एक नए अध्ययन के अनुसार, पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में मौजूद प्रिजरवेटिव्स का अधिक सेवन टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है।
फ्रांस के वैज्ञानिकों ने एक लाख से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला है। अध्ययन में पाया गया कि प्रिजरवेटिव्स के सेवन से डायबिटीज का खतरा 47 से 49 फीसदी तक बढ़ सकता है।
इसी कड़ी में फ्रांस से आई एक नई वैज्ञानिक चेतावनी ने चिंता और बढ़ा दी है। एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि औद्योगिक रूप से तैयार की गई खाने-पीने की चीजों में मिलाए जाने वाले प्रिजरवेटिव्स का ज्यादा सेवन कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है।
डिब्बाबंद, पैकेटबंद और लंबे समय तक टिकने वाले खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले प्रिजरवेटिव्स अब सिर्फ स्वाद और सुरक्षा का मामला नहीं रहे। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने चेतावनी दी है कि ऐसे रसायनों का अधिक सेवन टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को तेजी से बढ़ा सकता है।
यह अध्ययन फ्रांस के प्रतिष्ठित संस्थानों इंसर्म, आइएनआरएई, सोरबोन पेरिस नॉर्ड यूनिवर्सिटी, पेरिस सिटे यूनिवर्सिटी और सीएनएएम से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। अध्ययन के नतीजे जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुए हैं।
एक लाख से ज्यादा लोगों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक लाख से अधिक वयस्कों के खान-पान और स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया है। ये सभी लोग 2009 से 2023 के बीच चले फ्रांसीसी न्यूट्रीनेट-सांते अध्ययन का हिस्सा थे। इन सभी लोगों से वर्षों तक उनके भोजन, जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों और स्वास्थ्य से जुड़ी नियमित जानकारी हासिल की गई।
खास बात यह रही कि उन्होंने जो-जो पैकेटबंद खाद्य उत्पाद खाए, उनके नाम और ब्रांड तक दर्ज किए गए। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इन जानकारियों को खाद्य पदार्थों के बड़े डाटाबेस से मिलाकर यह पता लगाया कि लोग कितनी मात्रा में प्रिजरवेटिव्स खा रहे हैं।
क्या होते हैं प्रिजरवेटिव्स?
प्रिजरवेटिव्स वे रसायन होते हैं जो खाने-पीने की चीजों को लंबे समय तक खराब होने से बचाते हैं। आज दुनिया में बिकने वाले लाखों पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में ये रसायन मिलाए जाते हैं। 2024 में ओपन फूड फैक्ट्स वर्ल्ड डाटाबेस में दर्ज 35 लाख से अधिक खाने-पीने के उत्पादों में से करीब सात लाख से ज्यादा उत्पादों में कम से कम एक प्रिजरवेटिव मौजूद था।
इंसर्म के वैज्ञानिकों ने इन प्रिजरवेटिव्स को दो श्रेणियों में बांटा है। पहली श्रेणी में वे रसायन आते हैं जो बैक्टीरिया और फंगस की वृद्धि को रोकते हैं या खाने के खराब होने की रासायनिक प्रक्रिया को धीमा करते हैं। दूसरी श्रेणी में एंटीऑक्सिडेंट प्रिजरवेटिव्स होते हैं, जो पैकेजिंग में ऑक्सीजन की मात्रा को घटाकर या खत्म करके भोजन को खराब होने से बचाते हैं।
अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों के भोजन में कुल 58 तरह के प्रिजरवेटिव्स पाए गए, इनमें 33 सामान्य प्रिजरवेटिव्स और 27 एंटीऑक्सिडेंट एडिटिव्स शामिल थे। वैज्ञानिकों ने इनमें से 17 ऐसे प्रिजरवेटिव्स को अलग-अलग गहराई से परखा, जिन्हें कम से कम 10 फीसदी प्रतिभागी नियमित रूप से खा रहे थे। इन्हीं रसायनों के सेवन और बीमारी के खतरे के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया।
चौंकाने वाले रहे नतीजे
इस दौरान जिन 17 प्रिजरवेटिव्स का अलग-अलग अध्ययन किया गया, उनमें से 12 रसायनों के अधिक सेवन से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ता पाया गया। इनमें आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले कुछ प्रमुख प्रिजरवेटिव्स जैसे पोटैशियम सोर्बेट, पोटैशियम मेटाबाइसल्फाइट, सोडियम नाइट्राइट, एसिटिक एसिड, सोडियम एसीटेट और कैल्शियम प्रोपियोनेट शामिल थे।
इसके अलावा कुछ एंटीऑक्सिडेंट एडिटिव्स भी जोखिम बढ़ाते पाए गए, जिनमें सोडियम एस्कॉर्बेट, अल्फा-टोकोफेरॉल, सोडियम एरिथॉर्बेट, साइट्रिक एसिड, फॉस्फोरिक एसिड और रोजमेरी एक्सट्रैक्ट शामिल थे।
गौरतलब है कि ये वही रसायन हैं जो आम तौर पर सॉसेज, बेकरी उत्पाद, कोल्ड ड्रिंक्स, सॉस, रेडी-टू-ईट फूड और पैकेटबंद स्नैक्स में मिलते हैं।
करीब 14 वर्षों की निगरानी के दौरान 1,131 लोगों में टाइप-2 डायबिटीज की पहचान हुई। अध्ययन में पाया गया कि जो लोग बेहद अधिक मात्रा में प्रिजरवेटिव्स का सेवन कर रहे थे, उनमें डायबिटीज का खतरा 47 से 49 फीसदी तक अधिक था। इसी तरह एंटीऑक्सिडेंट एडिटिव्स लेने वालों में भी खतरा 40 फीसदी अधिक पाया गया।
इसी कड़ी में फ्रांस से आई एक नई वैज्ञानिक चेतावनी ने चिंता और बढ़ा दी है। एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि औद्योगिक रूप से तैयार की गई खाने-पीने की चीजों में मिलाए जाने वाले प्रिजरवेटिव्स का ज्यादा सेवन कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द बीएमजे में प्रकाशित हुए हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि अब खाद्य उद्योग में एडिटिव्स के इस्तेमाल पर नियमों की दोबारा समीक्षा जरूरी है। इसके साथ ही विशेषज्ञों ने लोगों को ताजा और कम प्रोसेस किया खाना अपनाने की सलाह दी है।
उनका कहना है कि लोग पैकेटबंद और लंबे समय तक टिकने वाले खाद्य पदार्थों से दूरी रखें। साथ ही खाने के पैकेटों पर प्रिजरवेटिव्स की मौजूदगी की जांच जरूर करें।
यह अध्ययन एक बार फिर याद दिलाता है कि हमारी थाली में क्या जा रहा है, इसका सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है। स्वाद और सुविधा के चक्कर में अगर हम लंबे समय तक रसायनों से भरा खाना खाते रहे, तो उसकी कीमत हमें गंभीर बीमारियों के रूप में चुकानी पड़ सकती है। ऐसे में ताजा, कम से कम प्रोसेस किया हुआ और प्राकृतिक भोजन अपनाना ही डायबिटीज जैसी बीमारियों से बचाव का सबसे सुरक्षित रास्ता है।