स्थिति साफ तौर पर दर्शाती है कि कानून कागजों तक सीमित है, जबकि बाजार में प्लास्टिक का राज कायम है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
पर्यावरण

दिल्ली-मुंबई में बेअसर होता प्लास्टिक बैन: तीन साल बाद भी 85 फीसदी जगहों पर खुलेआम हो रहा उपयोग

बैन लागू होने के तीन साल बाद भी बाजारों में सिंगल यूज प्लास्टिक की मौजूदगी यह दिखाती है कि इसके अमल में अब भी बड़ी खामियां हैं।

Lalit Maurya

  • देशभर में लागू सिंगल यूज प्लास्टिक बैन के तीन साल बाद भी हालात चिंताजनक हैं। चार बड़े शहरों के 560 स्थानों पर हुए सर्वे में 84 फीसदी जगहों पर प्रतिबंधित प्लास्टिक का इस्तेमाल जारी मिला।

  • इनमें दिल्ली में 86 फीसदी, मुंबई में 85 फीसदी, भुवनेश्वर में 89 फीसदी और गुवाहाटी में 76 फीसदी फीसदी स्थानों पर हो रहा प्लास्टिक का उपयोग हालात की गंभीरता को बयान करता है।

  • देखा जाए तो यह महज आंकड़े नहीं, बल्कि उस विफलता की तस्वीर हैं जहां कानून कागजों में सख्त है, लेकिन बाजार में प्लास्टिक अब भी खुलेआम चल रहा है।

  • सस्ती उपलब्धता, कमजोर निगरानी और उपभोक्ताओं की आदतें इस समस्या को लगातार जिंदा रखे हुए हैं, जिससे साफ है कि बिना सख्त अमल और व्यवहार में बदलाव के यह लड़ाई जीतना मुश्किल होगा।

भारत में सिंगल यूज प्लास्टिक पर देशव्यापी प्रतिबंध लागू हुए तीन साल हो चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।

पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाने वाले संगठन टॉक्सिक्स लिंक ने अपनी नई रिपोर्ट में दावा किया है कि दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों में आज भी प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक (एसयूपी) का इस्तेमाल और बिक्री धड़ल्ले से जारी है। इसकी पड़ताल के लिए अप्रैल से अगस्त 2025 के बीच किए सर्वे में दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी और भुवनेश्वर के 560 स्थानों का अध्ययन किया है।

रिपोर्ट में सामने आया कि सर्वे की गई 84 फीसदी जगहों पर प्रतिबंधित प्लास्टिक उत्पाद अब भी इस्तेमाल या बेचे जा रहे हैं। वहीं दिल्ली से जुड़े आंकड़ों को देखें तो सर्वे किए गए 86 फीसदी स्थानों पर आज भी प्रतिबंधित प्लास्टिक को बेचा या इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसी तरह भुवनेश्वर में सर्वे किए गए 89 फीसदी, मुंबई में 85 फीसदी और गुवाहाटी में 76 फीसदी स्थानों पर प्लास्टिक का उपयोग जारी है।

यह स्थिति साफ तौर पर दर्शाती है कि कानून कागजों तक सीमित है, जबकि बाजार में प्लास्टिक का राज कायम है।

छोटी दुकानों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल

'रिविजिटिंग सिंगल यूज प्लास्टिक बैन' नामक रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि स्ट्रीट वेंडर, जूस स्टॉल, सब्जी विक्रेता, आइसक्रीम पार्लर और साप्ताहिक बाजारों में प्रतिबंधित प्लास्टिक मौजूद है।

इसमें भी पतले प्लास्टिक बैग, डिस्पोजेबल कप-प्लेट, स्ट्रॉ और कटलरी सबसे ज्यादा इस्तेमाल में पाए गए। इसका मतलब है कि कहीं न कहीं गली-मोहल्लों के बाजारों और छोटे दुकानदारों में यह समस्या सबसे गंभीर है। इसके उलट, मॉल और बड़े रिटेल स्टोर्स में नियमों का पालन कहीं अधिक बेहतर देखा गया।

ग्राहकों की मांग बड़ी वजह

टॉक्सिक्स लिंक के मुताबिक सर्वे में शामिल करीब 91 फीसदी छोटे दुकानदारों ने माना कि ग्राहक आज भी प्लास्टिक बैग मांगते हैं। साथ ही, पर्यावरण-अनुकूल विकल्प महंगे होने के कारण दुकानदार भी बदलाव से बचते हैं। हालांकि 55 फीसदी लोगों ने बताया कि कुछ ग्राहक अपने बैग लाते हैं, लेकिन मुफ्त प्लास्टिक बैग की अपेक्षा अभी भी बनी हुई है।

भले ही कागज के कप-प्लेट, कपड़े के बैग, लकड़ी की कटलरी, स्टील बर्तन और बैगास प्लेट जैसे विकल्प बाजार में उपलब्ध हैं। इसके बावजूद, सस्ते और “सुविधाजनक” होने के कारण प्लास्टिक का उपयोग जारी है। इतना ही नहीं कई उपभोक्ता डिस्पोजेबल सामान को ज्यादा “हाइजीनिक” भी मानते हैं।

टॉक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा के मुताबिक, “लोग अब भी डिस्पोजेबल चीजों को ज्यादा साफ और सुविधाजनक मानते हैं। यही सोच बदलाव में सबसे बड़ी बाधा है।“

रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिबंध के बावजूद प्लास्टिक उत्पादों का निर्माण और सप्लाई बंद नहीं हुई है। यही कारण है कि ये आसानी से बाजार में उपलब्ध हैं। साथ ही, पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर जागरूकता की कमी अभी भी बड़ी समस्या है।

क्या हैं समाधान?

रिपोर्ट में सरकार, उद्योग और आम नागरिकों, तीनों के लिए ठोस और बहुस्तरीय कदम सुझाए गए हैं। इसमें सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सख्त निगरानी और नियमित जांच को अनिवार्य बताया गया है, साथ ही नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

छोटे दुकानदारों को इस बदलाव में साथ लाने के लिए उन्हें आर्थिक सहायता और किफायती, पर्यावरण अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराने की बात कही गई है।

इसके अलावा, पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की उपलब्धता और पहुंच बढ़ाने, जनजागरूकता अभियानों को तेज करने, तथा प्रतिबंधित प्लास्टिक के उत्पादन और सप्लाई पर कड़ा नियंत्रण सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई है, ताकि इस समस्या का स्थाई समाधान संभव हो सके।

ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ प्रतिबंध लगाना काफी नहीं है। जब तक कड़ी निगरानी, सस्ते विकल्प और लोगों के व्यवहार में बदलाव नहीं होगा, तब तक प्लास्टिक पर काबू पाना मुश्किल ही रहेगा।