दुनिया के सबसे दूरस्थ क्षेत्र भी प्लास्टिक प्रदूषण से प्रभावित, हवा के जरिए पहुंचे खतरनाक सूक्ष्म प्लास्टिक कण। फोटो साभार: आईस्टॉक
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अंटार्कटिका की मिट्टी में नैनोप्लास्टिक मिले, दुनिया के सबसे दूर इलाकों तक पहुंचा प्लास्टिक प्रदूषण

अंटार्कटिका की बर्फीली धरती में मिला नैनोप्लास्टिक, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता; हवा और मानवीय गतिविधियों से दूर इलाकों तक पहुंच रहा प्लास्टिक प्रदूषण

Dayanidhi

  • अंटार्कटिका की मिट्टी में पहली बार मिले नैनोप्लास्टिक, वैज्ञानिकों ने इसे वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण का गंभीर संकेत बताया।

  • दुनिया के सबसे दूरस्थ क्षेत्र भी प्लास्टिक प्रदूषण से प्रभावित, हवा के जरिए पहुंचे खतरनाक सूक्ष्म प्लास्टिक कण।

  • मैकमर्डो ड्राई वैलीज की मिट्टी में मिले कई प्रकार के प्लास्टिक, पर्यावरण सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता।

  • शोध में खुलासा, स्थानीय गतिविधियों और लंबी दूरी के वायुमंडलीय परिवहन से अंटार्कटिका पहुंच रहे नैनोप्लास्टिक कण।

  • वैज्ञानिकों ने बेहतर कचरा प्रबंधन और निगरानी की जरूरत बताई, ताकि भविष्य में प्लास्टिक प्रदूषण को रोका जा सके।

प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल शहरों, नदियों और समुद्रों तक सीमित नहीं रह गया है। दुनिया के सबसे दूर और साफ माने जाने वाले इलाकों में भी इसके छोटे-छोटे कण पहुंच रहे हैं। वैज्ञानिकों ने पहली बार अंटार्कटिका के अंदरूनी हिस्सों की मिट्टी में नैनोप्लास्टिक पाए हैं। यह खोज वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुई है।

नैनोप्लास्टिक प्लास्टिक के बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रोमीटर से भी कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि आसानी से हवा, पानी और मिट्टी के माध्यम से फैल सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये कण पर्यावरण और जीवों के लिए माइक्रोप्लास्टिक से भी ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि ये कोशिकाओं के अंदर तक पहुंच सकते हैं और अन्य जहरीले प्रदूषकों को अपने साथ ले जा सकते हैं।

अंटार्कटिका भी नहीं बच पाया

अंटार्कटिका को लंबे समय से धरती का सबसे साफ और सुरक्षित क्षेत्र माना जाता रहा है। यहां कोई स्थायी आबादी नहीं रहती और औद्योगिक गतिविधियां भी बहुत कम हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों ने वहां के समुद्री पानी, बर्फ, तटों और समुद्री जीवों में प्लास्टिक के निशान पाए हैं।

अब नई खोज से पता चला है कि अंटार्कटिका की जमीन भी प्लास्टिक प्रदूषण से प्रभावित हो चुकी है। इससे यह चिंता बढ़ गई है कि प्लास्टिक के छोटे कण पृथ्वी के लगभग हर हिस्से तक पहुंच चुके हैं।

वैज्ञानिकों ने कैसे की जांच

शोधकर्ताओं ने जनवरी 2023 में अंटार्कटिका की मैकमर्डो ड्राई वैलीज के टेलर और राइट वैली क्षेत्रों से मिट्टी के नमूने लिए। उन्होंने ऊपरी सतह की 13 जगहों से और 20 सेंटीमीटर से अधिक गहराई वाली चार जगहों से मिट्टी एकत्र की।

इन नमूनों की जांच के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई और अत्यधिक संवेदनशील तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसे थर्मल डीसॉर्प्शन-प्रोटॉन ट्रांसफर रिएक्शन-मास स्पेक्ट्रोमेट्री कहा जाता है। इस तकनीक की मदद से बहुत कम मात्रा में मौजूद नैनोप्लास्टिक का भी पता लगाया जा सका।

मिट्टी में मिले कई तरह के प्लास्टिक

जांच में 13 में से लगभग आधे से ज्यादा ऊपरी मिट्टी के नमूनों में नैनोप्लास्टिक पाए गए। कुछ जगहों पर इसकी मात्रा 295 नैनोग्राम प्रति ग्राम मिट्टी तक थी। गहरी मिट्टी में भी कई स्थानों पर नैनोप्लास्टिक मिले, जिससे संकेत मिलता है कि ये कण धीरे-धीरे जमीन के अंदर जा रहे हैं।

वैज्ञानिकों को कई प्रकार के प्लास्टिक मिले, जिनमें पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीइथिलीन, पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट, पॉलीस्टाइरीन और पीवीसी शामिल हैं। इनमें पॉलीप्रोपाइलीन की मात्रा सबसे अधिक थी। टायरों से निकलने वाले छोटे प्लास्टिक कण भी बड़ी मात्रा में पाए गए।

प्रदूषण के पीछे कई कारण

शोधकर्ताओं के अनुसार, अंटार्कटिका में पहुंचे नैनोप्लास्टिक के पीछे स्थानीय और दूर के दोनों स्रोत जिम्मेदार हो सकते हैं। अंटार्कटिका में मौजूद रिसर्च स्टेशन, जैसे मैकमर्डो स्टेशन और स्कॉट बेस, स्थानीय प्रदूषण के स्रोत हो सकते हैं। इन जगहों पर वैज्ञानिक गतिविधियों और मानव उपयोग से प्लास्टिक कण वातावरण में पहुंच सकते हैं।

इसके अलावा हवा के जरिए भी प्लास्टिक के कण हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंच सकते हैं। वैज्ञानिकों के मॉडल से पता चला कि सर्दियों में दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाला वायुमंडलीय परिवहन नैनोप्लास्टिक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पिघलती समुद्री बर्फ भी पुराने जमा प्लास्टिक कणों को फिर से पर्यावरण में छोड़ सकती है।

भविष्य के लिए चेतावनी

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन अंटार्कटिका में प्लास्टिक प्रदूषण की स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। हालांकि नमूनों की संख्या कम थी और कुछ कणों का पता लगाना मुश्किल हो सकता है, फिर भी यह खोज एक बड़ी चेतावनी है।

यह अध्ययन दिखाता है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब किसी एक देश या क्षेत्र की समस्या नहीं है। दुनिया के सबसे दूरस्थ हिस्से भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। वैज्ञानिकों ने बेहतर कचरा प्रबंधन और रिसर्च स्टेशनों पर प्लास्टिक के उपयोग को नियंत्रित करने की जरूरत पर जोर दिया है, ताकि भविष्य में इस समस्या को कम किया जा सके।