अस्पताल में सर्जरी के बाद बुजुर्ग रोगी को सांत्वना देती नर्स; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

होम्योपैथी की ही शाखा है इलेक्ट्रो-होम्योपैथी, कानून के दायरे में होगी प्रैक्टिस: केरल हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी की प्रैक्टिस केवल कानूनी पंजीकरण और संबंधित मेडिकल कानूनों के दायरे में ही की जा सकती है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • दो अलग-अलग मामलों में आए ताजा न्यायिक निष्कर्षों ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि अदालतें और न्यायाधिकरण केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों और कानूनी व्यवस्था के आधार पर फैसले दे रहे हैं।

  • केरल हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी कोई स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि होम्योपैथी की ही एक शाखा है।

  • ऐसे में इसकी प्रैक्टिस केवल कानूनी पंजीकरण और संबंधित चिकित्सा कानूनों के दायरे में ही की जा सकती है। अदालत ने चेतावनी दी कि बिना नियमन के चिकित्सा की अनुमति लोगों के जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

  • वहीं, आंध्र प्रदेश में किसान की फसल बर्बादी से जुड़े मामले में एनजीटी के समक्ष पेश संयुक्त समिति की रिपोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि आसपास के झींगा तालाबों को नुकसान का अकेला जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

  • जांच में प्राकृतिक लवणता, जलभराव और खेतों के खराब प्रबंधन जैसे कई अन्य कारण सामने आए। समिति ने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर समाधान सुझाते हुए जल निकासी, मिट्टी सुधार, नियामकीय निगरानी और स्थानीय स्तर पर भूमि उपयोग योजना तैयार करने की सिफारिश की है।

  • दोनों मामले इस बात का संदेश देते हैं कि जनहित से जुड़े विवादों में निष्पक्ष वैज्ञानिक जांच और कानून का पालन ही न्याय का सबसे मजबूत आधार है।

केरल हाई कोर्ट ने मेडिकल प्रैक्टिस और जनहित को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी, स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति नहीं बल्कि होम्योपैथी की ही एक शाखा है।

इसलिए, बिना कानूनी रजिस्ट्रेशन के इसके प्रैक्टिस की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस क्षेत्र में प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों पर त्रावणकोर-कोचीन मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1953 तथा केरल स्टेट मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 2021 के प्रावधान लागू होंगे।

16 जून, 2026 को दिए अपने फैसले में न्यायमूर्ति ए के जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति प्रीता ए के की पीठ ने कहा कि मामले के पहले प्रतिवादी (याचिकाकर्ता) ने जो योग्यता प्राप्त की है, वह यदि मान्यता प्राप्त भी मानी जाए, तब भी वह होम्योपैथी की एक शाखा से संबंधित है। ऐसे में यदि वह इलेक्ट्रो-होम्योपैथी का अभ्यास करता है, तो उसे इन दोनों कानूनों के तहत ही विनियमित किया जाएगा।

यदि कोई डॉक्टर इस पद्धति के तहत पंजीकृत नहीं है, तो राज्य और पुलिस प्रशासन को उसकी अवैध प्रैक्टिस को रोकने का पूरा अधिकार है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि ऐसा नहीं माना गया, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "ऐसा निष्कर्ष इस देश के लोगों के लिए खतरनाक होगा, क्योंकि यहां लोगों की जान दांव पर लगी है।"

हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ यह भी संकेत दिया कि चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बिना उचित कानूनी निगरानी के किसी भी प्रकार की प्रैक्टिस की अनुमति देना आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

आंध्र प्रदेश: झींगा पालन को नहीं ठहराया जा सकता फसल बर्बादी का अकेला जिम्मेदार, संयुक्त समिति रिपोर्ट

संयुक्त समिति का कहना है कि उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि फसलों की बर्बादी केवल आसपास के झींगा तालाबों की वजह से हुई।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष पेश एक संयुक्त समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि आंध्र प्रदेश के डॉ बी आर अंबेडकर कोनसीमा जिले के गुट्टेनादेवी गांव में किसान की फसल बर्बादी के लिए आसपास के झींगा तालाबों को अकेला जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। समिति के अनुसार उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य इस दावे की पूरी तरह पुष्टि नहीं करते।

