मध्य प्रदेश में 18 सितंबर से लेकर 15 नवंबर के बीच 58 दिनों में प्रदेश के 19158 गांवों को सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार दिये जाने की भी घोषणा की गई थी। Photo: GettyImages 
जंगल

मध्य प्रदेश : सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार खात्मे की ओर

मध्य प्रदेश वन विभाग ने अपने हाथों में लिया वन अधिकार कानून

Satyam Shrivastava

मध्य प्रदेश के वन विभाग ने मानो वन अधिकार कानून, 2006 के क्रियान्वयन और उसकी व्याख्या, दोनों को अपने हाथों में ले लिया है। मध्य प्रदेश में जनजातीय कार्य विभाग की भूमिका पहले ही बहुत सक्रिय व निर्णायक नहीं थी, अब वन विभाग, इस कानून की सीमाएँ भी अपने हिसाब से तय करता दिखलाई दे रहा है।

प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) मनोज अग्रवाल ने 6 अगस्त 2026 को एक विभागीय पत्र जारी किया। इसमें 27 जुलाई 2026 को जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संयुक्त एडवाइजरी तथा संविधान के 73वें संशोधन का हवाला देते हुए प्रदेश के मुख्य वन संरक्षकों, वन मंडलाधिकारियों और राष्ट्रीय उद्यानों-अभयारण्यों के क्षेत्र संचालकों को निर्देश दिए गए हैं।

इस पत्र के साथ ही मध्य प्रदेश के वन मंत्री डॉ. मोहन यादव ने देश की संसद और भारत सरकार के जनजाति कार्य मंत्रालय की भूमिका को बेमानी साबित कर दिया और इस कानून को लेकर अपना एक अलग ही ‘विधान’ रच दिया लगता है। उल्लेखनीय है कि स्वयं मध्य प्रदेश सरकार मानती है कि प्रदेश में 27000 गांवों को सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार सुपुर्द किये जाना है और अगर इस दिशा में बीस सालों की प्रगति देखें तो महज 4 ग्राम सभाओं को ही ये अधिकार सुपुर्द किये जा सके हैं। 

अगर इस पत्र को गौर से पढ़ेंगे तो यह महसूस होता है कि देश की संसद में जिन नीति निर्माताओं ने इस कानून को पारित किया वह अक्ल के बेहद कच्चे थे। भारत सरकार का जनजाति कार्य मंत्रालय बिना कानून को ठीक से समझे इसके क्रियान्वयन के लिए समय-समय पर दिशा-निर्देश देता रहा और महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और ओदिशा जैसे राज्यों की जिला स्तरीय समितियों में बैठे अधिकारी व जन प्रतिनिधि गैर कानूनी ढंग से दावों को मान्य करते रहे।

इस पत्र के प्रकाश में आने के बाद कई विषय विशेषज्ञों ने और मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली वन अधिकार कानून व पेसा के क्रियान्वयन पर गठित टास्क फोर्स के सदस्यों ने भी इसकी आलोचना की है। हाल ही में, केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने भी मुख्यमंत्री को इस बावत पत्र लिखा है और इस पत्र को तत्काल वापिस लेने की नसीहत दी है।  

6 अगस्त 2026 के पीसीसीएफ के पत्र में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि

  • सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआरआर) केवल उन्हीं समुदायों को दिए जा सकते हैं जो संबंधित जंगल का पारंपरिक रूप से संरक्षण और सतत इस्तेमाल करते आए हों;

  •   ग्राम सभा का अधिकार मुख्यतः गांव की पारंपरिक/रूढ़िगत सीमाओं और उसकी पारंपरिक पहुंच वाले वन क्षेत्र तक माना गया है लेकिन किसी भी आरक्षित, संरक्षित अथवा राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारण्यों में ये अधिकार नहीं दिए जा सकते।  

  • सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन के लिए ग्राम सभा द्वारा बनायी गयी प्रबंधन योजना को वन विभाग के वर्किंग प्लान के अनुरूप व एकीकृत होना होगा। तथा यहाँ वन विभाग को ग्राम सभा की अनुमति आवश्यक नहीं होगी।

  • पेसा (पीईएसए) तथा राज्य के अन्य कानूनों-नियमों की व्याख्या करते हुए वन प्रबंधन तथा लघु वनोपज के मामले में वन विभाग की मौजूदा वैधानिक और प्रशासनिक भूमिका को बनाए रखने पर जोर दिया गया है।

  • कुल मिलाकर, यह पत्र जंगल पर वन विभाग की  वन प्रबंधन संबंधी भूमिका को पुनर्स्थापित करते हुए सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकारों और ग्राम सभा के अधिकारों की अवहेलना करता है।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के दावे कहां किया जा सकते हैं?

