लैंसेट में छपे एक अध्ययन से पता चला है कि भारत में धूम्रपान के कारण हर साल 10 लाख लोगों की मौत हो रही है। इतना ही नहीं इस आंकड़े में पिछले तीन दशकों में 58.9 फीसदी का इजाफा हुआ है। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
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कमजोर देशों में धूम्रपान छोड़ना भी मुश्किल, स्वास्थ्य सेवाएं नहीं दे पा रहीं 130 करोड़ लोगों को जरूरी मदद

अध्ययन के मुताबिक तंबाकू की लत से जूझ रहे करोड़ों लोगों को इच्छाशक्ति के साथ-साथ इलाज और सहारे की जरूरत है, लेकिन कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्थाएं उन्हें यह मदद नहीं दे पा रही हैं।

Lalit Maurya

  • दुनिया में करीब 130 करोड़ लोग तंबाकू का सेवन करते हैं और इनमें 80 फीसदी से अधिक निम्न व मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं।

  • विडंबना यह है कि जहां तंबाकू से जुड़ी बीमारियों का बोझ सबसे ज्यादा है, वहीं लोगों को इस लत से बाहर निकलने के लिए जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं सबसे कम मिल रही हैं।

  • एक नए अध्ययन के मुताबिक, करीब 130 करोड़ लोगों के पास धूम्रपान छोड़ने के लिए प्रभावी और सुलभ उपचार की सुविधा नहीं है। महज 13 निम्न आय वाले देशों में ही डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुरूप व्यापक सहायता उपलब्ध है, जिसमें स्वास्थ्यकर्मियों की सलाह, व्यवहार संबंधी परामर्श और मुफ्त या रियायती दवाएं शामिल हैं।

  • भारत में भी करीब 26.7 करोड़ वयस्क तंबाकू का सेवन करते हैं और धूम्रपान से हर साल करीब 10 लाख मौतें होती हैं।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू छोड़ना केवल इच्छाशक्ति का सवाल नहीं है। लोगों को डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, परामर्श और सस्ती दवाओं का सहारा चाहिए। क्विटलाइन, मोबाइल ऐप और सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों के जरिए यह मदद दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाई जा सकती है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति यह तय नहीं करनी चाहिए कि वह तंबाकू की लत से मुक्त हो पाएगा या नहीं।

धूम्रपान की लत छोड़ना सिर्फ इच्छाशक्ति का सवाल नहीं। कई लोगों के लिए यह ऐसी जंग है, जिसमें वे बार-बार कोशिश करते हैं, लेकिन अकेले लड़ते-लड़ते हार जाते हैं। उन्हें डॉक्टर की सलाह, नियमित परामर्श और जरूरत पड़ने पर दवाओं की मदद चाहिए। ले

किन विडम्बना यह है कि दुनिया के करोड़ों धूम्रपान करने वालों के पास यह मदद पहुंच ही नहीं रही। एक नए अध्ययन ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की इसी बड़ी खामी को उजागर किया है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, करीब 130 करोड़ लोगों को धूम्रपान छोड़ने के लिए जरूरी और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। यह तब है जब दुनिया में तंबाकू हर साल 70 लाख से ज्यादा लोगों की जान ले रही है, फिर भी इसे छोड़ने में मदद करने वाली सेवाएं अधिकांश जरूरतमंदों की पहुंच से बाहर हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि दुनिया में तंबाकू का सेवन करने वाले 80 फीसदी से अधिक लोग विकासशील देशों में रह रहे हैं। इन देशों में पहले ही स्वास्थ्य समस्याओं का भारी बोझ है, लेकिन धूम्रपान की लत से बाहर निकलने में लोगों की मदद करने वाली व्यवस्था सबसे कमजोर है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी खुलासा किया है कि जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और आंखों में सपने होने चाहिए, उस उम्र में दुनिया भर के करीब 4 करोड़ किशोर तंबाकू और निकोटिन की गिरफ्त में फंस चुके हैं। संगठन ने चेताया है कि तंबाकू उद्योग अब अगली पीढ़ी को अपना नया बाजार बनाने में जुटा है।

भारत में भी तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं 29 फीसदी वयस्क

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक दुनिया भर में 130 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं। इनमें से 80 फीसदी निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रह रहे हैं।

भारत की बात करें तो अपना देश दुनिया में तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे इंडिया, 2016-17 के मुताबिक देश में 29 फीसदी वयस्क (करीब 26.7 करोड़ लोग) तंबाकू का सेवन करते हैं। इसमें खैनी, गुटखा, सुपारी, जर्दा, बीड़ी, सिगरेट और हुक्का जैसे उत्पाद शामिल हैं।

लैंसेट में छपे एक अध्ययन से पता चला है कि भारत में धूम्रपान के कारण हर साल 10 लाख लोगों की मौत हो रही है। इतना ही नहीं इस आंकड़े में पिछले तीन दशकों में 58.9 फीसदी का इजाफा हुआ है।

सरकारें कहती हैं सुविधा है, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग

