आप पिछले 20 वर्षों से पर्यावरण और संरक्षण की सक्रिय आवाज रही हैं। क्या आपको लगता है कि हमारे सामने खड़े इस संकट को पर्याप्त स्वीकार्यता मिली है?
नहीं। मुझे नहीं लगता कि हम इस मुद्दे को उतना महत्व दे रहे हैं, जितना जरूरी है। जब 20 साल पहले मैं इस पहल से जुड़ी थी, तब यह दूर की बात लगती थी। हम दूरदराज के महासागरों में पिघलते ग्लेशियरों की बात कर रहे थे। लेकिन आज वह सच्चाई हमारे घर तक पहुंच चुकी है। आज हम ट्रिपल प्लैनेटरी क्राइसिस का सामना कर रहे हैं, जो मानव प्रजाति समेत कई अन्य प्रजातियों को विलुप्ति के खतरे में डाल रहा है। केवल पिछले 100 वर्षों में हमने जिस स्तर का विनाश किया है, उससे निपटने के लिए हर किसी की भागीदारी, जागरुकता और सहयोग की जरूरत है।
हालांकि समस्याएं बहुत बड़ी और वैश्विक स्तर की हैं, जो अक्सर हमारी पहुंच से बाहर लगती हैं, लेकिन हमें यह समझना होगा कि व्यक्तिगत स्तर पर हममें से हर किसी की एक भूमिका है। इसकी शुरुआत इस बुनियादी समझ से होती है कि हमारे स्वास्थ्य, शांति, प्रगति और अस्तित्व के लिए जो कुछ भी चाहिए, वह सब पृथ्वी से आता है। यही हमारा घर है। अगर हम इस समझ से खुद को काट लेते हैं, तो हम संरक्षण का हिस्सा बनने के बजाय विनाश में योगदान देते रहेंगे। इसलिए अगर आप दिल्ली में रहते हैं, तो प्रदूषण की चिंता करें। वायु प्रदूषण को कम करने के लिए ठोस कदम उठाएं। अपने रोजमर्रा के जीवन में बेहतर विकल्प चुनें, कचरे को अलग-अलग करें, कंपोस्ट बनाएं, घर में पैदा होने वाले हर तरह के कचरे का प्रबंधन करें और फिजूलखर्ची वाली खपत को कम करें। ये ऐसे ठोस कदम हैं जो हमें इस समस्या की विशालता से घबराने के बजाय कुछ कर पाने का एहसास देते हैं।
आज ज्यादातर युवा कहते हैं कि वे पर्यावरणीय संकट के सामने खुद को बेबस महसूस करते हैं। वे इस समस्या से कैसे निपटें?
ईको एंजायटी तब पैदा होती है जब आप संकट की गंभीरता को समझते हैं और यह महसूस करते हैं कि उससे निपटने के लिए बहुत कम किया जा रहा है। यानी सरकारें इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहीं, उद्योग इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहे और संवाद अक्सर पटरी से उतर रहा है। इसीलिए मैं हमेशा सुलभ समाधानों की पहचान करने और अपने आसपास, अपने मोहल्लों में जमीनी स्तर पर काम करने पर जोर देती हूं।
मैं अक्सर डॉ. जेन गुडॉल (अंग्रेज प्राइमेटोलॉजिस्ट और मानवविज्ञानी) की कही बात दोहराती हूं कि आशा एक क्रिया है (होप इज ए वर्ब)। आपको समाधानों को खुद पर लागू करना होता है, उन्हें अमल में लाने के लिए हर दिन काम करना होता है, तभी निराशा कम होती है।
मैं पाती हूं कि जब मैं हर दिन समाधान का हिस्सा होती हूं तो मैं कहीं ज्यादा आशावान और कम दुखी महसूस करती हूं। समाधान का हिस्सा बनिए, चाहे वह समुद्र तट की सफाई में शामिल होना हो, पेड़ों की कटाई के खिलाफ प्रदर्शन करना हो, शहरी जंगल उगाने में मदद करना हो या अपने पड़ोस में कचरा अलग करने और बेहतर प्रबंधन को सुनिश्चित करना हो। जो भी कार्रवाई हो, उसमें शामिल हों।
एक मां के रूप में क्या आप इस बात को लेकर चिंतित रहती हैं कि आपका बच्चा किस तरह का पर्यावरण विरासत में पाएगा? क्या यह चिंता आपको विचलित करती है?
