कुसुमपुर पहाड़ी में मौजूद बस्तियां; फोटो: अनुभव मंगल/ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे, रिसर्च प्रोजेक्ट: एलेक्सिस फाउंडेशन https://www.alexis.in/uploads/1/3/5/9/13599455/anusandhan.pdf
जंगल

क्या रिज एरिया में आती है कुसुमपुर पहाड़ी? एजेंसियों के विरोधाभासी दावों ने बढ़ाया विवाद

नक्शों और सरकारी दस्तावेजों में रिज क्षेत्र दिखाए जाने के बावजूद यहां बसावट और विकास कार्य कैसे हुए, इस पर रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • कुसुमपुर पहाड़ी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। नक्शों और सरकारी दस्तावेजों में इसे रिज और वन क्षेत्र का हिस्सा बताया जा रहा है, लेकिन सरकारी एजेंसियों के हलफनामों में अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

  • सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ कल्चर, हेरिटेज, एनवायरमेंट, ट्रेडिशन्स एंड प्रमोशन ऑफ नेशनल अवेयरनेस की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि अधिकारियों को अवैध स्थिति की जानकारी होने के बावजूद वर्षों तक यहां बसावट, निर्माण, इन-सीटू विकास और यहां तक कि गैस पाइपलाइन बिछाने की अनुमति दी गई।

  • रिपोर्ट के अनुसार, कुसुमपुर पहाड़ी की बस्ती रिज और अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क क्षेत्र पर अतिक्रमण है, जो सरकारी लापरवाही और गलत फैसलों का नतीजा है।

दिल्ली के कुसुमपुर पहाड़ी इलाके को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, क्या यह क्षेत्र ‘रिज’ (वन क्षेत्र) के दायरे में आता है या नहीं? इस मुद्दे पर सरकारी एजेंसियों के अलग-अलग और विरोधाभासी रुख ने पूरे मामले को और उलझा दिया है।

एक गैर-सरकारी संगठन सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ कल्चर, हेरिटेज, एनवायरमेंट, ट्रेडिशन्स एंड प्रमोशन ऑफ नेशनल अवेयरनेस (एसपी-चेतना) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि संबंधित एजेंसियां इस इलाके की स्थिति को लेकर खुद ही स्पष्ट नहीं हैं। अपने जवाबी हलफनामे में संगठन ने कहा है कि अधिकारी भ्रमित हैं और कुसुमपुर पहाड़ी की स्थिति पर विरोधाभासी रुख अपना रहे हैं।

गौरतलब है आवेदक एसपी-चेतना ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा दाखिल हलफनामे के जवाब में यह बात कही है।

रिज या नहीं? कुसुमपुर पहाड़ी पर सबसे बड़ा सवाल

संगठन ने मांग की है कि कुसुमपुर पहाड़ी में मौजूद जे जे क्लस्टर के 'उसी स्थान पर' यानी इन-सीटू विकास को तुरंत रोका जाए। संगठन का कहना है कि कुसुमपुर पहाड़ी का एक हिस्सा दक्षिणी रिज के वन क्षेत्र में आता है और यह अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क के दायरे में भी शामिल है, इसलिए यहां विकास कार्य करना नियमों का उल्लंघन है।

17 मार्च 2026 को दाखिल इस रिपोर्ट में कहा गया है कि संबंधित एजेंसियां इस अवैध स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ थीं, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय वर्षों तक यहां निर्माण और आबादी को लगातार कई गुणा बढ़ने दिया गया।

नतीजन वर्षों से न केवल अवैध बस्तियां बढ़ती रहीं, बल्कि निर्माण और जनसंख्या का घनत्व भी बढ़ता गया। रिपोर्ट के अनुसार, हालात इतने आगे बढ़ गए कि यहां इन-सीटू विकास की प्रक्रिया शुरू कर दी गई और विकास कार्य लंबित रहने के दौरान एलपीजी पाइपलाइन बिछाने की अनुमति तक दे दी गई।