प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पत्र से यह दुर्भावना प्रकट होती है कि सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार के तहत ग्राम सभाओं को ऐसे किसी भी जंगल पर अधिकार नहीं दिए जा सकते जिनका प्रबंधन वन विभाग करते आ रहा है और ग्राम सभाओं के पास ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं कि दावेदार समुदाय या ग्राम सभाएं उनका प्रबंधन कर रही हैं।

इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए इस पत्र में कहा गया है कि ऐसे वनों के अलावा यानी जो आरक्षित नहीं हैं, संरक्षित नहीं हैं और जिन्हें राष्ट्रीय उद्यान या अभ्यारण्य घोषित नहीं किया गया है और जिनका प्रबंधन वन विभाग नहीं कर रहा है केवल उन्हीं वनों पर सामुदायिक वन संसाधन के अधिकार दिए जा सकते हैं।

वन विभाग को समझना होगा कि- इसी चली या रही व्यवस्था को देश की संसद ने ऐतिहासिक अन्याय कहा है क्योंकि अंग्रेजों के वन विभाग ने जंगलों में बसे समुदायों से यही अधिकार तो छीन लिए थे। ब्रिटिश वन विभाग से पहले इन जंगलों का संरक्षण और प्रबंधन स्थानीय समुदाय ही कर रहे थे। अब जो जंगल बीते डेढ़ सौ सालों से समुदायों के पास है ही नहीं, वे इसका प्रमाण कैसे दें कि वो अभी भी जंगलों का प्रबंधन कर रहे हैं।

वन अधिकार कानून की धारा 2(डी) की परिभाषा ठीक इसके उलट है। इसमें अवर्गीकृत और असीमांकित वनों से लेकर आरक्षित वन, संरक्षित वन, अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यान तक “वन भूमि” में शामिल हैं। धारा 2(ए) सामुदायिक वन संसाधन की परिभाषा में भी आरक्षित, संरक्षित वन और संरक्षित क्षेत्रों को शामिल करती है, जहाँ समुदाय की पारंपरिक पहुंच रही हो। धारा 3(1)(झ) ऐसे सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा, पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार समुदाय को देती है।

वर्किंग प्लान बनाम ग्राम सभा

पत्र से यह भी संकेत मिलता है कि वर्किंग प्लान, बुआई, मिट्टी-जल संरक्षण जैसी वन प्रबंधन गतिविधियों में ग्राम सभा की सहमति या परामर्श जरूरी नहीं है। लेकिन एफआरए की धारा 5 ग्राम सभा और वन अधिकार धारकों को वन, वन्यजीव, जैव विविधता, जलग्रहण क्षेत्रों और जल स्रोतों की रक्षा की जिम्मेदारी देती है। वन अधिकार कानून के  नियम 4(1)(ई) और (एफ) ग्राम सभा को इनके संरक्षण तथा सामुदायिक वन संसाधनों प्रबंधन योजना तैयार करने के लिए समितियाँ बनाने की शक्ति देते हैं।

इसके तर्क को स्थापित करने के लिए इस पत्र में 27 जुलाई 2026 की उस एडवाइजरी का संदर्भ दिया गया है जो खुद विवादित है और कानून के विपरीत है। जनजाति कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से जारी इस एडवाइज़री में ग्राम सभा की शक्ति को सीमित किया गया है और यह कह गया है कि “ ग्राम सभाओं द्वारा बनाए गयी प्रबंधन योजना को वन विभाग की कार्य आयोजना के अनुरूप और एकीकृत होना होगा”। इस एडवाइजरी पर विशेषज्ञों, संगठनों और सिविल सोसायटी ने गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं।

कानून के मुताबिक, सामुदायिक वन संसाधन के दायरे में प्राय: वन विभाग का रोजमर्रा में सीधा दखल नहीं रह जाएगा बल्कि ग्राम सभा ही सर्वोच्च संस्था होगी। हाँ, किसी विशेष अवसर पर अगर वन विभाग को इस दायरे में कोई विशिष्ट कार्य संपादित करना है तो ग्राम सभा की अनुमति लेना जरूरी होगा।  

दावा तय कौन करेगा?

यह शायद सबसे बुनियादी सवाल है। पीसीसीएफ का पत्र सीएफआर या सीएफएफआर दावों में वन विभाग की ऐसी प्रशासनिक भूमिका की ओर जाता दिखाई देता है जो कानून में ग्राम सभा को दी गई भूमिका से टकराती है।

एफआरए की धारा 6(1) साफ कहती है कि व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों के निर्धारण की प्रक्रिया ग्राम सभा शुरू करेगी। वही दावे लेती है, उनका सत्यापन करती है, नक्शा तैयार करती है और प्रस्ताव पारित करती है। इसके बाद दावा उपखंड स्तरीय और जिला स्तरीय समिति में जाता है।

वन विभाग की भूमिका जरूर है, लेकिन केवल  सत्यापन की प्रक्रिया में। नियम 12ए में मौके पर वन और राजस्व अधिकारियों की मौजूदगी और उनकी टिप्पणी दर्ज करने का प्रावधान है। यानी विभाग प्रक्रिया में भागीदार है, ग्राम सभा का स्थानापन्न नहीं। वह अपने स्तर पर सीएफआर दावे की पात्रता या उसके क्षेत्रफल का अंतिम फैसला नहीं कर सकता।

लघु वनोपज पर किसका अधिकार?

