कैफे में कोल्ड ड्रिंक का आनन्द लेती बच्ची; फोटो: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

मिठास की घूंट में छिपा खतरा: क्या अनजाने में अपनी सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं हम?

रिसर्च में रोजाना चीनी युक्त मीठे पेय पीने वालों में पेट के कैंसर का जोखिम बहुत कम सेवन करने वालों की तुलना में दोगुने से अधिक पाया गया

Lalit Maurya

  • ठंडी बोतल की एक घूंट गर्मी और थकान में भले ही पलभर की राहत दे, लेकिन रोजाना चीनी युक्त मीठे पेय पीने की आदत सेहत के लिए गंभीर चिंता बढ़ा सकती है।

  • एक नए अध्ययन में पाया गया है कि हर दिन कम से कम एक ऐसा पेय पीने वालों में पेट के कैंसर का जोखिम महीने में एक बार या उससे भी कम सेवन करने वालों की तुलना में 2.45 गुना अधिक था।

  • महिलाओं में यह संबंध और मजबूत दिखा, जहां रोजाना एक से अधिक मीठे पेय लेने वाली महिलाओं में जोखिम करीब तीन गुना अधिक पाया गया।

  • वैज्ञानिकों ने 1.12 लाख से अधिक लोगों के खान-पान, जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का दशकों तक विश्लेषण किया। अध्ययन में फ्रक्टोज के अधिक सेवन को भी पेट के कैंसर के अधिक मामलों से जोड़ा गया।

  • हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह एक ऑब्जर्वेशनल अध्ययन है और इससे यह साबित नहीं होता कि मीठे पेय सीधे कैंसर का कारण बनते हैं। फिर भी निष्कर्ष रोजमर्रा की एक आम आदत पर गंभीर सवाल खड़ा करते हैं, क्या पलभर की मिठास के लिए हम अनजाने में अपनी लंबी सेहत को जोखिम में डाल रहे हैं?

भागदौड़ भरी जिंदगी, दोपहर की थकान, या सिर्फ स्वाद का एक लम्हा, अक्सर हम खुद को तरोताजा रखने के लिए कोल्ड ड्रिंक, पैकेट बंद जूस या स्पोर्ट्स ड्रिंक्स का सहारा लेते हैं। लेकिन क्या हम जानते हैं कि जिस मिठास को हम राहत की घूंट समझते हैं, वही खामोशी से शरीर के अंदर एक गंभीर बीमारी की नींव रख सकती है।

रिसर्च से पता चला है कि इन चीनी युक्त मीठे पेय पदार्थों का रोजाना सेवन सेहत पर भारी पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक हर दिन कम से कम एक चीनी युक्त मीठा पेय पीने वाले लोगों में पेट के कैंसर का जोखिम ऐसे लोगों की तुलना में दोगुने से भी अधिक था, जो महीने में एक बार या उससे भी कम इनका सेवन करते हैं।

यह अध्ययन द कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ कोरिया, बॉस्टन यूनिवर्सिटी, मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, हार्वर्ड टी एच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और मास जनरल ब्रिघम कैंसर इंस्टिट्यूट से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल 'गैस्ट्रो हेप एडवांसेस' में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 1.12 लाख से अधिक लोगों के स्वास्थ्य, खान-पान और जीवनशैली से जुड़े आंकड़ों का दशकों तक अध्ययन किया है। इस दौरान 278 लोगों में पेट का कैंसर विकसित हुआ।

रोजाना एक ड्रिंक से 2.45 गुणा बढ़ा जोखिम

वैज्ञानिकों ने पाया कि जो लोग रोजाना कम से कम एक सर्विंग शुगर-स्वीटेंड ड्रिंक लेते थे, उनमें पेट के कैंसर का जोखिम महीने में एक बार से भी कम ऐसे पेय पीने वालों की तुलना में 2.45 गुणा अधिक था। यह संबंध महिलाओं और पुरुषों, दोनों में देखा गया।

