दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में शामिल टीबी के खिलाफ लड़ाई में नई पीढ़ी की वैक्सीन एक बड़ी उम्मीद बनकर उभर रही हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2024 में करीब 1.07 करोड़ लोग टीबी की चपेट में आए और 12.3 लाख लोगों की मौत हुई। इसका सबसे बड़ा बोझ निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर है, जबकि भारत में दुनिया के एक चौथाई से अधिक टीबी मामले सामने आते हैं।
करीब एक सदी पुराने बीसीजी टीके की सीमित और उम्र के साथ कम होती सुरक्षा के बीच किशोरों और वयस्कों के लिए नई वैक्सीन की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन गठबंधन गावी के नए विश्लेषण के मुताबिक, 2029 से उपलब्ध होने वाली नई टीबी वैक्सीन 2030 से 2050 के बीच 73 लाख तक जिंदगियां बचा सकती हैं।
इनके इस्तेमाल से निम्न और मध्यम आय वाले देशों को 13,500 करोड़ डॉलर तक का आर्थिक लाभ मिलने का अनुमान है।
हालांकि, इसके लिए हर साल औसतन 8.6 करोड़ वैक्सीन कोर्स की जरूरत होगी। ऐसे में पर्याप्त उत्पादन, किफायती कीमत और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करना इस उम्मीद को हकीकत में बदलने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक 2024 में दुनिया भर में करीब 1.07 करोड़ लोग तपेदिक यानी टीबी की चपेट में आए थे। इतना ही नहीं इस बीमारी ने उस साल 12.3 लाख जिंदगियां निगल ली थी। वहीं 2023 में, वैश्विक स्तर पर करीब 1.08 करोड़ लोग इस बीमारी की चपेट में आए थे। इनमें से करीब 60 लाख पुरुष, जबकि 36 लाख महिलाएं शामिल थी। इसका सबसे बड़ा बोझ निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ रहा है।
अब भी करोड़ों जिंदगियों पर पड़ रहा है टीबी का बोझ
इतना ही नहीं इस बीमारी ने 13 लाख बच्चों को भी अपना शिकार बनाया था। ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट 2024 के मुताबिक दुनिया के एक चौथाई से अधिक टीबी के मामले भारत में सामने आए थे
इसके बावजूद टीबी के खिलाफ जंग में हमारे पास लंबे समय से एक ही प्रमुख वैक्सीन 'बैसिलस कैलमेट-गुएरिन' यानी बीसीजी है। करीब एक सदी पुराना यह टीका शिशुओं और छोटे बच्चों को टीबी के गंभीर रूपों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इसकी सुरक्षा उम्र बढ़ने के साथ कम हो जाती है। यही वजह है कि किशोरों और वयस्कों को टीबी से बचाने के लिए नई और ज्यादा प्रभावी वैक्सीन की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
73 लाख जिंदगियों की उम्मीद, 2029 से नई शुरुआत
लेकिन अब नई पीढ़ी की टीबी वैक्सीन इस तस्वीर को बदलने की उम्मीद जगा रही है। अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन गठबंधन (गावी) के नए विश्लेषण के मुताबिक, इस टीके के 2029 से उपलब्ध होने की उम्मीद है, जो 2030 से 2050 के बीच 73 लाख जिंदगियां बचा सकती हैं।
साथ ही अच्छी खबर यह है कि इनके इस्तेमाल से निम्न और मध्यम आय वाले देशों को 2050 तक 13,500 करोड़ डॉलर तक का आर्थिक लाभ भी मिल सकता है।
सच कहें तो यह सिर्फ टीबी के खिलाफ एक नई वैक्सीन की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों के लिए उम्मीद है, जहां बीमारी किसी व्यक्ति की सेहत के साथ-साथ उसकी पढ़ाई, नौकरी, आय और पूरे परिवार की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है।
नई वैक्सीन आने से पहले शुरू करनी होगी तैयारी
नई वैक्सीन के आने में अभी कुछ साल बाकी हैं, लेकिन गावी का कहना है कि इंतजार करने का समय नहीं है। संगठन के अनुमान के मुताबिक, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इन वैक्सीन की मांग औसतन हर साल करीब 8.6 करोड़ वैक्सीन कोर्स तक पहुंच सकती है।