अध्ययन के मुताबिक हालांकि कई देशों में सरकारें धूम्रपान छोड़ने के लिए मदद उपलब्ध होने का दावा करती हैं। लेकिन जब शोधकर्ताओं ने वास्तविक व्यवस्था और लोगों तक सुविधाओं की पहुंच को देखा, तो तस्वीर काफी निराशाजनक मिली।

शोधकर्ताओं ने पाया कि महज 13 निम्न आय वाले देशों में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सुझाए मानकों के अनुरूप व्यापक सहायता उपलब्ध है। इसमें डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी से व्यवहार संबंधी परामर्श और जरूरत के अनुसार मुफ्त या सब्सिडी वाली दवाएं शामिल हैं।

देखा जाए तो दुनिया के करोड़ों लोग ऐसी लत से जूझ रहे हैं, जो उनके शरीर और दिमाग दोनों को जकड़ लेती है, लेकिन उससे बाहर निकलने के लिए उन्हें जरूरी पेशेवर मदद तक नहीं मिल पाती। ऐसे में अकेले दम पर धूम्रपान छोड़ने की कोशिश करना बेहद मुश्किल हो जाता है और बार-बार कोशिश के बावजूद दोबारा उसी लत में लौट जाना उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि मदद की कमी का नतीजा बन जाता है।

भारत जैसे देशों में चुनौती सिर्फ इलाज की कमी नहीं

भारत और वियतनाम समेत कई देशों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया कि धूम्रपान छुड़ाने वाली सेवाओं तक पहुंच कई स्थानीय परिस्थितियों से प्रभावित होती है। सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएं, सरकारी नीतियां, स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन की कमी और तंबाकू उद्योग का प्रभाव लोगों तक उपचार पहुंचने में बाधा बन सकते हैं।

इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि हर देश में एक जैसी योजना लागू करने के बजाय वहां की सामाजिक और स्वास्थ्य व्यवस्था के मुताबिक कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए।

यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर कामरान सिद्दीकी के मुताबिक, तंबाकू की लत से जूझ रहे लोगों का इलाज करना स्वास्थ्य सेवाओं की बुनियादी जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि धूम्रपान छुड़ाने वाली सेवाएं अपेक्षाकृत कम लागत में स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाई जा सकती हैं और इससे लोगों के स्वास्थ्य के साथ उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो सकता है।

गांव के स्वास्थ्यकर्मी से लेकर मोबाइल ऐप तक, मदद के कई रास्ते

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ऐसे कई उपाय बताए हैं, जिनसे सीमित संसाधनों वाले देशों में भी ज्यादा लोगों तक मदद पहुंचाई जा सकती है। नेशनल क्विटलाइन और मोबाइल हेल्थ ऐप के जरिए लोगों को दूर से परामर्श दिया जा सकता है।

इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता लोगों को धूम्रपान छोड़ने की प्रक्रिया में मार्गदर्शन दे सकते हैं।

डॉक्टरों द्वारा सामान्य जांच के दौरान ही मरीज से उसके तंबाकू सेवन के बारे में पूछना, उसे धूम्रपान छोड़ने की सलाह देना और फिर सीधे उपचार से जोड़ना भी प्रभावी तरीका हो सकता है। इसे ‘आस्क-एडवाइज-कनेक्ट’ मॉडल कहा जाता है।

इलाज सस्ता हो, ताकि पैसे की वजह से कोई हार न माने

विशेषज्ञों ने निकोटीन पैच, साइटिसिन और वेरेनिक्लीन जैसी प्रमाणित धूम्रपान-रोधी दवाओं को ज्यादा देशों में उपलब्ध कराने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि ये उपचार किफायती हैं, लेकिन कई जगह इनकी कीमत या उपलब्धता लोगों के लिए बड़ी बाधा बन जाती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, सरकारों और बीमा कंपनियों को इन दवाओं के पूरे उपचार-कोर्स का खर्च उठाना चाहिए। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति यह तय नहीं करे कि वह तंबाकू की लत से बाहर निकल पाएगा या नहीं।

न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डोना शेली का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, "धूम्रपान छोड़ने के लिए व्यापक और समान स्वास्थ्य सहायता को सामान्य चिकित्सा सेवा का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है। ऐसा करके दुनिया भर में तंबाकू से होने वाली लाखों मौतों को रोका जा सकता है।"

लत से लड़ रहे इंसान को सिर्फ ‘छोड़ दो’ कहना काफी नहीं

इस अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को केवल उसकी आदत के लिए दोषी ठहराना समाधान नहीं है। कई लोग इस लत को छोड़ना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रास्ता दिखाने वाला डॉक्टर, साथ देने वाला स्वास्थ्यकर्मी या जरूरी दवा नहीं मिलती।

तंबाकू की लत से जूझ रहे व्यक्ति को उपदेश से ज्यादा इलाज, सहारा और एक और मौका चाहिए। ऐसे में यदि स्वास्थ्य व्यवस्थाएं यह मदद उनके दरवाजे तक पहुंचा दें, तो धूम्रपान छोड़ने की कोशिश केवल व्यक्तिगत संघर्ष नहीं रहेगी, यह लाखों जिंदगियां बचाने का वैश्विक अभियान बन सकती है।