भारत में बच्चों का पोषण संकट अब केवल भूख और कुपोषण तक सीमित नहीं रह गया है। एक नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि देश के शहरी स्लम क्षेत्रों में रहने वाले बच्चे कुपोषण और मोटापे की दोहरी मार झेल रहे हैं।
अध्ययन के अनुसार, पांच से नौ वर्ष की उम्र के बीच यह संकट तेजी से उभरता है। जहां दो साल की उम्र तक लगभग 45 फीसदी बच्चे ठिगनेपन (स्टंटिंग) से प्रभावित पाए गए, वहीं नौ साल की उम्र तक मोटापे और अधिक वजन वाले बच्चों की संख्या तीन गुना बढ़कर 14.6 फीसदी हो गई। दूसरी ओर, हर पांच में से एक बच्चा अब भी कमजोरी और दुबलेपन की समस्या झेल रहा है।
अध्ययन यह भी बताता है कि बच्चों की सेहत उनकी मां के स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ी है। कमजोर और कुपोषित माताओं के बच्चों में आगे चलकर कुपोषण का खतरा अधिक रहता है।
वहीं अन्य अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जलवायु संकट भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। जलवायु-संवेदनशील जिलों में बच्चों के कुपोषित होने की आशंका 25 फीसदी अधिक दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं ने चेताया है कि यदि गर्भावस्था से किशोरावस्था तक पोषण, स्वास्थ्य निगरानी और स्वस्थ खानपान पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत की अगली पीढ़ी कुपोषण और जीवनशैली संबंधी बीमारियों के दोहरे बोझ तले दब सकती है।
भारत में कुपोषण की तस्वीर अब पहले से कहीं अधिक जटिल होती जा रही है। एक ओर लाखों बच्चे पर्याप्त पोषण न मिलने के कारण कमजोर और दुबले रह जाते हैं, वहीं दूसरी ओर छोटी उम्र में ही बढ़ता मोटापा बच्चों की सेहत के लिए नया खतरा बनकर उभर रहा है।
क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, हैदराबाद से जुड़े शोधकर्ताओं के एक साझा अध्ययन ने भारत के शहरी स्लम में रहने वाले बच्चों की इस कड़वी हकीकत को उजागर किया है।
अध्ययन के मुताबिक, भारतीय बच्चों पर कुपोषण और मोटापे की यह 'दोहरी मार' ठीक उस उम्र में हमला करती है जब वे स्कूल जाना शुरू करते हैं, यानी 5 से 9 साल के बीच। अपनी इस स्टडी में शोधकर्ताओं ने जन्म से लेकर नौ वर्ष की आयु तक 251 बच्चों का अध्ययन किया है। इस अध्ययन में पाया गया कि पांच साल की उम्र के बाद बच्चों में कुपोषण का 'दोहरा बोझ' साफ दिखाई देने लगता है।
यानी एक ही समुदाय में कुछ बच्चे कुपोषण और दुबलेपन की समस्या से जूझ रहे हैं, जबकि दूसरे बच्चे बढ़ते वजन और मोटापे का शिकार हो रहे हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट रीजनल हेल्थ-साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन के अनुसार, दो साल की उम्र तक करीब 45 फीसदी बच्चे स्टंटिंग का शिकार थे। यानी उनकी लम्बाई उम्र के हिसाब से पर्याप्त ऊंची नहीं हुई थी। मतलब कि बचपन शुरू होने से पहले ही उनका विकास थम गया। इसी तरह सात साल की उम्र में 26.3 फीसदी बच्चे बेहद कमजोर या दुबले पाए गए, जबकि 5.2 फीसदी बच्चों में मोटापा पैर पसार चुका था।
मां की सेहत से जुड़ा है बच्चे का भविष्य
लेकिन नौ साल की उम्र तक स्थिति और चिंताजनक हो गई। इस उम्र तक 21.6 फीसदी बच्चे अब भी कमजोर थे। वहीं मोटापे और अत्यधिक वजन से जूझने वाले बच्चों का आंकड़ा तीन गुणा बढ़कर 14.6 फीसदी पर पहुंच गया।
इस अध्ययन ने एक बेहद भावुक और जरूरी पहलू की तरफ इशारा किया ओर वो है मां की सेहत। शोधकर्ताओं ने पाया कि जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों में आगे चलकर दुबले रहने की संभावना अधिक रहती है।
