आज स्थिति यह है कि एक तरफ जहां बच्चों की थाली से हरी सब्जियां, दालें, फल और नट्स गायब हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों का चलन तेजी से बढ़ा है। फोटो: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

कैसे रहेंगे स्वस्थ: भारत सहित दुनिया भर में बच्चों की थाली से गायब हो रहे फल, सब्जियां, मेवें

वैश्विक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारत में छोटे बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन की भारी कमी है, जिससे उनके स्वस्थ विकास पर गंभीर असर पड़ सकता है।

Lalit Maurya

  • दुनिया भर में बच्चों की थाली से फल, सब्जियां, दालें, बीन्स और मेवे जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थ तेजी से गायब हो रहे हैं।

  • प्रतिष्ठित स्वास्थ्य जर्नल बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन ने चेतावनी दी है कि यह प्रवृत्ति आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। 185 देशों में किए गए 1,248 से अधिक आहार सर्वेक्षणों के विश्लेषण से पता चला है कि दुनिया भर के अधिकांश बच्चे विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई मात्रा से काफी कम मात्रा में फल, सब्जियां, दालें, बीन्स और मेवे जैसे खाद्य पदार्थ खा रहे हैं।

  • चिंता की बात यह है कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों में भारत (0.54 सर्विंग प्रतिदिन) और पाकिस्तान (0.41 सर्विंग) सबसे निचले देशों में शामिल हैं, जहां फलों और बिना स्टार्च वाली सब्जियों का सेवन बेहद कम है।

  • शोधकर्ताओं के अनुसार, बचपन की खानपान की आदतें जीवनभर स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं, लेकिन आज बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन की जगह जंक फूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ लेते जा रहे हैं।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बच्चों को समय रहते सस्ता, सुलभ और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं कराया गया, तो कमजोर प्रतिरक्षा, मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और मानसिक विकास से जुड़ी समस्याएं भविष्य में और गंभीर रूप ले सकती हैं।

कहते हैं बचपन में जो आदतें थाली में परोसी जाती हैं, वह पूरी जिंदगी सेहत की दशा और दिशा तय करती हैं। लेकिन चिंता की बात है कि आज दुनिया के करोड़ों बच्चों की थाली से पोषण के लिए सबसे जरूरी चीजें जैसे फल, सब्जियां, दालें और मेवे धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं।

इस बारे में किए एक नए वैश्विक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दुनिया भर के बच्चे स्वस्थ विकास के लिए जरूरी फल, सब्जियां, दालें, बीन्स, मेवे और बीज पर्याप्त मात्रा में नहीं खा रहे हैं, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। यह अध्ययन टफ्ट्स यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित स्वास्थ्य जर्नल बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के साथ, सीखने की क्षमता, मानसिक चपलता और भविष्य में होने वाली कई बीमारियों से बचाव के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके बावजूद दुनिया के अधिकांश बच्चे विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई मात्रा से काफी कम मात्रा में फल और सब्जियां खा रहे हैं।

अध्ययन में 1990 से 2018 के बीच 185 देशों में किए गए 1,248 से अधिक आहार सर्वेक्षणों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें जन्म से लेकर 19 वर्ष तक के बच्चों और किशोरों के भोजन में पौधों पर आधारित पांच प्रमुख खाद्य समूहों—फल, बिना स्टार्च वाली सब्जियां, स्टार्च वाली सब्जियां (आलू को छोड़कर), दालें एवं बीन्स, तथा मेवे एवं बीज की खपत का आकलन किया गया।

अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में एक साल से कम उम्र के बच्चे हर दिन औसतन महज 1.19 बार फल, सब्जियां, दालें, बीन्स, मेवे और बीज जैसे पौध-आधारित खाद्य पदार्थ खाते हैं। 15 से 19 साल के किशोरों में यह मात्रा बढ़कर 3.55 सर्विंग प्रतिदिन हो जाती है, लेकिन यह भी विशेषज्ञों द्वारा सुझाई मात्रा से काफी कम है। वहीं वैश्विक स्तर पर सभी उम्र के बच्चे औसतन हर दिन सिर्फ 2.8 सर्विंग पौध-आधारित भोजन ही खा रहे हैं।

भारत-पाकिस्तान में गंभीर है स्थिति

अध्ययन में दुनिया के 25 सबसे अधिक आबादी वाले देशों की भी तुलना की गई। इसमें दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के पौध-आधारित पौष्टिक भोजन के मामले में पाकिस्तान और भारत सबसे निचले पायदान पर पाए गए।

नतीजे दर्शाते हैं कि पाकिस्तान में दो साल से कम उम्र के बच्चे औसतन दिन में महज 0.41 सर्विंग और भारत में 0.54 सर्विंग ही पौधों पर आधारित भोजन ले रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह फलों और बिना स्टार्च वाली सब्जियों का बेहद कम सेवन है। इथियोपिया भी इस सूची में सबसे पीछे रहने वाले देशों में शामिल है।