16 जून, 2026 को एनजीटी में दाखिल इस रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता के पास गांव में 1.9 एकड़ कृषि भूमि है, जहां 2019 से धान की खेती नहीं हुई है। फिलहाल यह जमीन जलभराव, खरपतवार और अत्यधिक लवणीय पानी से प्रभावित है।

जांच में पाया गया कि सिंचाई के स्रोत 'पंतबोधि' का पानी मध्यम स्तर तक खारा है, जबकि खेत में जमा पानी अत्यधिक लवणीय और सोडियम युक्त है। ऐसी स्थिति में सामान्य फसलों की खेती संभव नहीं है। मिट्टी की जांच में भूमि का पीएच सामान्य से थोड़ा क्षारीय पाया गया और उसमें मध्यम स्तर की लवणता दर्ज की गई। हालांकि, किसी भी प्रकार के भारी धातुओं (हेवी मेटल) की मौजूदगी के प्रमाण नहीं मिले हैं।

जमीनी हकीकत: याचिकाकर्ता के खेत का हाल

रिपोर्ट के अनुसार असल में, यह पूरा इलाका गोदावरी डेल्टा क्षेत्र में आता है, जहां समुद्र का खारा पानी प्राकृतिक रूप से अंदर आता रहता है। ऐसे में  समुद्री पानी के प्रवेश और बाढ़ के कारण लवणता का बढ़ना सामान्य बात है। ऐसे में बेहतर आय की उम्मीद में यहां कई किसान खेती छोड़कर झींगा पालन की ओर भी बढ़ रहे हैं।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि झींगा फार्मों की वजह से उनके 55 नारियल के पेड़ बर्बाद हो गए। लेकिन बागवानी विभाग की जांच रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयां करती है।

समिति ने याचिकाकर्ता के खेत में लगे नारियल के पेड़ों की खराब स्थिति का कारण भी झींगा पालन को नहीं माना। बागवानी विभाग की जांच में पाया गया कि पेड़ों की खराब सेहत और कम उत्पादन की मुख्य वजह वर्षों से उचित देखभाल का अभाव, पर्याप्त खाद नहीं डालना और अनियमित सिंचाई है। इसके उलट, ठीक बगल के खेतों में जिन किसानों ने सही प्रबंधन किया है, उनके नारियल के पेड़ों से बेहतरीन उपज मिल रही है।

इन सभी तथ्यों के आधार पर समिति ने निष्कर्ष निकाला कि केवल आसपास के एक्वाकल्चर फार्मों के कारण पूरी फसल नष्ट होने का दावा वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं होता। साथ ही यह भी कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर किसी विशेष झींगा फार्म को नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराना संभव नहीं है।

समस्या के समाधान के लिए समिति की सिफारिशें

रिपोर्ट में स्थिति को सुधारने के लिए कई सुझाव भी दिए गए हैं। इनमें जिला प्रशासन, सिंचाई और कृषि विभाग को 'पंतबोधि' तथा उससे जुड़ी नहरों की सफाई, गाद निकालने और जल निकासी व्यवस्था सुधारने की सलाह दी गई है, ताकि जलभराव और खारे पानी के प्रवेश को रोका जा सके। जहां संभव हो, वहां मीठे पानी की सिंचाई की व्यवस्था विकसित करने की भी सिफारिश की गई है।

कृषि विभाग को याचिकाकर्ता की भूमि के लिए विशेष सुधार योजना तैयार करने का सुझाव दिया गया है। इसमें खेत से खारे पानी की निकासी, जिप्सम और जैविक खाद के जरिए मिट्टी का उपचार तथा लवण सहन करने वाली फसलों की खेती को बढ़ावा देना शामिल है।

समिति ने मत्स्य विभाग और आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एपीपीसीबी) को यह सुनिश्चित करने की भी सिफारिश की है कि आसपास के सभी झींगा तालाब विधिवत पंजीकृत हों और कोस्टल एक्वाकल्चर अथॉरिटी तथा राज्य के नियमों के अनुसार चलाए जाएं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि तालाबों का पानी सिंचाई नहरों या आसपास की कृषि भूमि में न पहुंचे। इसके लिए नियमित संयुक्त निरीक्षण भी किए जाने चाहिए।

समिति ने सुझाव दिया है कि इलाके में कृषि और झींगा पालन दोनों को सुरक्षित रखने के लिए जिला प्रशासन को गुट्टेनादेवी और आसपास के गांवों के लिए एक 'माइक्रो-लेवल लैंड यूज प्लान' तैयार करनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसानों के हितों का टकराव न हो।