वहीं, मां का स्वास्थ्य भी बच्चों के भविष्य को गहराई से प्रभावित करता है। जिन बच्चों की माएं स्वयं कमजोर थीं, उन बच्चों के बड़े होने पर भी कमजोर और बीमार रहने की आशंका सबसे ज्यादा थी। स्पष्ट है कि एक कमजोर मां चाहकर भी अपने बच्चे को एक स्वस्थ कल नहीं दे पाती। यह चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।
अब तक सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं का पूरा ध्यान बच्चे के जन्म के शुरुआती 1,000 दिनों (गर्भावस्था से लेकर 2 साल तक) पर रहता था। लेकिन यह रिसर्च स्पष्ट करती है कि सिर्फ इतना काफी नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों के पोषण को केवल जीवन के शुरुआती 1,000 दिनों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। स्वस्थ बचपन सुनिश्चित करने के लिए गर्भावस्था से लेकर किशोरावस्था तक लगातार पोषण सहायता, वृद्धि की निगरानी और स्वस्थ खानपान को बढ़ावा देना जरूरी है।
नौ साल की उम्र तक तीन गुना बढ़ा मोटापे का खतरा
यह अध्ययन चेतावनी देता है कि भारत अब केवल भूख और कुपोषण से नहीं जूझ रहा, बल्कि मोटापे की बढ़ती चुनौती का भी सामना कर रहा है। यदि समय रहते पर्याप्त कदम न उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां कुपोषण और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के दोहरे संकट में फंस सकती हैं।
अगर देश के भविष्य को स्वस्थ और मजबूत बनाना है, तो शुरुआत गर्भवती महिलाओं और बच्चियों के पोषण से करनी होगी।
साथ ही, तेजी से फैल रहे जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर भी रोक लगानी होगी। विडंबना यह है कि स्लम और कमजोर बस्तियों में जहां कभी भूख और कुपोषण सबसे बड़ी चुनौती थी, वहीं अब सस्ते और अनहेल्दी भोजन के कारण मोटापा भी तेजी से पांव पसार रहा है। यह बच्चों को पोषण देने के बजाय मोटापे की बीमारी दे रहा है।
इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए एक अन्य अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारत के जलवायु संवेदनशील जिलों में बच्चों के कुपोषित होने का खतरा अन्य जिलों की तुलना में 25 फीसदी अधिक है।
जलवायु संकट भी बढ़ा रहा है कुपोषण का खतरा
इन जिलों में महिलाओं के घर पर प्रसव और बच्चों के ठिगने होने की आशंका भी अधिक है। मतलब कि जलवायु संकट का सीधा असर मां और शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। अध्ययन के मुताबिक उच्च जोखिम वाले जिलों में महिलाओं के घर पर प्रसव होने की आशंका 38 फीसदी अधिक है।
इसके अलावा बच्चों के ठिगने होने की आशंका 14 फीसदी अधिक दर्ज की गई। इसी तरह जिन जिलों में जलवायु जोखिम अधिक है वहां बच्चों में ऊंचाई के अनुपात में कम वजन होने की आशंका (वेस्टिंग) छह फीसदी अधिक दर्ज की गई।
देखा जाए तो यह महज एक वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य की सेहत का एक चेतावनी भरा आईना है। यह दिखाता है कि हमारे बच्चे एक साथ कुपोषण और मोटापे जैसी दोहरी मार झेल रहे हैं।
यदि आज प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां न सिर्फ बीमारियों के बोझ तले दबेंगी, बल्कि उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता भी प्रभावित होगी। बच्चों को केवल पेट भरने वाला भोजन नहीं, बल्कि ऐसा पोषण चाहिए जो उन्हें स्वस्थ, सक्षम और बेहतर भविष्य की ओर ले जा सके। यही निवेश देश की सबसे बड़ी पूंजी साबित होगा।