एजेंसियों के हलफनामों में विरोधाभास

रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (आईजीएल) को यह बताने के लिए हलफनामा दाखिल करने को कहा गया कि उसने वन/मॉर्फोलॉजिकल रिज क्षेत्र में किन परिस्थितियों में गैस पाइपलाइन बिछाई और उसे चालू किया।

इसके जवाब में 20 सितंबर 2025 के अपने हलफनामे में आईजीएल ने यह स्वीकार किया कि उसने यह काम दिल्ली के उपराज्यपाल के निर्देश पर और डीडीए से अनुमति लेने के बाद किया। आईजीएल ने कुसुमपुर पहाड़ी में 1,427 मीटर लंबी गैस पाइपलाइन बिछाने और चालू करने की बात भी स्वीकार की है।

हालांकि, दिल्ली विकास प्राधिकरण ने अपने हलफनामे में इससे अलग रुख अपनाया। 8 अप्रैल 2025 के अपने हलफनामे में डीडीए ने कहा कि कुसुमपुर पहाड़ी के मौजूदा जे जे क्लस्टर के लिए उसके पास इन-सीटू विकास का कोई प्रस्ताव नहीं है।

डीडीए ने यह भी कहा कि कुसुमपुर पहाड़ी की जमीन अब उसके पास नहीं है, क्योंकि यह जमीन दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (डीयूएसआईबी) को सौंप दी गई है।

डीडीए का अलग रुख, जिम्मेदारी से झाड़ा पल्ला

डीडीए ने हलफनामे में यह भी कहा कि कुसुमपुर पहाड़ी साउथ-सेंट्रल रिज के अंदर या उसका हिस्सा नहीं है। हालांकि एजेंसी ने माना कि कुसुमपुर पहाड़ी का इलाका अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क के दायरे में आता है और यहां अधिसूचित क्लस्टर में करीब 2,000 परिवार रहते हैं। इसी आधार पर डीडीए ने कहा कि कुसुमपुर पहाड़ी के लिए इन-सीटू पुनर्वास का कोई प्रस्ताव नहीं है।

वहीं दूसरी ओर वन विभाग (प्रधान मुख्य वन संरक्षक) और रिज मैनेजमेंट बोर्ड ने माना है कि कुसुमपुर पहाड़ी का कुछ हिस्सा ‘मॉर्फोलॉजिकल रिज’ में आता है। देखा जाए तो यह बयान डीडीए के उस दावे से अलग है, जिसमें कहा गया था कि कुसुमपुर पहाड़ी साउथ-सेंट्रल रिज में नहीं आता। इससे साफ है कि अलग-अलग एजेंसियों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

अतिक्रमण, लापरवाही या मिलीभगत?

इन्हीं विरोधाभासी बयानों को आधार बनाते हुए एसपी-चेतना ने कहा है कि एजेंसियां खुद ही भ्रमित हैं और इसी वजह से मामले में स्पष्टता नहीं आ पा रही।

संगठन का दावा है कि आधिकारिक नक्शों, सर्वे ऑफ इंडिया के आंकड़ों, वन क्षेत्र और मॉर्फोलॉजिकल रिज के भौगोलिक निर्देशांकों तथा सरकारी दस्तावेजों में अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क के रूप में दिखाए गए क्षेत्र के आधार पर कुसुमपुर पहाड़ी स्पष्ट रूप से रिज और वन क्षेत्र के भीतर आती है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का निर्माण या बसावट पूरी तरह अवैध है।

इसलिए हर पहलू से देखने पर कुसुमपुर पहाड़ी की बस्ती वन क्षेत्र, मॉर्फोलॉजिकल रिज, साउथ-सेंट्रल रिज और अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क पर साफ तौर पर अतिक्रमण है। ऐसे इलाके में किसी भी तरह की बसावट, निर्माण या विकास की अनुमति नहीं है।

रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला है कि कुसुमपुर पहाड़ी में मौजूद बस्तियां और विकास गतिविधियां सरकारी एजेंसियों की लापरवाही, मिलीभगत और गलत फैसलों का नतीजा हैं, जिन पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।