इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई 
स्वास्थ्य

बच्चों के हाथ में पैकेट, अंदर कितना नमक-चीनी? फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई से पूछे तीखे सवाल

क्या आप जानते हैं कि आपके बच्चे रोजाना जिस पैकेटबंद खाने या कोल्डड्रिंक के दीवाने हैं, वह उनकी सेहत के लिए कितना खतरनाक साबित हो रहा है?

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में नमक, चीनी और वसा की अधिक मात्रा को उपभोक्ताओं के लिए आसानी से समझने योग्य बनाने वाली फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग व्यवस्था में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़े सवाल उठाए हैं।

  • 10 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई में अदालत ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) से पूछा कि प्रस्तावित चेतावनी लेबल को अंतिम रूप देने और अनिवार्य करने में इतनी देरी क्यों हो रही है।

  • अदालत ने यह भी जानना चाहा कि व्यवस्था लागू होने के बाद इसे पहले दिन से अनिवार्य क्यों न किया जाए और यदि चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना है तो इसकी निश्चित समयसीमा क्या होगी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई की दो-चरणीय व्यवस्था के वैज्ञानिक और नीतिगत आधार पर भी सवाल किए। पहले चरण में दो या अधिक चिंता वाले पोषक तत्वों की अधिक मात्रा वाले खाद्य पदार्थों और कुछ मीठे पेय को शामिल करने के आधार पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

  • अदालत ने यह भी पूछा कि इन पेय पदार्थों की पहचान और सीमा कैसे तय होगी।

  • इसके साथ ही कोर्ट ने बच्चों में पोषण साक्षरता बढ़ाने पर जोर देते हुए केंद्र से स्कूलों में पाठ्यक्रम, कार्यशालाओं और अन्य पहलों के जरिए फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग और पोषण संबंधी जानकारी समझाने की योजना बताने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी गंभीर मुद्दे पर देश की खाद्य नियामक संस्था भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई से तीखे सवाल पूछे हैं। कोर्ट ने साफ किया है कि बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

10 सितंबर 2026 को इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने एफएसएसएआई को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि पैकेटबंद खाने की चीजों पर ज्यादा चीनी, नमक और फैट की जानकारी देने वाले फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल (एफओपीएल) को अनिवार्य करने में इतनी देरी क्यों हो रही है?

गौरतलब है कि बाजार में मिलने वाले पैकेट बंद खाद्य पदार्थों में कितना नमक, चीनी और वसा है, यह जानना उपभोक्ताओं का हक है और इसे समझना आसान होना चाहिए। खासकर बच्चों के लिए, जिनकी खाने की आदतें कम उम्र में ही बनती हैं।

अदालत के कड़े सवाल, जो हर माता-पिता के मन में हैं

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई से याचिकाकर्ता के उस सुझाव पर जवाब मांगा, जिसमें कहा गया है कि अंतिम फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल व्यवस्था लागू होते ही इसे अनिवार्य किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यह चेतावनी या लेबलिंग नियम पहले दिन से ही पूरी तरह अनिवार्य क्यों नहीं होना चाहिए? अगर नहीं, तो इसे लागू करने की ठोस समयसीमा क्या होगी?

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि बच्चों में कम उम्र से ही खान-पान की खराब आदतें विकसित होने का खतरा काफी बढ़ रहा है। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और एफएसएसएआई से प्रस्तावित एफओपीएल व्यवस्था को लेकर कई सवालों पर स्पष्ट जवाब मांगा है।

दो चरणों में क्यों लागू होगी व्यवस्था?

सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई की उस योजना पर भी सवाल उठाया जिसके तहत पहले चरण में सिर्फ 'दो या दो से अधिक' चिंता पैदा करने वाले तत्व अधिक मात्रा में मौजूद हैं। इस चरण में कुछ विशेष मीठे पेय पदार्थों को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। अदालत ने पूछा है कि पहले चरण में ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल करने का आधार क्या रखा गया है।

वहीं, दूसरे चरण में ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल करने की बात कही गई है, जिनमें इनमें से किसी एक चिंता पैदा करने वाले तत्व की मात्रा अधिक है। ऐसे में अदालत ने इन दोनों चरणों के पीछे के वैज्ञानिक और नीतिगत आधार बताने के साथ-साथ इनके क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट और निश्चित समयसीमा बताने को कहा है।

किन मीठे पेय पदार्थों पर लगेगा लेबल?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि पहले चरण में शामिल किए जाने वाले विशेष मीठे पेय पदार्थों की पहचान एफएसएसएआई किस आधार पर करेगा। साथ ही, अदालत ने इन पेय पदार्थों में चिंता वाले तत्वों की निर्धारित सीमा के बारे में भी जानकारी मांगी है।

सिर्फ लेबल नहीं, उसे बच्चों को समझना भी जरूरी

अदालत ने पोषण संबंधी जानकारी को सिर्फ पैकेट पर छापने तक सीमित रखने के बजाय लोगों, खासकर बच्चों में पोषण साक्षरता बढ़ाने पर भी जोर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह जानकारी देने को कहा कि स्कूल स्तर पर पोषण संबंधी जागरूकता कैसे बढ़ाई जाएगी। इसके लिए पाठ्यक्रम, विभिन्न पहल और कार्यशालाओं के माध्यम से पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर दी गई जानकारी, जिसमें पोषण संबंधी जानकारी और फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग शामिल है, इसको समझने का तरीका बच्चों को कैसे सिखाया जाएगा। कोर्ट ने पोषण साक्षरता से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी सरकार से जानकारी मांगी है।

दरअसल, किसी पैकेट पर लिखी जानकारी तभी उपयोगी है, जब उसे पढ़ने वाला यह समझ सके कि उसमें मौजूद नमक, चीनी या वसा उसके स्वास्थ्य के लिए क्या मायने रखते हैं। बच्चों के मामले में यह समझ और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि छोटी उम्र में बनी खान-पान की आदतें आगे चलकर उनके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।

अब इस मामले में अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को होगी।

गौरतलब है कि सीएसई भी लम्बे समय से जंक फ़ूड को लेकर लोगों को आगाह करता रहा है। डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत को अपने उपभोक्ताओं को किसी विशेष खाद्य पदार्थ में नमक, चीनी या वसा की उच्च मात्रा के बारे में सचेत करने की आवश्यकता है।

यह उपभोक्ता कई राज्यों और क्षेत्रों से आते हैं और कई लोग लेबलिंग की धांधली को पढ़ या समझ नहीं पाते। एकल पोषक तत्व और प्रतीक-आधारित चेतावनी लेबल शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अन्यथा अनियंत्रित आहार परिवर्तन को धीमा करने में मददगार और शायद काफी हद तक कारगर साबित हो सकते हैं।

यही वजह है कि भारत को निश्चित रूप से ऐसी लेबलिंग प्रणाली की आवश्यकता नहीं है जो अति-प्रसंस्कृत “खराब” खाद्य पदार्थों को “सितारों” के साथ महिमामंडित करती हो। सितारों तक पहुंचने के लिए "सकारात्मक पोषक तत्वों" को भ्रामक रूप से शामिल करने से ऐसी प्रणाली फायदे से अधिक नुकसान ही करेगी।