यह दौर सिर्फ तकनीकी उपलब्धियों पर ताली बजाने का नहीं, बल्कि यह समझने का भी है कि कहीं सुविधा और भावनात्मक सहारे के नाम पर इंसानी रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे खत्म तो नहीं हो रही। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

अकेलेपन का इलाज या नया जाल? क्या इंसानी रिश्तों, स्वास्थ्य को खतरे में डाल रही है एआई से बढ़ती नजदीकी

आईआईएम लखनऊ के अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि तन्हाई दूर करने वाले एआई साथी धीरे-धीरे लोगों को भावनात्मक निर्भरता, मानसिक जोखिम और वास्तविक रिश्तों से दूरी की ओर धकेल रहे हैं

Lalit Maurya

  • क्या इंसान अब अपनी तन्हाई, दर्द और भावनात्मक सहारे के लिए मशीनों पर निर्भर होता जा रहा है?

  • इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, लखनऊ के एक नए अध्ययन ने एआई कंपेनियन ऐप्स की चमकदार दुनिया के पीछे छिपे उस डरावने सच को उजागर किया है, जो धीरे-धीरे इंसानी रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।

  • 1.57 लाख से ज्यादा यूजर्स के रिव्यू के विश्लेषण में सामने आया कि लोग भावनात्मक सहारे के लिए इंसानों से ज्यादा “वर्चुअल दोस्तों” पर भरोसा करने लगे हैं। ये ऐप्स लोगों की मानसिक सेहत और सामाजिक ताने-बाने को चुपके-चुपके खोखला कर रहे हैं।

  • अध्ययन में पाया गया कि ये ऐप्स कई लोगों में भावनात्मक निर्भरता, सामाजिक दूरी और मानसिक लत जैसी समस्याएं पैदा कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह रही कि नुकसान महसूस करने वाले यूजर्स भी इन ऐप्स को उच्च रेटिंग देते रहे, जिसे शोधकर्ताओं ने “टेक्नोलॉजी पैराडॉक्स” बताया।

  • शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि एआई कंपेनियन प्लेटफॉर्म्स पर मजबूत सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो आने वाले समय में इंसानी जज्बात, रिश्ते और तन्हाई मशीनों की गिरफ्त में सिमट सकते हैं।

क्या कोई मशीन आपकी तन्हाई का सहारा बन सकती है? क्या एक मोबाइल ऐप रोते दिल को संभाल सकता है? आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपनों से दूर होकर 'एआई कंपैनियन' यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले साथी ऐप्स में अपना सुख-दुख ढूंढ रहे हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या मोबाइल पर मौजूद यह “वर्चुअल दोस्त” अब लोगों की जिंदगी और रिश्तों पर भारी पड़ने लगे हैं?

इसी सवाल का जवाब खोजते हुए भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), लखनऊ के शोधकर्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कंपेनियन ऐप्स यानी स्मार्टफोन पर मौजूद “वर्चुअल साथियों” के बढ़ते इस्तेमाल की पड़ताल कर डिजिटल दुनिया के पीछे छिपे उस अंधेरे और डरावने सच को उजागर किया है, जो इंसानी रिश्तों और मानसिक सेहत को चुपके-चुपके खोखला कर रहा है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक अकेलेपन से राहत देने वाले ये डिजिटल साथी धीरे-धीरे भावनात्मक निर्भरता और मानसिक जोखिमों का कारण बनते जा रहे हैं।

अकेलेपन का सहारा या एक नया जाल?

यह सच है कि आज दुनिया भर में ऐसे एआई ऐप्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनसे लोग बातचीत करते हैं, अपनी भावनाएं या दिल के राज साझा करते हैं और मानसिक सहारा तलाशते हैं। धीरे-धीरे लोग इन्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त मानने लगते हैं। ये ऐप्स इंसानी रिश्तों जैसी भूमिका निभाने लगे हैं। लेकिन इनके पीछे छिपे खतरों पर अब तक बहुत कम शोध हुआ है।

इसी कमी को दूर करने के लिए आईआईएम, लखनऊ के सूचना प्रौद्योगिकी एवं प्रणाली विभाग के प्रोफेसर प्रदीप कुमार और उनकी रिसर्च स्कॉलर चित्रा गौतम ने एक नया अध्ययन किया है।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ कंज्यूमर बिहेवियर में प्रकाशित हुए हैं।

इस सच्चाई को जानने के लिए शोधकर्ताओं ने गूगल प्ले स्टोर पर मौजूद 1.57 लाख से अधिक यूजर्स के रिव्यूज का गहराई से विश्लेषण किया है। इसके लिए उन्होंने आधुनिक एआई आधारित भाषा विश्लेषण और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसी तकनीकों का सहारा लिया है।

अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई कि एआई साथी लोगों के व्यवहार, मानसिक स्थिति और सामाजिक रिश्तों को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं। इस जांच में जो सामने आया, उसने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया।

इस अध्ययन में छह बड़े खतरे सामने आए। इनमें तकनीकी समस्याएं, जैसे ऐप का बार-बार ठीक से काम न करना। सब्सक्रिप्शन और पेवॉल से जुड़ी आर्थिक परेशानियां, जिसमें पैसों के लिए बार-बार दबाव बनाना, एआई का अनुचित, अजीब या परेशान करने वाला व्यवहार, निजता और सुरक्षा संबंधी चिंताएं, वास्तविक रिश्तों पर पड़ने वाला असर, तथा भावनात्मक निर्भरता और लत जैसी मानसिक समस्याएं शामिल हैं।

अध्ययन के मन को झकझोर देने वाले नतीजों पर बात करते हुए प्रोफेसर प्रदीप कुमार ने प्रेस को बताया कि कई यूजर्स इन एआई साथियों पर इस कदर निर्भर हो चुके हैं कि वे भावनात्मक सहारे के लिए इंसानी रिश्तों के बजाय मशीन की ओर रुख कर रहे हैं। इस वजह से वे असल दुनिया के लोगों से कटते जा रहे हैं। कुछ मामलों में इससे सामाजिक दूरी बढ़ी और वास्तविक दुनिया के रिश्ते कमजोर पड़ने लगे।"

एक अजीब विरोधाभास: नुकसान भी और प्यार भी!

अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुछ लोग अपनी भावनाओं को संभालने और मानसिक सहारे के लिए एआई ऐप्स पर निर्भर होते जा रहे हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि इन तकनीकों के इस्तेमाल में पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो यह बढ़ती निर्भरता गंभीर मानसिक और सामाजिक जोखिम पैदा कर सकती है।

अध्ययन का एक बेहद चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि जिन यूजर्स ने एआई ऐप्स के कारण लत, भावनात्मक जुड़ाव या मानसिक नुकसान जैसी समस्याएं बताईं, उन्होंने भी इन ऐप्स को उच्च रेटिंग दी और संतोषजनक बताया। शोधकर्ताओं ने इसे “टेक्नोलॉजी पैराडॉक्स” कहा है। यानी लोग नुकसान महसूस करने के बावजूद इन डिजिटल साथियों से संतुष्ट बने रहते हैं।

अध्ययन के मुताबिक, केवल ग्राहकों की संतुष्टि के आधार पर एआई उत्पादों का आकलन करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इससे उनके गहरे मानसिक और भावनात्मक खतरों का पता नहीं चल पाता।

एआई के नैतिक और सुरक्षित डिजाइन को लेकर चिंता जताते हुए रिसर्च स्कॉलर चित्रा गौतम ने जोर दिया कि एआई कंपेनियन प्लेटफॉर्म्स में ऐसे मजबूत सुरक्षा उपाय जरूरी हैं, जो लोगों को भावनात्मक रूप से जरूरत से ज्यादा निर्भर होने से रोक सकें।

रिश्तों को खामोशी से निगलता एआई

दुनिया में तेजी से बढ़ती एआई दोस्ती के इस दौर में यह अध्ययन सरकारों और नीति निर्माताओं के लिए भी एक गंभीर चेतावनी माना जा रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि एआई कंपेनियन ऐप्स को सामान्य कामकाजी एआई सिस्टम से अलग श्रेणी में रखकर उनके लिए विशेष नियम और निगरानी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

ऐसे समय में, जब एआई साथी दबे पांव लोगों की जिंदगी, भावनाओं और रिश्तों में अपनी जगह बना रहे हैं, यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि आखिर इंसान सुकून और अपनेपन की तलाश में कितनी दूर तक मशीनों पर भरोसा करेगा।

यह दौर सिर्फ तकनीकी उपलब्धियों पर ताली बजाने का नहीं, बल्कि यह समझने का भी है कि कहीं सुविधा और भावनात्मक सहारे के नाम पर इंसानी रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे खत्म तो नहीं हो रही।

अब समय आ गया है कि काम आसान करने वाले एआई और इंसानी भावनाओं को प्रभावित करने वाले एआई के बीच साफ लकीर खींची जाए, ताकि आने वाले समय में इंसानी जज्बात, रिश्ते और तन्हाई मशीनों की गिरफ्त में सिमटकर न रह जाएं।