पत्र में राज्य के नियामक प्रावधानों के आधार पर लघु वनोपज पर ग्राम सभा और वन अधिकार धारकों की भूमिका सीमित होती दिखाई करने की मंशा दिखलाई देती है। जबकि पेसा कानून की धारा 4(एम)(ii) अनुसूचित क्षेत्रों में लघु वनोपज का स्वामित्व ग्राम सभाओं को देती है। वन अधिकार कानून की धारा 3(1)(सी) भी पारंपरिक रूप से एकत्र की जाने वाली लघु वनोपज के स्वामित्व, संग्रहण, इस्तेमाल और विपणन के अधिकार को मान्यता देती है।

मध्य प्रदेश पेसा नियम, 2022 के नियम 25 और 26 भी ग्राम सभा को लघु वनोपज के संग्रहण, स्वामित्व और प्रबंधन में भूमिका देते हैं। तेंदूपत्ते के मामले में नियम 26(4) सहकारी संघ के माध्यम से संग्रहण और विपणन की व्यवस्था के साथ तय प्रक्रिया के तहत ग्राम सभा द्वारा स्वयं यह काम करने की गुंजाइश भी देता है।

इसलिए टिकाऊ संग्रहण, जैव विविधता संरक्षण या परिवहन से जुड़े राज्य के नियम जरूरी हो सकते हैं, लेकिन उनकी व्याख्या ऐसी नहीं हो सकती कि पेसा और वन अधिकार कानून से मिले ग्राम सभा के अधिकार ही खत्म हो जाएँ।

अब सवाल है कि कानून की व्याख्या करने और दिशा-निर्देश जारी का अधिकार किसे है?

यह पत्र अंतत: दो मुख्य गंभीर सवाल पैदा करता है- पहला, कि वन अधिकार कानून की व्याख्या और उसके तहत अधिकारों के निर्धारण की शक्ति किसके पास है? और दूसरा, क्या कानून की धाराओं को उसके मूल संदर्भों से काटकर पृथक-पृथक और शब्दश: पढ़ते हुए कानून की मूल भावना और मंशा को गुमराह या खत्म किया जा सकता है? 

कानून के क्रियान्वयन के लिए जनजाति कार्य मंत्रालय को इसका नोडल मंत्रालय बनाया गया। इसके लिए बिजनस रूल्स में बदलाव किया गया क्योंकि वन विभाग इस कानून में एक ‘पार्टी’ की तरह देखा गया जो आजादी के बाद जारी रहे ऐतिहासिक अन्यायों में कर्ता की भूमिका में रहा है। अंत: इस कानून की व्याख्या करने का अधिकार केवल जनजाति कार्य मंत्रालय को है। 

वन अधिकार कानून जिन तीन वृहत उद्देश्यों जैसे ऐतिहासिक न्यायाओं को दुरुस्त करने, वन प्रशासन की औपनिवेशिक व्यवस्था को लोकतान्त्रिक बनाने और समुदायों व जंगलों के बीच परस्पर संबंधों को मान्यता देने के अमल में आया, यह पत्र उन तीनों उद्देश्यों को बेमानी बनाने की दिशा में एक गंभीर साजिश की तरह लगता है। मध्य प्रदेश का वन विभाग वनों पर अपने नियंत्रण को छोड़ना नहीं चाहता।

मध्य प्रदेश में जहां करीब 27 हजार गांवों में सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की संभावना के मुकाबले अब तक केवल चार ग्राम सभाओं को अधिकार मिले हैं, वहाँ जरूरत इस प्रक्रिया को तेज करने की है। यदि विभागीय व्याख्याएँ ही यह तय करने लगें कि कौन-सा जंगल सामुदायिक वन संसाधन हो सकता है, दावा कौन और कब करेगा, ग्राम सभा कहाँ बोलेगी और वन प्रबंधन में उसकी कितनी भूमिका होगी, तो सवाल केवल कानून के क्रियान्वयन का नहीं रह जाता।  तब  सवाल यह होता है कि जिस अधिकार को संसद ने ग्राम सभा को दिया है, क्या उसे एक विभागीय पत्र के जरिए खत्म किया जा सकता है?