प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
पर्यावरण

पर्यावरणीय उल्लंघनों पर कसता शिकंजा: सुप्रीम कोर्ट की पहल पर केंद्र बना रहा एक समान कड़े नियम

न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने कहा कि पर्यावरणीय मुआवजे और जुर्माने की राशि तय करने से लेकर उसे लागू करने तक की प्रक्रिया में तालमेल होनी चाहिए।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • पर्यावरणीय नुकसान और जल निकायों पर अतिक्रमण को लेकर दो अलग-अलग मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए जवाबदेही और एकरूप कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया है।

  • पर्यावरणीय उल्लंघनों के मामले में अदालत की पहल के बाद केंद्र सरकार ऐसी व्यवस्था तैयार करने की दिशा में बढ़ रही है, जिसमें मुआवजे और जुर्माने की राशि तय करने, उसे लागू करने और वसूलने के लिए समान कानूनी ढांचा हो।

  • पर्यावरण मंत्रालय की समिति अलग-अलग पर्यावरण कानूनों के बीच मौजूद अधिकारों और प्रक्रियाओं के अंतर की भी समीक्षा कर रही है, ताकि कार्रवाई कानूनी पेचीदगियों में न उलझे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पर्यावरणीय मुआवजे और जुर्माने की पूरी प्रक्रिया में स्पष्टता और तालमेल जरूरी है।

  • वहीं, कोलकाता में जलाशय की जमीन पर कथित निर्माण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता नगर निगम से स्पष्ट रुख और विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

  • कलकत्ता हाई कोर्ट ने प्रथमदृष्टया जमीन को ‘दांगा’ या ‘पुकुर’ यानी जल निकाय के रूप में दर्ज बताया था।

  • अब सुप्रीम कोर्ट यह जानना चाहता है कि निगम का इस निष्कर्ष पर क्या रुख है और निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी गई। दोनों मामलों में अदालत का रुख पर्यावरण संरक्षण में संस्थागत जवाबदेही और कड़े अनुपालन का संकेत देता है।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा गठित समिति पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने पर लगाए जाने वाले मुआवजे और जुर्माने की व्यवस्था की समीक्षा कर रही है। समिति यह भी देख रही है कि मुआवजे और जुर्माने की राशि तय करने, उन्हें लागू करने और वसूलने के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था कैसे बनाई जाए। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने 10 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी है।

सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने यह भी बताया कि समिति इस बात की भी जांच कर रही है कि अलग-अलग कानूनों के तहत पर्यावरणीय उल्लंघनों पर कार्रवाई करने वाली व्यवस्थाओं में मौजूद अंतर को कैसे दूर किया जाए।

कानूनी पेचीदगियों से बाहर निकलेगी पर्यावरणीय कार्रवाई

इसमें जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत काम करने वाली संबंधित एजेंसियों की भूमिकाओं और अधिकारों में मौजूद अंतर की समीक्षा भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर पर्यावरण मंत्रालय के निदेशक ने 4 अगस्त 2025 को इस संबंध में हलफनामा दाखिल किया था।

गौरतलब है कि इन अलग-अलग कानूनों को लागू करने वाली एजेंसियों के अधिकारों और नियमों में अंतर होने के कारण अब तक कानूनी कार्रवाई में उलझनें आती रही हैं।

न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने कहा कि पर्यावरणीय मुआवजे और जुर्माने की राशि तय करने से लेकर उसे लागू करने तक की प्रक्रिया में तालमेल होनी चाहिए। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 अक्टूबर 2026 की तारीख तय की है।

जलाशय पर निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कोलकाता नगर निगम से मांगा जवाब

कोलकाता में जलाशय की जमीन पर हुए कथित निर्माण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता नगर निगम से स्पष्ट जवाब मांगा है।

अदालत ने पूछा है कि 21 जुलाई 2026 के अपने अंतरिम आदेश में कलकत्ता हाई कोर्ट की उस प्रथमदृष्टया टिप्पणी पर निगम का क्या रुख है, जिसमें निर्माण वाली जमीन को ‘दांगा’ या ‘पुकुर’ के रूप में दर्ज जल निकाय बताया गया था।

11 अगस्त को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोलकाता नगर निगम, नगर निगम आयुक्त और नगर निगम के महानिदेशक की मौजूदगी जरूरी है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से मामले के सभी पहलुओं पर व्यापक रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

यह मामला कोलकाता में एक जल निकाय पर हुए निर्माण से जुड़ा है। हाई कोर्ट की प्रथमदृष्टया टिप्पणी के बाद अब सुप्रीम कोर्ट यह जानना चाहता है कि संबंधित जमीन की प्रकृति को लेकर नगर निगम का आधिकारिक रुख क्या है और निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी गई। अदालत ने अधिकारियों से मामले के सभी प्रासंगिक तथ्यों और दस्तावेजों के साथ विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।