नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पर्यावरण और जन-हित से जुड़े दो बेहद संवेदनशील मामले सामने आए हैं, जिनमें अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। इसमें पहला मामला ओडिशा के सिजीमाली खनन विवाद से जुड़ा है। गौरतलब है कि रायगड़ा जिले की सिजीमाली पहाड़ियों पर वेदांता लिमिटेड की बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ स्थानीय वनवासियों ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया है।
44 गांवों के कंधा, डोम्बो और गौड़ा समुदाय इन पहाड़ियों को अपने देवता ‘तिजराजा’ का पवित्र निवास और अपनी आजीविका का आधार मानते हैं। खनन से हजारों लोगों के विस्थापन और 18 गांवों के प्रभावित होने का खतरा है। आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और आस्था को देखते हुए एनजीटी ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, ओडिशा सरकार और वेदांता से दो दिन के भीतर जवाब मांगा है।
वहीं दूसरा मामला पश्चिम बंगाल में अस्पताल के कचरा प्रबंधन की लापरवाही से जुड़ा है। ट्रिब्यूनल ने जलपाईगुड़ी के मालबाजार सुपर फैसिलिटी अस्पताल के पिछले हिस्से में बायो-मेडिकल और सामान्य कचरा खुले में फेंकने पर कड़ा रुख अपनाया है।
जस्टिस अरुण कुमार त्यागी की पीठ ने अधिकारियों की ढिलाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को तुरंत निरीक्षण करने तथा दोषी मेडिकल सुपरिटेंडेंट व अधिकारियों पर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया है।
इन दोनों मामलों में एनजीटी का रुख स्पष्ट है, चाहे वनवासियों की आस्था हो या सार्वजनिक स्वास्थ्य, कानून की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
ओडिशा के रायगड़ा जिले में सिजीमाली पहाड़ियां पर बॉक्साइट खनन के खिलाफ स्थानीय ग्रामीणों की लड़ाई अब न्यायिक मोड़ ले चुकी है। गांव वालों की अर्जी को गंभीरता से लेते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने संबंधित पक्षों से दो दिन के भीतर जवाब मांगा है। इस मामले में अगली सुनवाई 20 मई 2026 को होनी है।
इस मामले में 14 मई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, ओडिशा इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, वेदांता लिमिटेड और रायगड़ा वन प्रभाग के अधिकारियों समेत कई पक्षों को नोटिस जारी किया है।
'तीजराजा' का वास: दांव पर 44 गांवों की आस्था और अस्तित्व
ग्रामीणों का याचिका में कहना है कि सिजीमाली की पहाड़ियां केवल खनिज संपदा का भंडार नहीं, बल्कि 44 गांवों में रहने वाले कंधा, डोम्बो और गौड़ा समुदायों की आस्था, संस्कृति और अस्तित्व का केंद्र हैं। वनवासी समुदाय इन पहाड़ियों को अपने देवता ‘तिजराजा’ का पवित्र निवास मानते हैं। यहां के जंगल, जलस्रोत, खेती और वन उपज उनकी आजीविका का आधार हैं, जो इन पहाड़ियों से गहराई से जुड़े हैं।
वेदांता लिमिटेड की यह खनन परियोजना 18 गांवों को प्रभावित करेगी, जबकि मालीपदार और तिजमाली गांवों को पूरी तरह उजड़ने की आशंका है। ये समुदाय अपनी ज़िंदगी और रोज़ी-रोटी के लिए इन पहाड़ियों पर निर्भर हैं। इससे हजारों लोगों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है।
प्रभावित वनवासी समुदाय लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह खनन उनके संवैधानिक अधिकारों और वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत मिले संरक्षण का उल्लंघन है। अब सबकी नजर एनजीटी की अगली सुनवाई पर है, जहां तय होगा कि सिजीमाली की पहाड़ियां खनन के हवाले होंगी या आदिवासियों की आस्था और जीवन को बचाया जाएगा।
अस्पताल में खुले में फेंका जा रहा जैविक कचरा, एनजीटी ने कार्रवाई के दिए आदेश
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पूर्वी पीठ ने जलपाईगुड़ी के मालबाजार सुपर फैसिलिटी अस्पताल में फैल रहे प्रदूषण को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने 14 मई 2026 को पश्चिम बंगाल राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (डब्ल्यूबीएसपीसीबी) को तुरंत अस्पताल का निरीक्षण करने का आदेश दिया।
ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि यदि पर्यावरण से जुड़े नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित मेडिकल सुपरिटेंडेंट और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने सहित सुधार के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएं।
मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस अरुण कुमार त्यागी की पीठ ने सरकारी अधिकारियों के ढुलमुल रवैए पर कड़ी नाराजगी जताई। पीठ ने कहा कि अधिकारियों को जवाब दाखिल करने के लिए पहले ही 'तीन बार मौके' दिए जा चुके हैं, फिर भी उनकी तरफ से देरी की गई।
अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दिया है और इसके लिए चार सप्ताह का समय तय किया है। इस मामले में अब अगली सुनवाई 7 सितंबर 2026 को होगी।
यह पूरा मामला पर्यावरण कार्यकर्ता सुभास दत्ता द्वारा दायर याचिका के बाद सामने आया है। याचिका के अनुसार, 11 मई 2024 को उत्तर बंगाल के दौरे के दौरान उन्होंने देखा कि मालबाजार सुपर फैसिलिटी अस्पताल के पिछले हिस्से में बायो-मेडिकल और सामान्य कचरा एक साथ खुले में फेंका गया था। अदालत में सबूत के तौर पर इसकी तस्वीरें भी पेश की गईं, जो अस्पताल की इस गंभीर लापरवाही को उजागर करती हैं।
अस्पताल परिसर में बायो-मेडिकल और सामान्य कचरे का एक साथ खुले में पड़ा होना स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे में एनजीटी ने साफ किया है कि यदि नियमों की अनदेखी साबित होती है, तो जिम्मेदार मेडिकल सुपरिंटेंडेंट और अन्य अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।