अब दुनिया के 31 देश ट्रेकोमा से उबर चुके हैं; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

नामुमकिन को किया मुमकिन: कैसे 'ट्रैकोमा मुक्त' बना ट्यूनीशिया?

साफ पानी, स्वच्छता और लगातार प्रयासों ने ट्यूनीशिया को उस बीमारी से मुक्त कर दिया, जिसने कभी उसकी आधी आबादी को जकड़ रखा था।

Lalit Maurya

  • ट्यूनीशिया ने एक ऐसी बीमारी पर जीत हासिल की है, जो कभी उसकी आधी आबादी को प्रभावित कर रही थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने देश को ट्रेकोमा मुक्त घोषित कर दिया है। यह उपलब्धि खास इसलिए है क्योंकि ट्रेकोमा, ट्यूनीशिया में खत्म होने वाली पहली उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी है।

  • ट्रेकोमा आंखों की एक संक्रामक बीमारी है, जो 'क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस' बैक्टीरिया से फैलती है। बार-बार संक्रमण होने पर यह आंखों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है और अंधेपन का कारण बनती है। दुनिया में आज भी करीब 9.7 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां इसका खतरा बना हुआ है।

  • ट्यूनीशिया की सफलता दवाओं से आगे की कहानी है। देश ने दशकों तक साफ पानी, स्वच्छता, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और जागरूकता पर निवेश किया। स्कूलों, गांवों और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच बनाकर ट्रेकोमा के खिलाफ लगातार अभियान चलाया गया।

  • यह जीत दिखाती है कि जब सरकार की नीतियां सबसे कमजोर लोगों तक पहुंचती हैं, तब बदलाव संभव होता है।

  • ट्यूनीशिया की कहानी दुनिया के लिए संदेश है कि विज्ञान, सामाजिक भागीदारी और मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था मिलकर उन बीमारियों को भी खत्म कर सकती हैं, जो कभी असंभव लगती थीं।

किसी देश की असली तरक्की तब दिखती है, जब उस देश में रहने वाले सबसे कमजोर तबके की भी पीड़ा दूर हो सके।

उत्तरी अफ्रीका के छोटे से देश ट्यूनीशिया ने इसे सच कर दिखाया है। एक समय इस देश के गरीब और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले हजारों लोग ट्रेकोमा जैसी आंखों की बीमारी से जूझ रहे थे। यह एक ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे आंखों की रोशनी छीन लेती थी।

साफ पानी, स्वच्छता और इलाज की कमी ने इस बीमारी को पीढ़ियों तक बनाए रखा। लेकिन दशकों की सरकारी प्रतिबद्धता, स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत और समुदायों की भागीदारी ने हालात बदल दिए।

इसके साथ ही अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने ट्यूनीशिया को ट्रेकोमा मुक्त घोषित कर दिया है। बता दें कि यह पहली उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी है, जिसपर ट्यूनीशिया ने जीत हासिल की है।

यह बीमारी आंखों को संक्रमित करती है और इलाज न होने पर स्थाई तौर पर आंखों की रोशनी जा सकती है। सच कहें तो यह सिर्फ एक बीमारी पर जीत नहीं, बल्कि इस बात की मिसाल है कि जब नीतियां समाज के सबसे कमजोर तबके तक पहुंचती हैं, तभी विकास का असली अर्थ सामने आता है।

क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस नामक बैक्टीरिया से फैलती है यह बीमारी

गौरतलब है कि ट्रेकोमा बैक्टीरिया से फैलने वाली एक संक्रामक बीमारी है, जो आंखों को प्रभावित करती है। इसके लिए 'क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस' नामक बैक्टीरिया जिम्मेदार होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह बीमारी संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने, दूषित सतहों को छूने या आंख और नाक के स्राव से दूषित मक्खियों के जरिए भी फैल सकती है।

बार-बार संक्रमण होने पर यह बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। इसमें पलकें अंदर की ओर मुड़ने लगती हैं, जिससे पलकों की रगड़ से आंख की सतह पर लगातार चोट पहुंचती है। समय के साथ यह स्थिति दृष्टि को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती है और इलाज न मिलने पर धीरे-धीरे आंखों को रोशनी जाने का खतरा बढ़ जाता है।

