ग्रामीण इलाकों में जांच और इलाज की कमी, जबकि शहरों में वायु प्रदूषण बन रहा गंभीर स्वास्थ्य चुनौती। फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

बीमारियों का खतरा सब पर बराबर नहीं, गरीब और कमजोर तबकों पर ज्यादा मार: रिपोर्ट

डब्ल्यूएचओ की नई रिपोर्ट में खुलासा: गरीबी, अशिक्षा और असमान स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण गरीबों, महिलाओं और ग्रामीण आबादी पर गैर-संचारी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है

Dayanidhi

  • डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीबी और अशिक्षा के कारण गरीब तबकों में उच्च रक्तचाप और मधुमेह का ज्यादा खतरा।

  • ग्रामीण इलाकों में जांच और इलाज की कमी, जबकि शहरों में वायु प्रदूषण बन रहा गंभीर स्वास्थ्य चुनौती।

  • पुरुषों में तंबाकू और शराब का सेवन अधिक, महिलाओं में मोटापा और शारीरिक गतिविधियों की कमी बड़ी चिंता।

  • दिव्यांगों और प्रवासियों को इलाज में आर्थिक, भाषाई और प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

  • डब्ल्यूएचओ ने असमानताएं दूर करने के लिए बेहतर आंकड़ों, सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं और प्रभावी रोकथाम कार्यक्रमों पर दिया जोर।

दुनिया में बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन हर किसी को इलाज और अच्छी सेहत का बराबर मौका नहीं मिलता। किसी के पास महंगे अस्पतालों तक पहुंच है, तो कोई छोटी-सी जांच के लिए भी परेशान होता है। कहीं जागरूकता की कमी बीमारी को बढ़ाती है, तो कहीं गरीबी और दूरी इलाज के रास्ते में दीवार बन जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की आज जारी नई रिपोर्ट ने सेहत की इसी असमान तस्वीर को सामने रखा है। ‘द स्टेट ऑफ इनइक्वैलिटी: नॉनकम्युनिकेबल डिजीजेज एंड देयर रिस्क फैक्टर्स’ नाम की यह रिपोर्ट बताती है कि गैर-संचारी बीमारियों का खतरा समाज के सभी वर्गों पर एक जैसा नहीं पड़ता।

चार बड़ी बीमारियां, करोड़ों लोगों की चिंता

रिपोर्ट में चार प्रमुख गैर-संचारी बीमारियों पर ध्यान दिया गया है। इनमें कैंसर, दिल और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियां, लंबे समय तक रहने वाली सांस की बीमारियां और मधुमेह यानी डायबिटीज शामिल हैं। इनके साथ तंबाकू और शराब का सेवन, मोटापा, अस्वास्थ्यकर खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और वायु प्रदूषण जैसे जोखिमों का भी अध्ययन किया गया है।

डब्ल्यूएचओ ने पिछले दस वर्षों में अलग-अलग देशों से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर यह समझने की कोशिश की है कि उम्र, लिंग, आमदनी, शिक्षा, रोजगार, दिव्यांगता और ग्रामीण या शहरी क्षेत्र में रहने से बीमारी का खतरा और इलाज की उपलब्धता किस तरह प्रभावित होती है।

कम पढ़ाई और कम आमदनी, सेहत पर भारी

रिपोर्ट के मुताबिक, कम शिक्षा पाने वाले लोगों में उच्च रक्तचाप और मधुमेह की दर अधिक देखी जाती है। इसकी एक वजह स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और समय पर जांच की सुविधाओं तक सीमित पहुंच हो सकती है। गरीब और कम पढ़ी-लिखी महिलाओं के लिए गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की जांच कराना भी अधिक मुश्किल हो सकता है।

तंबाकू के मामले में भी शिक्षा का फर्क दिखाई देता है। कम पढ़े-लिखे पुरुषों में तंबाकू का इस्तेमाल अधिक पाया गया है। यानी सेहत का रिश्ता केवल अस्पताल और दवाओं से नहीं, बल्कि शिक्षा, आर्थिक स्थिति और जीवनशैली से भी गहराई से जुड़ा है।

गांवों में दूरी, शहरों में प्रदूषण की मार

गांव में रहने वाले लोगों के सामने स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की चुनौती बड़ी हो सकती है। कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों में ग्रामीण आबादी को उच्च रक्तचाप की जांच और इलाज तथा गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए शहरी आबादी के मुकाबले कम सुविधाएं मिलती हैं।

वहीं, प्रदूषण की समस्या गांव और शहर में अलग-अलग रूप लेती है। ग्रामीण परिवारों को घर के भीतर इस्तेमाल होने वाले प्रदूषणकारी ईंधन से नुकसान हो सकता है, जबकि शहरों में बाहर की दूषित हवा लोगों के स्वास्थ्य पर भारी पड़ती है। इस तरह रहने की जगह भी बीमारी के खतरे को बढ़ा या घटा सकती है।

पुरुषों और महिलाओं की चुनौतियां अलग

रिपोर्ट में महिला और पुरुषों के बीच भी कई अंतर सामने आए हैं। पुरुषों में तंबाकू और शराब के सेवन की संभावना अधिक होती है। उच्च रक्तचाप होने पर उनके बीमारी का पता चलने और इलाज मिलने की संभावना भी कम हो सकती है।

दूसरी ओर, महिलाओं में पर्याप्त शारीरिक गतिविधि की कमी और मोटापे की समस्या अधिक देखी जाती है, खासकर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में। उम्र का असर भी साफ है। कम उम्र के वयस्कों में उच्च रक्तचाप की पहचान और इलाज की संभावना बुजुर्गों के मुकाबले कम होती है। वहीं, 40 से 70 वर्ष की उम्र के लोगों में मोटापा अधिक आम पाया जाता है।

दिव्यांगों और प्रवासियों की मुश्किलें भी कम नहीं

बेरोजगारी, दिव्यांगता और प्रवास की स्थिति भी स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। बेरोजगार लोगों में शारीरिक गतिविधि की कमी अधिक देखी जाती है। दिव्यांग लोगों को जांच, रोकथाम और इलाज तक पहुंचने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी जगह जाकर रहने वाले लोगों के लिए भाषा, पैसे, कागजी कार्रवाई और स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था की जानकारी की कमी इलाज को मुश्किल बना सकती है।

आंकड़ों से बनेगी बेहतर स्वास्थ्य नीति

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि केवल बीमारी के कुल मामलों की गिनती करना काफी नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि किन लोगों तक जांच, दवाएं और इलाज नहीं पहुंच रहे हैं। संगठन की सहयोगी रिपोर्ट देशों को सलाह देती है कि वे प्रभावी रोकथाम कार्यक्रम लागू करें और उन समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाएं, जो अब तक पीछे छूट गए हैं।

इसके लिए गांवों और शहरों की जरूरतों के मुताबिक सुविधाएं बढ़ाना, आर्थिक और भौगोलिक बाधाएं दूर करना तथा नियमित रूप से असमानताओं से जुड़े आंकड़े जुटाना जरूरी है।

साफ है कि बीमारी से लड़ाई तभी मजबूत होगी, जब इलाज की दौड़ में गरीब, ग्रामीण, दिव्यांग और दूसरे वंचित तबके पीछे नहीं रहेंगे। अच्छी सेहत केवल सुविधा संपन्न लोगों का अधिकार नहीं, बल्कि हर इंसान का हक है।