अध्ययन में उम्र के अनुसार एक सर्विंग का मानक भी तय किया गया है। इसके अनुसार, 6 से 11 महीने के शिशुओं के लिए फल की एक सर्विंग 49 ग्राम, 12 से 24 महीने के बच्चों के लिए 75 ग्राम और 3 से 19 वर्ष के बच्चों व किशोरों के लिए 100 ग्राम मानी गई है।

इसी तरह, बिना स्टार्च वाली सब्जियों की एक सर्विंग 6 से 11 महीने के शिशुओं के लिए 44 ग्राम, 12 से 24 महीने के बच्चों के लिए 50 ग्राम और 3 से 19 वर्ष की आयु में 100 ग्राम निर्धारित की गई है। वहीं, आलू को छोड़कर अन्य स्टार्चयुक्त सब्जियों की एक सर्विंग क्रमशः 42 ग्राम, 47 ग्राम और 160 ग्राम मानी गई है।

उम्र बढ़ने के साथ घट रही पौष्टिक भोजन की मात्रा

अध्ययन की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि अमीर देशों में जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है, फल और सब्जियों का सेवन कम होता जाता है। अमेरिका इसका प्रमुख उदाहरण है। वहां दो वर्ष से कम उम्र के बच्चे हर दिन करीब 2.7 सर्विंग फल और सब्जियां खाते हैं, लेकिन 2 से 19 वर्ष की उम्र में यह घटकर केवल 1.8 सर्विंग रह जाती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े और स्वतंत्र होते हैं, वे विज्ञापनों, फास्ट फ़ूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड स्नैक्स (जैसे चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स) की तरफ आकर्षित हो जाते हैं। माता-पिता शुरुआत में तो बच्चों को अच्छी आदतें सिखाते हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन आदतों को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

दक्षिण एशिया सबसे पीछे, पूर्वी एशिया सबसे आगे

अध्ययन में पाया गया है कि दक्षिण एशिया के बच्चों में करीब हर आयु वर्ग में पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों का सेवन सबसे कम है। वहीं पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में बच्चों द्वारा सबसे अधिक फल और विशेष रूप से बिना स्टार्च वाली सब्जियां खाई जाती हैं।

देशों के आधार पर देखें तो वियतनाम, कांगो और मेक्सिको के बच्चे पौधों पर आधारित सबसे अधिक भोजन ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्पेन, पाकिस्तान और ब्रिटेन इस मामले में सबसे पीछे रहे।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अधिकांश क्षेत्रों में बच्चियां, लड़कों की तुलना में थोड़ा अधिक फल और सब्जियां खाती हैं। शहरों में रहने वाले बच्चों का सेवन ग्रामीण बच्चों से बेहतर पाया गया। वहीं, अधिक शिक्षित परिवारों के बच्चों में पौधों पर आधारित करीब-करीब सभी प्रकार खाद्य पदार्थों का सेवन अधिक देखा गया।

तीन दशक में कुछ सुधार, लेकिन चुनौती अभी भी बड़ी

रिसर्च के नतीजे दर्शाते हैं कि 1990 से 2018 के बीच दुनिया में पौधों पर आधारित भोजन का कुल सेवन बढ़ा है, लेकिन अभी भी यह सुधार पर्याप्त नहीं है।

चिंता की बात है कि इस दौरान केवल दक्षिण एशिया ऐसा क्षेत्र रहा जहां इस अवधि में कोई उल्लेखनीय प्रगति दर्ज नहीं हुई।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता सिडनी यरली के अनुसार, बचपन में विकसित होने वाली खानपान की आदतें जीवनभर स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। इसलिए बच्चों को पौष्टिक भोजन तक आसान और सस्ती पहुंच उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।

बचपन की खानपान की आदतें तय करती हैं भविष्य

वहीं वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर डेरियस मोजाफेरियन का कहना है, यदि बच्चों को सही भोजन नहीं मिलता, तो इसका असर केवल उनके शरीर पर ही नहीं बल्कि दिमाग, ऊर्जा, सीखने की क्षमता, मनोदशा और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) पर भी पड़ता है।

आज स्थिति यह है कि एक तरफ जहां बच्चों की थाली से हरी सब्जियां, दालें, फल और नट्स गायब हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों का चलन तेजी से बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह महज बचपन में सेहत से जुड़ी समस्या नहीं है, क्योंकि बचपन की यह लापरवाही बड़े होने पर कमजोर इम्युनिटी, मोटापा, शुगर और दिल से जुड़ी बीमारियों का कारण बन सकती है।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि दुनिया भर में बच्चों की थाली से फल और सब्जियों का लगातार गायब होना आने वाले समय के लिए गंभीर संकेत है। ऐसे में यदि समय रहते प्रभावी कदम न उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां कमजोर स्वास्थ्य, बढ़ते रोगों और जीवन गुणवत्ता में गिरावट की भारी कीमत चुका सकती हैं।