वैश्विक स्तर पर यह समस्या कितनी गंभीर है इसी बात से समझा जा सकता है कि नवंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में करीब 9.7 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रह रहे हैं जहां ट्रेकोमा का खतरा बना हुआ है।

कभी ट्यूनीशिया की आधी आबादी थी इस बीमारी से प्रभावित

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ट्रैकोमा जो अब ट्यूनीशिया के इतिहास के पन्नों में दफन हो चुकी है, कभी वो इस देश की आधी आबादी के लिए अभिशाप थी। 20वीं सदी की शुरुआत और मध्य वर्षों में यह देश की कम से कम आधी आबादी इस समस्या से जूझ रही थी। खासकर दक्षिणी इलाकों में इसका असर कहीं ज्यादा गंभीर था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर टेड्रोस एडनोम घेब्रेयसस ने ट्यूनीशिया को बधाई देते हुए प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “यह ऐतिहासिक उपलब्धि बताती है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और सामूहिक प्रयास से दुनिया में अंधेपन के सबसे बड़े संक्रामक कारण को भी खत्म किया जा सकता है।"

पानी, सफाई और जागरूकता बनी सबसे बड़ी ताकत

ट्रेकोमा का सीधा संबंध साफ पानी, स्वच्छता और व्यक्तिगत सफाई से है। जिन इलाकों में पानी और स्वच्छता की कमी होती है, वहां यह बीमारी तेजी से फैलती है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर समुदायों पर पड़ता है।

इस बीमारी को खत्म करने के लिए ट्यूनीशिया ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की 'सेफ' रणनीति अपनाई। इसमें गंभीर मरीजों की सर्जरी, संक्रमण खत्म करने के लिए एंटीबायोटिक, चेहरे की सफाई और पर्यावरण में सुधार (साफ पानी और स्वच्छता) शामिल थे। इसके साथ देशभर में जांच अभियान चलाए गए, स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आंखों की देखभाल को जोड़ा गया और लोगों को साफ-सफाई के प्रति जागरूक किया गया।

दूर हुआ दशकों से फैला अंधेरा

ट्यूनीशिया ने बीमारी के खत्म होने के बाद भी निगरानी व्यवस्था बनाए रखी है। स्वास्थ्य विभाग ने ऐसी प्रणाली तैयार की है जिससे अगर बीमारी दोबारा लौटे तो शुरुआती स्तर पर ही पहचान कर इलाज किया जा सके।

देश के स्वास्थ्य मंत्री मुस्तफा फरजानी का कहना है, "यह उपलब्धि कई पीढ़ियों के स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय समुदायों की मेहनत का नतीजा है।" उन्होंने कहा कि देश अब भी इस सफलता को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

इसके साथ ही ट्यूनीशिया अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जो उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों को खत्म करने की दिशा में कामयाब हुए हैं। यह उपलब्धि बताती है कि बीमारी से लड़ाई सिर्फ दवाओं से नहीं, बल्कि साफ पानी, स्वच्छता, शिक्षा और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जीती जाती है।

दुनिया में भारत, ट्यूनीशिया सहित अल्जीरिया, ऑस्ट्रेलिया, बेनिन, बुरुंडी, कंबोडिया, चीन, मिस्र, फिजी, गाम्बिया, घाना, इराक, ईरान, लाओस, लीबिया, मलावी, माली, मॉरिटानिया, मैक्सिको, मोरक्को, म्यांमार, नेपाल, ओमान, पाकिस्तान, पापुआ न्यू गिनी, सऊदी अरब, सेनेगल, टोगो, वानुअतु और वियतनाम इस बीमारी से उबर चुके हैं।

ट्यूनीशिया की यह जीत दुनिया के लिए संदेश है कि विज्ञान, सही नीतियों और आम लोगों के सहयोग से किसी भी महामारी को जड़ से मिटाया जा सकता है।