हां, बिल्कुल। आखिर, हम पालक मां हैं। किसी भी चीज से बढ़कर हमारे बच्चों का स्वास्थ्य और भलाई हमारे लिए सर्वोपरी है। मैंने समय से काफी पहले (प्री मैच्योर) बच्चे को जन्म दिया था, जिससे गंभीर जटिलताएं पैदा हुईं। उसकी जान को भी खतरा था और मेरी जान को भी। पर्यावरणीय प्रदूषण की वजह से समय से पहले प्रसव के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। हम जिस प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, जो खाना खाते हैं, जो प्लास्टिक हमारे शरीर में जाता है, उससे हमारे शरीर में गंभीर गड़बड़ियां पैदा होती हैं। उस अनुभव के बाद से मैं हर दिन इस बात को लेकर चिंतित रहती हूं कि मेरा बच्चा कैसी हवा में सांस ले रहा है, क्या खा रहा है और उसके पास खुले में खेलने की आजादी नहीं है। हमारे शहरी इलाकों में पार्क और पैदल चलने की जगहें बहुत कम हैं। एक सामान्य दुनिया में मेरा बच्चा हर दिन पैदल स्कूल जाता। लेकिन ऐसा करना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि उस तरह की आवाजाही के लिए जरूरी ढांचा मौजूद नहीं है। इसलिए मैं हर मां की तरह ही चिंतित रहती हूं।
आपकी प्रॉडक्शन कंपनी वन इंडिया स्टोरीज की मराठी शॉर्ट फिल्म पन्हा ने ऑल लिविंग थिंग्स एनवायरनमेंटल फिल्म फेस्टिवल 2025 में सर्वश्रेष्ठ भारतीय लघु फिल्म का पुरस्कार जीता है। इस फिल्म के पीछे आपका दृष्टिकोण क्या था?
पन्हा हमारी शुरुआती फिल्मों में से एक है। मुझे बेहद गर्व है कि हमने ऐसी कहानी का समर्थन किया। मेरा मानना है कि एनवायरमेंट एक्शन अंतरंग कहानी कहने से जन्म लेगा। हमें जलवायु संकट को मानवीय बनाना होगा और लोगों को यह समझाना होगा कि प्रगति की हमारी परिभाषा को बदलने की जरूरत है। और यह काम एक आठ साल के बच्चे से बेहतर कौन कर सकता है? पन्हा एक ऐसे छोटे लड़के की कहानी है, जो एक बड़े नए प्रोजेक्ट की वजह से अपने पुश्तैनी आम के बगीचे से बेदखल महसूस करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं बुनियादी ढांचे के खिलाफ हूं। लेकिन बुनियादी ढांचा कभी भी पारिस्थितिक संतुलन की कीमत पर नहीं बनना चाहिए। और सबसे जरूरी बात है कि यह बच्चों के जीवन और उनकी आजीविका की कीमत पर तो कभी नहीं होना चाहिए।
सस्टेनेबिलिटी आपकी पहचान का हिस्सा है। यह आपकी जीवनशैली में कैसे झलकती है?
मैं अपने उपभोग और कचरे को लेकर कहीं ज्यादा सजग हो गई हूं। अब मैं पहले की तुलना में बहुत कम बर्बादी करती हूं। सफलता को लेकर धारणा है कि जितना ज्यादा आप बर्बादी करते हैं, उतने ही सफल माने जाते हैं लेकिन इस सोच को बदलना होगा। मैं कचरे को लेकर इतनी सचेत हो गई हूं कि जब हवाई अड्डे पर कोई सिर्फ हाथ पोंछने के लिए अतिरिक्त टिशू निकालता है तो मुझे सचमुच तकलीफ होती है। यह समझने की जरूरत है कि हर संसाधन का एक कार्बन फुटप्रिंट होता है। सब कुछ पृथ्वी से आता है और हमें इसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल करना होगा।