केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट ने ओडिशा की सुकिंदा घाटी में खनन गतिविधियों से जुड़े पर्यावरणीय प्रबंधन की गंभीर खामियों को उजागर किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई खदानों से निकलने वाला अपशिष्ट जल (एफ्लुएंट) उपचार के बाद भी तय मानकों से अधिक प्रदूषित पाया गया और यह सीधे स्थानीय नालों के जरिए ब्राह्मणी नदी तक पहुंच रहा है।
सबसे गंभीर मामले में जिंदल स्टेनलेस की कलियापानी खदान के ईटीपी से निकलने वाले पानी में हेक्सावैलेंट क्रोमियम (Cr6+) की मात्रा मानक से लगभग तीन गुणा अधिक दर्ज की गई। वहीं ओडिशा माइनिंग कॉर्पोरेशन की दक्षिण कलियापानी खदान में पानी का पीएच स्तर भी सुरक्षित सीमा से बाहर पाया गया, जिससे जलीय पारिस्थितिकी पर खतरा बढ़ रहा है।
रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि खदानों में ट्रीटमेंट प्लांट अपनी क्षमता से अधिक दबाव में काम कर रहे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर अपशिष्ट जल को साझा प्लांट में भेजा जा रहा है, जिसके लिए जरूरी अनुमतियों की कमी है। साथ ही, संचालन की अनुमति और वास्तविक ट्रीटमेंट क्षमता के बीच गंभीर असंतुलन सामने आया है।
सीपीसीबी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से वास्तविक अपशिष्ट जल उत्पादन की समीक्षा, ईटीपी क्षमता बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर अनुमति शर्तों में संशोधन की सिफारिश की है।
यह रिपोर्ट संकेत देती है कि सुकिंदा घाटी में प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच फंसी हुई है, जिसका सीधा असर नदी तंत्र, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट ने ओडिशा की सुकिंदा घाटी में पर्यावरण सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई खदानों से निकलने वाला अपशिष्ट जल (एफ्लुएंट) ट्रीटमेंट के बावजूद तय मानकों से अधिक प्रदूषित पाया गया। चिंता की बात है कि यह एफ्लुएंट सीधे स्थानीय नालों के जरिए जीवनदायिनी ब्राह्मणी नदी तक पहुंच रहा है।
रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि जिंदल स्टेनलेस की कलियापानी क्रोमाइट खदान में स्थापित इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) से निकलने वाले एफ्लुएंट में हेक्सावैलेंट क्रोमियम (सीआर6+) की मात्रा 0.16 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। यह निर्धारित सीमा 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी तीन गुणा अधिक है।
सुकिंदा की खदानों से बहता जहर, निगरानी पर सवाल
पता चला है कि यह पानी धर्मशाला नाले में छोड़ा जा रहा था, जो आगे ब्राह्मणी नदी में मिल जाता है। सीपीसीबी ने साफ कहा कि कंपनी हेक्सावैलेंट क्रोमियम से जुड़े मानकों का पालन करने में विफल रही है और उसे सुधार के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे।
सीपीसीबी द्वारा 11 मई 2026 को दाखिल रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि ओडिशा माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ओएमसी) की दक्षिण कलियापानी खदान में ईटीपी से निकलने वाले पानी का पीएच स्तर 10.2 पाया गया, जबकि तय मानकों के अनुसार इसे 5.5 से 9 के बीच होना चाहिए। इसके बावजूद यह दूषित एफ्लुएंट धर्मशाला नाले में छोड़ा जा रहा था।
यानी संयंत्र तय पीएच सीमा के भीतर एफ्लुएंट को ट्रीट करने में विफल रहा है। गौरतलब है कि अधिक पीएच वाला यह पानी जलीय जीवों और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बन सकता है।
रिपोर्ट में टाटा स्टील की कमरदा, सरुआबिल और सुकिंदा खदानों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
क्षमता से अधिक बोझ झेल रहे ट्रीटमेंट प्लांट
रिपोर्ट से पता चला है कि टाटा स्टील माइनिंग की कमरदा क्रोमाइट खदान में जनवरी 2025 में पुराने एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) को हटाए जाने के बाद, वहां निकलने वाले दूषित एफ्लुएंट को ट्रीटमेंट के लिए अब सरुआबिल क्रोमाइट खदान के ट्रीटमेंट प्लांट तक भेजा जा रहा है।
ऐसे में सीपीसीबी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस व्यवस्था के लिए दोनों खदानों को ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से आवश्यक अनुमति लेनी चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि टाटा स्टील माइनिंग की कमारदा, सरुआबिल और सुकिंदा खदानों में संचालन की सहमति (सीटीओ) के तहत जितना एफ्लुएंट छोड़ने की अनुमति है, वह वहां लगे एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता से कहीं अधिक है। मतलब कि प्लांट पर क्षमता से कहीं अधिक बोझ है।
प्रदूषण नियंत्रण बना कागजी दावा?
ऐसे में सीपीसीबी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कहा है कि वह अपशिष्ट जल की वास्तविक मात्रा की समीक्षा करे। बोर्ड से इस बात की भी जांच करने के लिए कहा गया है कि क्या ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता में इजाफा करने की जरुरत है।
इसके बाद या तो अधिक क्षमता वाला प्लांट लगाने के निर्देश दिए जाए या फिर संचालन की सहमति से जुड़ी शर्तों में संशोधन किया जाए।
गौरतलब है कि ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) की 25 अप्रैल 2026 को अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अप्रैल 2026 तक ओडिशा के चार जिलों में 104 खदानें सक्रिय हैं। इनमें अंगुल में 17 कोयला, जाजपुर में 11 क्रोमाइट और सुंदरगढ़ व क्योंझर में 75 लौह व मैंगनीज खदानें शामिल हैं। जानकारी दी गई है कि इन सभी खदानों के पास ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ जैसी वैध अनुमति है और वायु व जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बुनियादी उपाय लागू किए गए हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ठोस कचरा प्रबंधन, सतही बहाव (रन-ऑफ) नियंत्रण और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) जैसी व्यवस्थाएं हर खदान में मौजूद हैं और उनकी नियमित जांच भी होती है।
वहीं सीपीसीबी रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि सुकिंदा घाटी में खनन गतिविधियों के बीच पर्यावरणीय नियमों का पालन गंभीर सवालों के घेरे में है। जब उपचार संयंत्रों से निकलने वाला पानी भी जहरीले तत्वों और तय मानकों से अधिक प्रदूषण के साथ सीधे ब्राह्मणी नदी तक पहुंच रहा हो, तो यह केवल तकनीकी कमी नहीं, बल्कि निगरानी और जवाबदेही की विफलता भी है।
यह स्थिति दिखाती है कि यदि प्रदूषण नियंत्रण केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाए, तो इसका असर सिर्फ नदियों और जैव विविधता पर नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की जीविका और स्वास्थ्य पर भी पड़ता है, जो इन जल स्रोतों पर निर्भर हैं।