भूस्खलन अब सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं रहा, बल्कि इंसानी हस्तक्षेप इसका बड़ा कारण बन चुका है।
अध्ययन में सामने आया है कि जंगलों का तेजी से होते विनाश, अनियंत्रित निर्माण और जमीन के बदलते स्वरुप ने पहाड़ों को अस्थिर बना दिया है, जिससे हर साल 4,500 से अधिक लोगों की जान जा रही है।
खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर देशों में यह खतरा कई गुना बढ़ गया है, जहां आबादी का दबाव और संसाधनों की कमी पहाड़ी इलाकों के तेजी से दोहन को बढ़ावा दे रही है।
अध्ययन चेतावनी देता है कि यदि समय रहते पर्यावरण अनुकूल और वैज्ञानिक आधार पर भूमि उपयोग की योजना नहीं अपनाई गई, तो भूस्खलन आने वाले समय में और भी अधिक जानलेवा साबित हो सकता है।
पहाड़ अब सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं से नहीं, बल्कि इंसानी दखल से भी ढह रहे हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि दुनिया में होने वाले अधिकांश घातक भूस्खलन उन इलाकों में हो रहे हैं, जहां इंसानों ने जमीन के स्वरूप में व्यापक बदलाव किए हैं। मतलब कि भूस्खलन से होने वाली त्रासदी के पीछे महज प्राकृतिक कारण नहीं, बल्कि काफी हद तक इंसान खुद भी जिम्मेवार हैं।
यह अध्ययन ऑस्ट्रिया, तुर्की और जर्मनी के वैज्ञानिकों की टीम ने किया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं।
गौरतलब है कि भूस्खलन सबसे विनाशकारी आपदाओं में से एक है, जो हर साल दुनिया भर में 4,500 से अधिक लोगों की जान ले रहे हैं। साथ ही इनकी वजह से करीब 20 अरब डॉलर का नुकसान होता है।
प्राकृतिक नहीं, मानव कारण ज्यादा जिम्मेदार
स्टडी रिपोर्ट के अनुसार आम धारणा के विपरीत कि भूस्खलन पूरी तरह प्राकृतिक कारणों से होते हैं, अध्ययन में खुलासा हुआ है कि अधिकांश घातक भूस्खलन उन इलाकों में होते हैं जहां इंसानों ने जमीन के प्राकृतिक स्वरूप में बदलाव किया है।
शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि मानव दबाव भूस्खलन की घटनाओं को कैसे प्रभावित करता है।
रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि की गई है कि भूमि उपयोग और आवरण में बदलाव का भूस्खलन से होने वाली मौतों पर असर, भौगोलिक बनावट और बारिश जैसे प्राकृतिक कारणों से कहीं अधिक है, और यह प्रभाव खासतौर पर कमजोर और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में अधिक देखा गया है।
कमजोर देशों में खतरा ज्यादा क्यों?
1975 के बाद से पहाड़ी इलाकों में खतरे के बीच रहने वाली आबादी दोगुनी हो चुकी है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि जंगलों का होता विनाश, कृषि विस्तार और सड़क निर्माण जैसे मानव हस्तक्षेप पहाड़ों की जमीन को कमजोर बना रहे हैं।
अध्ययन दिखाता है कि प्रकृति पर बढ़ता मानव दबाव खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को ज्यादा जोखिम में डाल रहा है।
सवाल यह है कि खतरा कमजोर देशों में ही ज्यादा क्यों हैं। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 46 देशों में पहाड़ी इलाकों का अध्ययन किया, जिन्हें उनकी आय के आधार पर वर्गीकृत किया गया।
करीब 60 साल के भूमि उपयोग और आवरण में आए बदलाव और जनसंख्या के 45 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने इंसानी बदलाव को मापने के लिए एक नया पैमाना तैयार किया, जिसे भूगोल, बारिश और जोखिम से जुड़े अन्य कारकों के साथ जोड़ा।
इस विश्लेषण में बेहद चौंकाने वाली जानकारी सामने आई, जहां अमीर देशों ने अपने पहाड़ी क्षेत्रों में महज 7 फीसदी बदलाव किया, वहीं कमजोर देशों में यह आंकड़ा 50 फीसदी तक पहुंच गया। इन बदलावों में जंगलों का होता विनाश, कृषि विस्तार और बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है।
मानव दबाव बना ‘डिजास्टर मल्टीप्लायर’
शोधकर्ताओं के अनुसार, बढ़ती आबादी और संसाधनों की कमी के कारण कमजोर देशों में पहाड़ी इलाकों का तेजी से दोहन हो रहा है। कृषि और मकान बनाने के लिए जंगल साफ किए जा रहे हैं, साथ ही असुरक्षित इलाकों में बस्तियां बस रही हैं। ये सभी कारक मिलकर भूस्खलन के खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।
उदाहरण के लिए हैती, श्रीलंका और एल सल्वाडोर जैसे देशों में भूमि उपयोग और आवरण में बदलाव के साथ भूस्खलन से होने वाली मौतों में तेज बढ़ोतरी देखी गई। वहीं, स्विट्जरलैंड, जापान और इटली जैसे देशों में भूस्खलन के लिए खतरनाक भौगोलिक परिस्थितियां होने के बावजूद मौतें कम हैं, क्योंकि वहां जमीन के इस्तेमाल पर सख्त नियंत्रण है।
स्पष्ट है कि जो देश अपने पहाड़ी इलाकों में ऐसे बदलाव कम रखते हैं, वहां खतरा अधिक होने के बावजूद मौतें कम होती हैं। अध्ययन साफ तौर पर दर्शाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि उपयोग में जितना कम मानव हस्तक्षेप होगा, भूस्खलन से जान जाने का खतरा उतना ही कम होगा।