हालांकि महिलाओं में यह जोखिम और अधिक नजर आया। गौरतलब है कि नर्सेज हेल्थ स्टडी में रोजाना एक से ज्यादा ऐसे पेय पीने वाली महिलाओं में पेट के कैंसर का जोखिम बहुत कम सेवन करने वाली महिलाओं की तुलना में तीन गुणा गुना अधिक था। बता दें कि इन पेय पदार्थों में कार्बोनेटेड ड्रिंक, नींबू पानी और स्पोर्ट्स ड्रिंक जैसी चीजें शामिल थीं।

फ्रक्टोज भी चिंता की वजह

अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन पेय पदार्थों में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख मिठास फ्रक्टोज का अधिक सेवन पेट के कैंसर के ज्यादा मामलों से जुड़ा था। हालांकि, शोधकर्ताओं ने अभी यह साबित नहीं किया है कि फ्रक्टोज या मीठे पेय सीधे तौर पर कैंसर का कारण बनते हैं। दूसरी ओर, कम कैलोरी वाले आर्टिफिशियल स्वीटनर से बने पेय पदार्थों और पेट के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं मिला।

बीमारी की जड़ को समझना जरूरी

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इससे पहले चीनी युक्त पेय को कोलोरेक्टल, स्तन और लिवर कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जोड़ा जा चुका है, लेकिन पेट के कैंसर को लेकर प्रमाण सीमित थे।

अध्ययन के वरिष्ठ शोधकर्ता एंड्रयू टी चैन के मुताबिक, यह अमेरिका की आबादी में चीनी युक्त मीठे पेय के सेवन और पेट के कैंसर के बीच संबंध को दिखाने वाला पहला अध्ययन है।

दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों में पेट का कैंसर एक प्रमुख कारण है, लेकिन इस बीमारी में खान-पान की भूमिका के बारे में अभी तक बहुत कम जानकारी है।

हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से भी जांचा गया संबंध

गौरतलब है कि पेट में रहने वाला एक सामान्य बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पाइलोरी दुनिया भर में पेट के होने वाले कैंसर के बड़े कारणों में से एक माना जाता है।

ऐसे में शोधकर्ताओं ने 940 लोगों के एक छोटे समूह में इस संक्रमण की स्थिति की भी जांच की है। इनमें एक तिहाई से कुछ अधिक लोगों में संक्रमण के प्रमाण मिले, लेकिन मीठे पेय पीने और हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से जुड़े संक्रमण के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया।

185 देशों में इसकी खपत को लेकर किए एक अन्य नए अध्ययन से पता चला है कि 1990 के बाद से वयस्कों में इसकी खपत 16 फीसदी बढ़ी है, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक है। नतीजा यह कि मोटापा, डायबिटीज, हृदय सम्बन्धी रोग, कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सबसे ज्यादा असर बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है।

यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मीठे पेय पदार्थों और शराब पर टैक्स बढ़ाने की सिफारिश की है।

नतीजों को समझने में सावधानी जरूरी

हालांकि अध्ययन बड़ा है और इसमें लोगों की खान-पान व जीवनशैली की जानकारी कई दशकों तक जुटाई गई, फिर भी इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं।

यह एक ऑब्जर्वेशनल स्टडी है, इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि मीठे पेय सीधे तौर पर पेट के कैंसर का कारण बनते हैं। संभव है कि इन पेय पदार्थों का अधिक सेवन करने वाले लोगों में कोई अन्य जीवनशैली या स्वास्थ्य संबंधी कारक भी जोखिम बढ़ा रहा हो।

शोध में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से जुड़े संक्रमण और परिवार में पेट के कैंसर के इतिहास की जानकारी भी सीमित थी। फिर भी यह अध्ययन एक अहम सवाल जरूर उठाता है, जो चीज रोजमर्रा की जिंदगी में मामूली लगती है, क्या उसका लगातार सेवन लंबे समय में हमारी सेहत पर बड़ा असर डाल सकता है?

शोधकर्ताओं का कहना है कि इन नतीजों की पुष्टि के लिए आगे और अध्ययन जरूरी हैं और यह समझना भी अहम होगा कि मीठे पेय पेट के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं तो उसके पीछे कौन-सी जैविक प्रक्रियाएं जिम्मेदार हैं।

बता दें कि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) भी लम्बे समय से लोगों की सॉफ्ट ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स और अन्य मीठे पेय पदार्थों के चलते बढ़ते खतरों को लेकर सजग करता रहा है।