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स्वास्थ्य

कैसे डेंगू की प्रतिरक्षा ने कोरोना के नए वेरिएंट्स को दिया आकार, भारतीय वैज्ञानिकों ने खोला राज

भारतीय अध्ययन में सामने आया है कि डेंगू और कोरोना वायरस पूरी तरह अलग वायरस परिवारों से आते हैं। इसके बावजूद, डेंगू के खिलाफ बनी एंटीबॉडी कोरोना वायरस को मानव कोशिकाओं से जुड़ने से रोक सकती है

Lalit Maurya

  • भारतीय वैज्ञानिकों के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि डेंगू वायरस के खिलाफ बनी एंटीबॉडीज कोरोना वायरस को पहचानकर उसे कमजोर करती हैं, जिससे वह नए वेरिएंट्स में बदलने पर मजबूर होता है।

  • यह खोज बताती है कि डेंगू-प्रभावित क्षेत्रों में कोरोना का असर अलग क्यों था और कैसे डेंगू की प्रतिरक्षा ने कोरोना के विकास को प्रभावित किया।

कोरोना महामारी का असर दुनिया के हर हिस्से में एक-सा नहीं था, अब इसके पीछे की एक अहम वजह सामने आई है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि डेंगू वायरस के खिलाफ बनने वाली एंटीबॉडी न सिर्फ कोरोना वायरस (सार्स-कॉव-2) को पहचानती और कमजोर करती हैं, बल्कि उस पर ऐसा दबाव भी बनाती हैं कि वह खुद को बदलने पर मजबूर हो जाता है।

कोलकाता स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी (आईआईसीबी) के वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल और प्रयोगों के जरिए पाया है कि डेंगू-प्रभावित इलाकों में कोरोना वायरस समय के साथ म्यूटेशन करता गया और नए-नए रूप अपनाता गया। इसकी मदद से वह समय के साथ डेंगू-विशेष एंटीबॉडी की पकड़ से बच निकलने के काबिल बनता गया।

अध्ययन में पाया गया कि डेंगू और कोरोना की एंटीबॉडीज एक-दूसरे के साथ क्रॉस-रिएक्ट करती हैं, यानी डेंगू से बनी एंटीबॉडी कोरोना वायरस के कुछ हिस्सों को भी पहचान लेती हैं। दिलचस्प बात यह है कि डेंगू वायरस और सार्स-कॉव-2 पूरी तरह अलग वायरस परिवारों से आते हैं। इसके बावजूद, डेंगू के खिलाफ बनी एंटीबॉडी कोरोना वायरस को मानव कोशिकाओं से जुड़ने से रोक सकती है।

स्पाइक प्रोटीन में छिपा राज

ऐसा कैसे मुमकिन है इस बात को समझने के लिए, भारतीय वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के अलग-अलग वेरिएंट्स के स्पाइक प्रोटीन का अध्ययन किया। गौरतलब है यही स्पाइक प्रोटीन वायरस को मानव कोशिकाओं के रिसेप्टर से जोड़ने में मदद करता है।

यह अध्ययन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी से जुड़े शोधकर्ता अविनाश मल्लिक, रुद्र छजेरा और डॉक्टर सुभाजीत बिस्वास द्वारा किया गया है, जिसके नतीज कम्प्यूटेशनल एंड स्ट्रक्चरल बायोटेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अल्फा (बी.1.1.7), डेल्टा (बी.1.617), डेल्टा-प्लस, ओमिक्रॉन बीए.1 और बीए.2, के स्पाइक प्रोटीन में आए बदलावों का गहराई से अध्ययन किया। संरचनात्मक विश्लेषण और कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए यह देखा गया कि डेंगू-2 वायरस की एंटीबॉडी कोरोना के स्पाइक से कैसे जुड़ती हैं।

रिसर्च में सामने आया है कि चीन में सबसे पहले सामने आए कोरोना वायरस के मूल स्ट्रेन के साथ डेंगू एंटीबॉडी का जुड़ाव काफी मजबूत था। हालांकि बाद के वेरिएंट्स में यह जुड़ाव धीरे-धीरे कमजोर होता गया। ओमिक्रॉन और बीए.2 जैसे नए वेरिएंट्स में यह जुड़ाव बहुत कम या लगभग न के बराबर हो गया।

महामारी से पहले की एंटीबॉडी भी कारगर

वैज्ञानिकों ने जब अलग-अलग मानव सीरम सैंपल्स की जांच की, तो पाया कि महामारी से पहले मौजूद डेंगू एंटीबॉडी भी सार्स-कॉव-2 से जुड़ सकती हैं और उसे मानव कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोक सकती हैं।

इतना ही नहीं, डेंगू की ये एंटीबॉडीज कोरोना वायरस को कमजोर करने में भी सक्षम पाई गईं, जिससे लगता है कि ये वायरस को बदलने पर मजबूर कर सकती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यही वजह हो सकती है कि नए ओमिक्रॉन वेरिएंट (2022–23), पुराने कोरोना स्ट्रेन्स की तुलना में डेंगू के साथ करीब 50 फीसदी कम क्रॉस-रिएक्टिव पाए गए।

यानी वायरस ने खुद को इस तरह बदल लिया कि डेंगू की एंटीबॉडी उसे आसानी से न पहचान सकें।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज समझाती है कि क्यों कोरोना महामारी का असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग दिखा। जिन इलाकों में डेंगू आम है, वहां मौजूद एंटीबॉडी ने शायद कोरोना वायरस की प्रकृति और प्रसार को प्रभावित किया।

यह अध्ययन न सिर्फ कोरोना वायरस के विकास को समझने में मदद करता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे एक बीमारी के खिलाफ शरीर की पुरानी प्रतिरक्षा यादें भी नए वायरस के व्यवहार और विकास को आकार दे सकती हैं, जो भविष्य की महामारियों को समझने के लिए बेहद अहम संकेत है।