शुरुआती वर्षों में मांग इससे भी अधिक हो सकती है, क्योंकि टीबी से सबसे ज्यादा प्रभावित देश अलग-अलग आयु समूहों और उच्च जोखिम वाले इलाकों में सुरक्षा का दायरा बढ़ाना चाहेंगे।
गावी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉक्टर सानिया निश्तर का कहना है, "यह नई टीबी वैक्सीन टीकाकरण के क्षेत्र का अगला “ब्लॉकबस्टर” उपकरण बन सकती हैं। लेकिन इसकी क्षमता तभी पूरी तरह सामने आएगी, जब सबसे ज्यादा टीबी प्रभावित देशों को पर्याप्त, भरोसेमंद और किफायती आपूर्ति मिल सके।"
यही इस नई उम्मीद की सबसे बड़ी चुनौती भी है। अगर वैक्सीन की मांग को लेकर अनिश्चितता बनी रही, तो निर्माता उत्पादन क्षमता बढ़ाने में निवेश करने से पीछे हट सकते हैं।
दूसरी ओर, पर्याप्त वैश्विक और घरेलू वित्तीय संसाधन नहीं मिले तो कई देश वैक्सीन को बड़े पैमाने पर अपने टीकाकरण कार्यक्रमों में शामिल नहीं कर पाएंगे। यानी वैक्सीन का वैज्ञानिक रूप से सफल होना जरूरी है, लेकिन लोगों तक पहुंचना उससे भी जरूरी है।
बीसीजी के बाद किशोरों और वयस्कों के लिए नई ढाल
नई पीढ़ी की टीबी वैक्सीन मुख्य रूप से किशोरों और वयस्कों में संक्रामक फेफड़ों की टीबी को रोकने के लिए विकसित की जा रही हैं। यह उस उम्र समूह के लिए महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है, जहां मौजूदा बीसीजी वैक्सीन की सुरक्षा सीमित हो जाती है।
यदि नई वैक्सीन को समय पर बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराया जाता है और उन्हें अन्य टीबी रोकथाम उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाता है, तो दुनिया इस बीमारी के खिलाफ दशकों से चली आ रही लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ा सकती है।
लेकिन इसके लिए केवल वैक्सीन बनाना पर्याप्त नहीं होगा। गावी ने इसके लिए तीन प्राथमिकताएं तय की हैं, पहला वैक्सीन की पर्याप्त, समय पर, सस्ती, किफायती और पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना। दूसरा नियमित टीकाकरण और लक्षित अभियानों के जरिए इसका व्यापक इस्तेमाल बढ़ाना और तीसरा अलग-अलग देशों की जरूरतों के अनुरूप कई वैक्सीन उम्मीदवारों और निर्माताओं वाला मजबूत बाजार तैयार करना।
करोड़ों खुराक की जरूरत, क्या तैयार है दुनिया?
टीबी के आंकड़े अक्सर लाखों मामलों और मौतों में सिमट जाते हैं। लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक घर होता है, एक ऐसा परिवार जिसकी आमदनी बीमारी के इलाज में चली जाती है, कोई बच्चा जिसकी पढ़ाई रुक जाती है, कोई कामगार जो लंबे इलाज के कारण काम से दूर हो जाता है और कोई मां-बाप जो अपने बच्चे की सेहत को लेकर महीनों चिंता में रहते हैं।
इसीलिए नई टीबी वैक्सीन की संभावित सफलता को सिर्फ 73 लाख बचाई जा सकने वाली जिंदगियों के आंकड़े से नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मतलब उन लाखों परिवारों के लिए बीमारी, आर्थिक बोझ और अनिश्चितता से बचने का अवसर भी है।
भले ही 2029 अभी दूर है, लेकिन टीबी के खिलाफ इस बदलाव की तैयारी आज से शुरू करनी होगी। क्योंकि विज्ञान किसी बीमारी के खिलाफ नई उम्मीद तो पैदा कर सकता है, लेकिन उस उम्मीद को हर जरूरतमंद इंसान तक पहुंचाना सरकारों, निर्माताओं और वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी होगी।
ऐसे में अगर यह तैयारी समय पर हुई, तो 2029 सिर्फ एक नई वैक्सीन के आने का साल नहीं होगा, यह टीबी से जूझती दुनिया के लिए एक नई शुरुआत का साल बन सकता है।