प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

कैसे घर के साबुन-वाइप्स से फैल रहा एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स का खतरा, वैज्ञानिकों ने किया खुलासा

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि घरों में इस्तेमाल होने वाले एंटीबैक्टीरियल साबुन और वाइप्स एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स का खतरा बढ़ा सकते हैं, जबकि रोजमर्रा की सफाई के लिए साधारण साबुन ही पर्याप्त होता है

Lalit Maurya

  • घर को साफ और सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे एंटीबैक्टीरियल साबुन, वाइप्स और डिसइन्फेक्टेंट अब एक नए वैश्विक स्वास्थ्य खतरे को जन्म दे रहे हैं।

  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अनजाने में ‘जर्म-किलिंग’ उत्पादों में मौजूद रसायन बैक्टीरिया को खत्म करने के बजाय उन्हें और मजबूत बना रहे हैं, जिससे वे एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी होते जा रहे हैं।

  • यह समस्या धीरे-धीरे ‘सुपरबग’ के रूप में सामने आ रही है, जिन पर दवाएं असर नहीं करतीं। चिंताजनक बात यह है कि आम लोगों के लिए इन एंटीबैक्टीरियल उत्पादों से अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है, जबकि इनके रसायन पानी और पर्यावरण में पहुंचकर एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स को और बढ़ा रहे हैं।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि रोजमर्रा की सफाई के लिए साधारण साबुन और पानी ही पर्याप्त है, और अनावश्यक एंटीबैक्टीरियल उत्पादों का कम से कम इस्तेमाल भविष्य में एक बड़े स्वास्थ्य संकट को टाल सकता है।

हम अपने घरों को सुरक्षित रखने के लिए जिन एंटीबैक्टीरियल साबुन, वाइप्स और स्प्रे का इस्तेमाल कर रहे हैं, वही चुपचाप एक ऐसे खतरे को जन्म दे रहे हैं जो भविष्य में साधारण संक्रमण को भी जानलेवा बना सकता है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ये रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले “जर्म-किलिंग” उत्पाद बैक्टीरिया को और मजबूत बना रहे हैं, जिससे दवाएं बेअसर होती जा रही हैं। जबकि आम लोगों के लिए इनके इस्तेमाल से कोई अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ साबित नहीं हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी संक्रमण (एएमआर) हर साल दुनिया भर में 10 लाख से अधिक लोगों की जान ले रहा है। चिंता की बात है कि अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक यह समस्या कैंसर जितनी घातक बन सकती है।

बता दें कि एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स तब उत्पन्न होता है, जब रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टीरिया, कवक, वायरस, और परजीवी रोगाणुरोधी दवाओं के लगातार संपर्क में आने के कारण अपने शरीर को इन दवाओं के अनुरूप ढाल लेते हैं।

अपने शरीर में आए बदलावों के चलते वो धीरे-धीरे इन दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। नतीजतन, यह दवाएं उन पर असर नहीं करती। जब ऐसा होता है तो मनुष्य के शरीर में लगा संक्रमण जल्द ठीक नहीं होता।

शोधकर्ताओं के मुताबिक अब तक एएमआर को रोकने की कोशिशें अस्पतालों और कृषि में एंटीबायोटिक दवाओं के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर केंद्रित रही हैं, लेकिन अमेरिका, कनाडा, ब्राजील और स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने चेतावनी दी है कि घरों में इस्तेमाल होने वाले एंटीबैक्टीरियल उत्पाद भी इस खतरे को बढ़ा रहे हैं।

‘जर्म-किलिंग’ उत्पाद कैसे बना रहे बैक्टीरिया को मजबूत

वैज्ञानिकों के अनुसार, घरों में इस्तेमाल होने वाले कुछ कीटाणुनाशक केमिकल जैसे क्वाटरनरी अमोनियम कंपाउंड और क्लोरोऑक्सीलिनॉल अनजाने में बैक्टीरिया को इतना मजबूत बना रहे हैं कि वे न सिर्फ इन केमिकल्स, बल्कि जरूरी एंटीबायोटिक दवाओं के असर से भी बचने लगे हैं। यानी जिन दवाओं पर हमारी जिंदगी टिकी है, वे धीरे-धीरे बेअसर होती जा रही हैं।

इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

नालों से पर्यावरण तक पहुंच रहा जहर

वैज्ञानिकों का कहना है कि साबुन और कीटाणुनाशक उत्पादों में मौजूद ये रसायन रोजाना लाखों घरों से नालों के जरिए पानी और पर्यावरण में पहुंचते हैं, जहां वे बैक्टीरिया को बदलने और अधिक खतरनाक बनने का मौका देते हैं। समय के साथ ऐसे बैक्टीरिया ‘सुपरबग’ बन जाते हैं, जिन पर दवाएं असर नहीं करतीं।

ऐसे में जब इनसे स्वास्थ्य को कोई खास फायदा नहीं होता तो इनका कम से कम इस्तेमाल एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स रोकने के लिए जरूरी कदम हो सकता है।

अध्ययन से पता चला है कि क्वाटरनरी अमोनियम कंपाउंड और दूसरे बायोसाइड केमिकल एंटीबैक्टीरियल हैंड सोप, डिसइन्फेक्टेंट वाइप्स और स्प्रे, कपड़े साफ करने वाले सैनिटाइजर, प्लास्टिक, कपड़ों और पर्सनल केयर उत्पादों में मिलाए जाते हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान इनका इस्तेमाल बहुत बढ़ गया था और आज भी यह पहले से ज्यादा बना हुआ है। लैब और वास्तविक जीवन में किए कई अध्ययनों से पता चला है कि आम उपभोक्ता उत्पादों में मौजूद ये रसायन अतिरिक्त सुरक्षा नहीं देते, बल्कि एएमआर और विषाक्तता का खतरा बढ़ा सकते हैं।

कैसे बनते हैं ‘सुपरबग’

वैज्ञानिकों के मुताबिक पर्यावरण में मौजूद इन केमिकल्स की मात्रा बैक्टीरिया को जिंदा रहने और फलने-फूलने में मदद करती है। ये बैक्टीरिया में ऐसे बदलाव भी कर सकते हैं, जिससे वे जरूरी एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ भी प्रतिरोधी बन जाते हैं और एक-दूसरे को प्रतिरोधी जीन भी दे सकते हैं।

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई बड़ी स्वास्थ्य एजेंसियां आम लोगों को एंटीबैक्टीरियल साबुन की जगह साधारण साबुन और पानी से हाथ धोने की सलाह देती हैं।

ऐसे में वैज्ञानिकों ने सरकारों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से अपील की है कि वे घरेलू उत्पादों में अनावश्यक एंटीमाइक्रोबियल (बायोसाइड) रसायनों के उपयोग को सीमित करें। साथ ही इन्हें कम करने के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय किए जाएं और लोगों को जागरूक किया जाए कि रोजमर्रा की सफाई के लिए एंटीबैक्टीरियल उत्पाद जरूरी नहीं हैं।

क्या है समाधान?

उन्होंने सरकारों से यह भी कहा है कि जिन घरेलू उत्पादों में एंटीमाइक्रोबियल रसायनों से होने वाले फायदे के ठोस सबूत नहीं हैं, उनमें इन रसायनों के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए। साथ ही लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएं, ताकि यह गलत धारणा दूर हो सके कि रोजमर्रा की सफाई के लिए एंटीबैक्टीरियल उत्पाद जरूरी होते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एंटीबैक्टीरियल रसायनों का अनावश्यक उपयोग कम किया जाए, तो रासायनिक प्रदूषण घटेगा, लोगों का स्वास्थ्य सुरक्षित रहेगा और खतरनाक ‘सुपरबग’ को फैलने से रोका जा सकेगा।

हमे समझना होगा कि साफ-सफाई जरूरी है, लेकिन हर कीटाणु को खत्म करने की होड़ कहीं हमें ऐसी दुनिया की ओर न ले जाए, जहां दवाएं काम करना बंद कर दें। वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है साधारण साबुन और समझदारी भरी सफाई ही भविष्य में हमें सुपरबग्स के खतरे से बचा सकती है।