पुराना मोबाइल, खराब लैपटॉप, बेकार पड़ा टीवी, टूटा मिक्सर, बिजली से चलने वाला टूथब्रश या खराब एलईडी बल्ब, ये सभी ई-कचरे के उदाहरण हैं। जब बिजली या बैटरी से चलने वाले उपकरण इस्तेमाल के लायक नहीं रहते और उन्हें फेंक दिया जाता है, तो वे ई-कचरे की श्रेणी में आते हैं।

आज तकनीक तेजी से बदल रही है। नया मोबाइल बाजार में आते ही पुराने फोन को बदलने की होड़ शुरू हो जाती है। सस्ते इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद भी बड़ी संख्या में खरीदे जाते हैं और थोड़े समय बाद कचरे में पहुंच जाते हैं। यही ‘फास्ट टेक’ का बढ़ता चलन ई-कचरे की समस्या को और गंभीर बना रहा है।

ई-कचरे में तांबा, सोना और दूसरी उपयोगी धातुएं मौजूद होती हैं, जिन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इसमें सीसा, पारा और अन्य हानिकारक पदार्थ भी हो सकते हैं। गलत तरीके से तोड़ने, जलाने या खुले में फेंकने से मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित हो सकते हैं। इसलिए ई-कचरे को सामान्य घरेलू कचरे की तरह फेंकना ठीक नहीं है।

भारत में हर साल बढ़ रहा कचरा

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में साल 2023-24 में 12,54,286 मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा हुआ। साल 2024-25 में यह बढ़कर 13,97,955 मीट्रिक टन हो गया। वहीं, साल 2025-26 के लिए मार्च 2026 तक सामने आए आंकड़ों में ई-कचरे की मात्रा 14,14,645 मीट्रिक टन बताई गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि देश में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल के साथ उनके कचरे की मात्रा भी लगातार बढ़ रही है। इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की बढ़ती मांग, तेजी से बदलती तकनीक और पुराने उपकरणों को जल्दी बदलने की आदत इस समस्या के प्रमुख कारण हैं।

रीसाइक्लिंग में प्रगति, लेकिन तस्वीर अधूरी

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024-25 में करीब 11.59 लाख मीट्रिक टन ई-कचरे का पुनर्चक्रण किया गया। साल 2025-26 के लिए मार्च तक उपलब्ध आंकड़ों में यह मात्रा 9,79,080 मीट्रिक टन रही।

पहली नजर में रीसाइक्लिंग की हिस्सेदारी में गिरावट दिखाई देती है। हालांकि यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। वर्ष 2025-26 के आंकड़े पूरे साल के नहीं, बल्कि मार्च तक उपलब्ध जानकारी पर आधारित थे। ऐसे में पूरे साल के कचरे और अधूरी अवधि में दर्ज पुनर्चक्रण की तुलना करने से तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती। इसलिए इन आंकड़ों के आधार पर रीसाइक्लिंग व्यवस्था को कमजोर बताना जल्दबाजी होगी।

तीन राज्यों में सबसे ज्यादा रीसाइक्लिंग

राज्यों के आंकड़े बताते हैं कि औपचारिक ई-कचरा पुनर्चक्रण कुछ राज्यों में अधिक केंद्रित है। वर्ष 2025-26 के उपलब्ध आंकड़ों में उत्तर प्रदेश 3,76,896 मीट्रिक टन के साथ सबसे आगे रहा। तेलंगाना में 1,61,988 मीट्रिक टन और हरियाणा में 1,35,951 मीट्रिक टन ई-कचरे का रीसाइक्लिंग या पुनर्चक्रण दर्ज किया गया।

देश में पंजीकृत रीसाइक्लरों और उनकी प्रसंस्करण क्षमता का विस्तार इस क्षेत्र के लिए अच्छी खबर है। लेकिन मशीनों और संयंत्रों की क्षमता होना तथा उनका पूरी क्षमता से काम करना दो अलग बातें हैं। जरूरत इस बात की है कि अधिक से अधिक ई-कचरा अधिकृत केंद्रों तक पहुंचे और उसका सही रिकॉर्ड रखा जाए।

अनौपचारिक क्षेत्र को साथ लेना जरूरी

भारत में ई-कचरे का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र के जरिए भी इकट्ठा और अलग किया जाता है। इसलिए पैदा हुए और औपचारिक रूप से पुनर्चक्रित किए गए कचरे के बीच के अंतर को सीधे अनौपचारिक क्षेत्र का हिस्सा मानना सही नहीं होगा। इसमें वह कचरा भी शामिल हो सकता है, जिसका प्रसंस्करण या रिकॉर्ड संबंधित समय तक पूरा नहीं हुआ था।

ई-कचरे के बेहतर प्रबंधन के लिए जरूरी है कि अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को अधिकृत व्यवस्था से जोड़ा जाए। इससे पर्यावरण और कामगारों की सुरक्षा के साथ उपयोगी धातुओं की बरामदगी भी बेहतर हो सकती है।

छोटी आदत, बड़ा बदलाव

ई-कचरे की समस्या का समाधान केवल सरकार या रीसाइक्लिंग कंपनियों के भरोसे नहीं हो सकता। लोगों को पुराने मोबाइल, बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिकृत संग्रह केंद्रों को देने चाहिए। काम कर रहे उपकरणों को बेवजह बदलने से बचना चाहिए और जहां संभव हो, उनकी मरम्मत कराकर दोबारा इस्तेमाल करना चाहिए।

इस विश्व ई-कचरा दिवस का संदेश साफ है: तकनीक हमारी जिंदगी आसान बनाए, लेकिन उसका कचरा भविष्य के लिए मुसीबत न बने। पुराने उपकरणों का जिम्मेदारी से निपटान और उनका सही पुनर्चक्रण ही स्वच्छ पर्यावरण और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में बड़ा कदम है।